बुधवार, 25 सितंबर 2013

महाभारत


                             महाभारत 
एक कहानी तुम्हें सुनाएं हम ऐसे इन्सान की,
ईर्ष्या भाव से कुंठित होकर सुनी नहीं भगवन की। 
हस्तिनापुर का राज्य  प्रमुख था सारे हिंदुस्तान में। 
 भीष्म पितामह सजग खड़े थे , कमी न हो कोई शान में। 
धृतराष्ट्र पांडु से ज्येष्ठ पुत्र था , लेकिन आँखों से था लाचार। 
हीन भावना उसमें बैठी , था ईर्ष्या युक्त उसका व्यव्हार। 
नेत्र हीन होने के कारण उसके भाग्य न जग पाए। 
कनिष्ठ पांडु  जो होनहार थे , राजा की पदवी पाए।  
बचपन से आँखें नहीं हैं मेरी , इसमें क्या है मेरा दोष ?
भाग्य ने क्यों खिलवाड़ किया ,था रोम-रोम में उसके रोष। 
दिन बीते और रातें बीतीं , बढ़ता गया हीनता भाव। 
राजा की पदवी ही न थी, सबसे बड़ा था यही अभाव। 
फिर होनी ने ऐसा खेला उनके भाग्य संग खेल। 
दुर्योधन से ज्येष्ठ हो गए , युधिष्ठिर का था न कोई मेल। 
इससे हुआ सुनिश्चित, कल का राज्य युधिष्ठिर पाएगा। 
दुर्योधन भी दूर रहेगा , राज्य नहीं कर पाएगा। 
पर अनहोनी कोई न जाने , राजा पांडु का निधन हुआ।   
धृत राष्ट्र राजगद्दी पर बैठे , मोह भाव का सृजन हुआ।  
मेरे बाद इस राज्य का स्वामी प्रिय दुर्योधन कैसे हो ? 
दिन-रात लगी थी एक ही चिंता ,यह संकट हल कैसे हो ?
ईर्ष्या भाव बढ़ा  पुत्रों में , पिता से   कुसंस्कार मिला  .
 पांडु पुत्रों से श्रेष्ठ रहें हम , उनके अंदर यह विकार पला। 
हत्या के षड्यंत्र रचे और निश्चिन्त होने के किये प्रयास। 
पांडु पुत्रों के कृष्ण थे रक्षक , कौरवों की पूरी हुई न आस। 
पांडव हुए युवा और काबिल, उन्हें मिला पृथक एक राज्य। 
उनका वैभव और देख प्रतिष्ठा , ईर्ष्या से जल उठा कुराज। 
फिर जुए का पासा फेंका , पांडवों से छीना सम्मान। 
तेरह  वर्ष जंगल में भटके , माँगा वापस आ  अपना मान।   
दुर्योधन ने जिद्द थी ठानी , राज्य था अब उसके आधीन। 
ईर्ष्या द्वेष बढ़े  थे ऐसे , बैर था उनका रूप नवीन। 
पांडवों ने मांगे पांच गाँव , दुर्योधन न पर अड़ा  रहा। 
कृष्ण ने उसे बहुत समझाया , फिर भी वह ऐंठा  खड़ा रहा। 
भगवान् कृष्ण की बात न मानी ,गर्व में डूबा , युद्ध की ठानी। 
राज्य के मंत्री विदुर थे ज्ञानी , धृतराष्ट्र थे नेत्र हीन अज्ञानी। 
ईर्ष्या , बैर , घमंड था छाया , महाभारत का युद्ध कराया। 
कौरवों की नष्ट हुई सब माया ,सम्पूर्ण राष्ट्र का नाश कराया। 
वे आपस में विद्वेष  न करते , भाई  परस्पर बैर  न करते। 
प्रेम का मिलकर दीप जलाते , सारे सुख समृद्धि को पाते। 



अपराधियों का चुनाव

अपराधियों का चुनाव 

लोकपाल हम क्यों लाएं , अपने विरुद्ध हम क्यों जाएं ,
अपने बाई - बंधुओं को , फांसी पर हम क्यों लटकाएं। 
अपराधी हमारे अपने हैं , अपराध उनकी लाचारी है ,
शक्ति भोगी वसुंधरा है , वे सत्ता के अधिकारी हैं। 
अपराधियों को कहाँ भेजें , कहाँ रहें भ्रष्टाचारी  ?
चुनाव लड़ना अधिकार सभी का , यही रहेगी नीति हमारी। 
अपराधी जेल में बंद रहें , उन्हें चुनाव लड़वाएंगे ,
न्यायालय अपना काम करें , हम उनको जितवाएंगे। 
कोर्ट सर्कार के लिए नहीं , जनता हित में खुलवाये हैं ,
अपराध बढ़ाने की खातिर , अनेक क़ानून बनाए हैं। 
क़ानून राजनीति  में दखल न दें , हम अपने नियम बनाते हैं ,
हम कोर्ट नहीं जाया करते , राजनीति में वे क्यों आते हैं। 
नेता न्यायाधीश से पूछें , अपराध समाप्त कराओगे ? 
गर अपराधी ही न होंगे , तो बोलो , तुम क्या खाओगे ?
जितने अपराधी ज्यादा हों , वे न्यायलय की शान हैं ,
आरोपी के सामने ऊंचे बैठ , सब जज बनते महँ हैं। 
न आओ तुम बहकावों में , राज हमें ही करने दो , 
हम भी रखेंगे ध्यान तुम्हारा , जैसा चलता है , चलने दो।   
 

बुधवार, 18 सितंबर 2013

मंहगाई का पूँजीवादी अर्थशास्त्र

                 मंहगाई का पूँजीवादी अर्थशास्त्र
   भारत में डा. मनमोहन सिंह का  जो अर्थ शास्त्र चल रहा है, वह मंहगाई का अर्थ शास्त्र है . यह मंहगाई  का अर्थशास्त्र इसलिये कहा जाता है कि इसका उद्देश्य ही मंहगाई बढ़ाना है . जो लोग समझते हैं की भविष्य मे कभी मंहगाई कम हो जायगीमंहगाई का पूँजीवादी अर्थशास्त्र अर्थशास्त्र  तो यह उनकी भूल है . इसी का दूसरा नाम है पूंजीवादी अर्थशास्त्र अर्थात निरंतर पूँजी बढ़ाते जाओ . मंहगाई बढ़ने का अर्थ है पूंजीवादी कि पूँजी बढ़ना . सुधारवाद का भी यही अर्थ है कि वस्तुओं के भाव में सुधार होते जाएँ, वे  मंहगी होती जाएँ जिससे  अमीरों कि पूँजी निरंतर बढ़ती  जाये . दुनिया के अनेक उन्नत कहे जाने वाले देशों ने इसे अपनाया है और अब भारत भी वही सब कर रहा है जिससे भारत में भी पूंजीवादियों और पूंजीपतियों कि संख्या तेजी से बढ रही है .
      भारत में कम्युनिस्टों के साथ मिलकर इंदिरा गाँधी ने समाजवादी व्यवस्थ लागू की थी . जब उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तो यही दलील दी थी  कि पूँजीवादी लोग बड़े दुष्ट होते हैं . वे गरीबों का शोषण करते हैं . निजी बैंक पूंजीपतियों और जमाखोरों को उधार में धन देते है जिससे वे सामानों को खरीद कर भंडारों में जमा कर लेते हैं और काला बाजारी कर के भारी मुनाफा कमाते हैं . उनके समय में उद्योगपति और व्यवसायी देश और समाज के दुश्मन समझे जाते थे . इसलिए उस समय कांग्रेस के सहयोगी कम्युनिस्टों ने श्रमिक संघों के द्वारा सरकार  पर दबाव डाल कर ऐसे श्रमिक क़ानून बनवाये कि देश में सदियों से चले आ रहे उद्योगपतियों के आलावा कोई सर उठा ही न सके . पुराने उद्योगपति  इसलिए चल पा रहे थे कि नेताओं को आये दिन धन देते रहते थे . धन खाने के दूसरे साधन थे सरकारी विभाग और सहकारी संस्थाएं . उस समय जनता अपनी गाढ़ी कमाई से जो धन कर के रूप में सरकारी कोष में जमा करती , सरकारी चोर उन्हें खा जाते जिससे देश का धन धीरे-धीरे समाप्त होता गया . भ्रष्ट  नेता – अफसर – कर्मचारी बिना कोई उत्पादन किये , बिना कोई व्यवसाय किये  ही पूंजी के पति बनते गए . ये लोग १९९० तक देश का सारा धन चट कर गए और सरकार  चलाने के लिए देश का सोना विदेश में गिरवी रखना पड़ा . उससे प्राप्त  थोड़ा  सा धन भी कब तक चलता ? काम चलाने के लिए सरकार नोट भी छापती गयी जब कि उतना धन कोष में नहीं था . परिणाम स्वरूप रुपये का मूल्य घटता गया . सामान खरीदने के लिए अधिक रुपये लगने लगे अर्थात मंहगाई बढ़ने लगी . अपने देश में अनेक आधुनिक मशीनों , उपकरणों, जहाज़ों, युद्ध-सामाग्रियों आदि का उत्पादन होता नहीं था . उन्हें खरीदने के लिए धन कहाँ से आता ? विदेशी कागज़ के रूपये पर सामान क्यों देने लगे ? देश का सोना भी गिरवी में रखा हुआ था तो कर्जा किस आधार पर मिलता ? जब एक व्यक्ति के पास धन न हो और समाज में उसकी इतनी प्रतिष्ठा भी न हो कि कोई उसे कर्ज दे  वह गुजारा कैसे चलाता है ? उसे घर का सामान बेचना पड़ता है . जब इंदिरा – राजीव दोनों नहीं रहे  और नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री तथा डा. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने तो जिंदगी भर इंदिरा – राजीव के समाजवाद की  हाँ में हाँ मिलाने वाले अर्थशास्त्री डा. मनमोहन सिंह पलट गए और उन्होंने खुली अर्थ व्यवस्था अर्थात जिसे जैसा अच्छा लगे, करे और धन कमाए तथा देश की  जमा पूँजी जो सरकारी कंपनियों , प्राकृतिक संसाधनों के रूप में शेष थी , को बेच कर धन प्राप्त करने का विदेशियों का सुझाव मान लिया . धन आने लगा और सरकार चल पड़ी . वर्षों से सरकार लोगों को पूँजीपतियों के भूत से डराती आ रही थी , अब अचानक पूंजीवाद का गुणगान कैसे करती? अतः उन्होंने संविधान से ‘समाजवादी ‘ शब्द तो नहीं हटाया पर पूँजीवाद लागू कर दिया और उस पर जनकल्याण का लेबल लगा दिया कि नेता भी खाएं , अफसर – कर्मचारी भी खाएं और जनता भी खाए . जिसका जितना जोर हो वह उतना खाए . जैसे जो जमीन पर कब्ज़ा कर ले , जमीन उसकी , जो नौकरी पर कब्ज़ा कर ले नौकरी उसकी , जो गरीबी का कार्ड बनवा ले सारी  सुविधाएं उसकी . कुल मिलाकर जो जैसा हथकंडा अपना ले, लूट उसकी .  इस अर्थ शास्त्र का परिणाम यह निकला कि देश में संत्री से मंत्री तक सभी मालामाल होते गए और देश बेहाल होता चला गया . अब  डा. सिंह को देश को यह समझाना पड़  रहा है कि  विदेशी  धनवान  आकर ही देश को चला पायेंगे . इंदिरा गाँधी पूँजीपति नाम के जिस भूत का नाम लेकर लोगों को डराया करती थी और लोग उसके डर के कारण उसे वोट देते जाते थे,  अब वर्तमान कांग्रेसी सरकार लोगों को किसी दलाल नाम के खतरनाक जंतु का नाम लेकर भयभीत कर रही है और उससे निपटने के लिए महान विदेशी पूंजीपतियों को , जो अपना देश तबाह कर चुके हैं , भारत बुलवा रही है . पहले  कांग्रेसी विपक्षियों को पूंजीपतियों का दलाल कहते थे और अब दलालों का दलाल कह रहे हैं क्योंकि पूंजीपति अब  कांग्रेस के हितैषी हो गए हैं , अत्यंत प्रिय हो गए हैं . इसलिये सरकार उनकी पूंजी बढ़ाने का हर सम्भव प्रयत्न कर रही  है. उनकी पूँजी तभी बढ़ेगी जब वस्तुएं मंहगी होंगी अर्थात मंहगाई बढ़ेगी . इसलिए जब सरकार का कोई मंत्री या तथाकथित अर्थशास्त्री मंहगाई कम करने कि बात करता है तो यह मान कर करता है कि जनता मूर्ख है और उसे निरंतर बहलाना, फुसलाना और हसीन सपने दिखाना संभव है . लेकिन जब जनता जागती है तो फ़्रांस जैसी क्रांति करती है अथवा पश्चिम एशियाई देशों के समान उथल- पुथल . इसका  ध्यान सत्ता धारी तब तक नहीं रखते जब तक क्रांति न हो जाय फिर कांग्रेस क्यों रखे ?
   डा. मनमोहन सिंह और उनकी तिकड़ी ( डा.सिंह, चिदंबरम और मोंटेक सिंह) की प्रारंभ से ही यह परिकल्पना रही है कि विदेशी पूंजीपति और उनकी पूँजी से ही भारत चल सकता है . भारत में बड़े योजना बद्ध  ढंग से वे इस के लिए विगत ९ वर्षों से कठिन परिश्रम कर रहे हैं . भारत में बैंकों ने ब्याज दरें बढ़ा दीं ताकि देश के उद्योग विदेशी उद्योगों के सामने न टिक पाएं . भारत के लगभग सभी उद्योगों पर चीन ने कब्ज़ा कर लिया है . भारतीय उद्यमी वर्षों से यह  आस लगाए बैठे ही रह गए कि बैंक की ब्याज दरें कम होंगी . अर्थ व्यवस्था नष्ट होने पर दिखावे के लिए वित्त मंत्री चिदंबरम ने रिज़र्व बैंक से कहा कि वह ब्याज दरें घटाए , उसने भी मुंह दिखाई कर दी और कह दिया  कि बैंक ब्याज दरें घटा दें . उधर गिरते रूपये का वास्ता देकर सरकार  ने  रिज़र्व बैंक पर दबाव बनाया और उसने ब्याज दरें पहले की अपेक्षा २% बढ़ा दीं . भारत के उद्यमी एक ओर रूपये के गिरते मूल्य से परेशान  थे, सरकार ने तोहफे में क़र्ज़ और  भी महंगा कर दिया ताकि वे कभी उठ न पायें .
    दूसरी ओर अर्थशास्त्री बार-बार कह रहे हैं कि भारत की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए आयत कम किया जाय और निर्यात बढ़ाया जाय . सरकारी अर्थशास्त्री , प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री भी यही कह रहे हैं और कर रहे हैं उसका उल्टा ताकि उनका यह सिद्धांत सत्य सिद्ध हो जाय कि देश को अब विदेशी पूँजीपति ही चला सकते हैं . विदेशी पूँजीपति शेयर बाज़ार में धन लगाते हैं जिससे उत्पादन नहीं बढ़ता , सिर्फ उद्योगपतियों की पूँजी कागजों पर बढ़ती है जिससे प्रभावित होकर भारतीय लोग भी शेयर बाज़ार में अपनी बचत लगा देते हैं . अवसर पाते ही ये विदेशी अपने शेयर बेच कर अपनी पूँजी लाभ सहित लेकर भाग जाते हैं . इस प्रकार देश का धन बाहर निकलता जाता है और रुपया कमजोर होता जाता है . देश का धन तो देश में ही घूमता रहता है परन्तु विदेशी पूंजीपतियों द्वारा बाहर ले जाया गया धन वैसे ही नहीं लौटता जैसे शरीर छोड़ने के बाद आत्मा . वित्त मंत्री चिदंबरम सभी चीजों पर सेवा कर लगा चुके हैं . यदि अगली बार इन्हें भारत की जनता अवसर देगी तो वे सरकार की आय बढ़ाने के लिए परस्पर बातचीत के लिए भी कर लगा देंगे पर उससे भी इनका पेट नहीं भर पायेगा क्योंकि पूँजीपति और उनके दलालों का पेट सम्पूर्ण ब्रह्मांड से भी बड़ा होता है .  
 रूपये में सुधार के लिए यह भी सुझाव दिए गए हैं कि सरकार  अपना घाटा कम करे . उसने जैसे ही खाद्य सुरक्षा क़ानून लागू  किया, सब जान गए कि इनके पास धन तो है नहीं . ये खाद्य सुरक्षा पर सवा लाख करोड़ रूपये व्यय करेंगे तो  भारत का बजट घाटा बहुत बढ़ जायगा . परिणाम स्वरूप रुपया और लुढ़कने लगा . सरकार के पास अब घाटा कम करने का एक ही मार्ग  बचा है कि वह बजट में अन्य  कल्याणकारी कार्यों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा और विकास के लिए कम राशि रखे , गैस, डीजल, खाद आदि की सब्सिडी समाप्त करे बिजली, पेट्रोल के रोज रेट बढ़ाए . इससे उद्योग तो भूल ही जाइये , लोगों का जीवन भी संकट में पड़ जायगा . परन्तु महान पूंजीवादी मंत्रियों को इससे क्या लेना-देना ? मंदी अमेरिका में आये और रुपया भारत का लुढ़के, भारत के प्रधान मंत्री डा मनमोहन सिंह का यही अर्थशास्त्र है .   

   प्रधान मंत्री डा सिंह बहुत सीधे , सच्चे और भोले हैं . वे जानते हैं कि देश के नेता-अफसर-कर्मचारी महाभ्रष्ट हैं . परन्तु विदेशी पूँजीपति परम दयालु हैं . वे अपने-अपने देशों से मशक्कत से धन कमाकर भारत के भ्रष्टों का पेट भरने दौड़े-दौड़े आयंगे . वे इसीलिए विदेशियों की खुशामत कर रहे हैं . वे बेचारे इससे अधिक देश के लिए और क्या कर सकते हैं ?  

वे दिन


                     वे  दिन
 अस्सी वर्ष को छूने जा रहे राज साहब अपने फ्लैट में भोजन कर रहे थे .१५ वर्ष पूर्व पत्नी का साथ छूट गया था . आज के बच्चे अपने कामों में ही  बहुत व्यस्त रहते हैं . अतः बुजुर्गो को अकेले जीने की मजबूरी भी है  . उनकी जिंदगी भी एक बाई के सहारे आगे बढ़ रही थी . बाई आती , घर की  साफ- सफाई कर देती, कपड़े  धो देती , सुबह - शाम खाना बना देती . और क्या चाहिए ? इलेक्ट्रानिक और कंप्यूटर युग ने युवाओं की व्यस्तता बढ़ा दी है, बुजुर्गों को अकेला रहने पर विवश कर दिया है पर  उसी ने उनके जीने का सहारा भी दिया है . वास्तव में टीवी बुजुर्गों और अकेले लोगों के लिए बहुत बड़ा वरदान है . सीरियल, समाचार, फ़िल्में, खेल-कूद, गाने और जीवन की अनेक खुशियों का माया जाल फ़ैलाने वाले विज्ञापन, व्यक्ति को कुछ तो पसंद आ ही जाता है  . सुबह उठे, अखबार पढ़ लिया, कुछ व्यायाम कर लिए , नहाना  धोना किया, नाश्ता किया सुबह का समय पार हो गया . एक दिन  राज साहब दोपहर का भोजन कर रहे थे , साथ में टीवी भी देख रहे थे . टीवी पर ‘भाग मिल्खा भाग’ कि कहानी और फिल्म पर चर्चा हो रही थी . उसे देखते-देखते राज साहब कहीं अतीत में खो गए .
    उन्हें बचपन के वे  दिन फिर से याद आ गए . मिल्खा सिंह की तरह वे भी उसी क्षेत्र से आये थे बस अंतर यही था कि मिल्खा जी के माता - पिता और सम्बन्धियों की आततायिओं ने हत्या कर दी थी और उनके परिवार को लोगों ने सुरक्षा देकर भारत आने में मदद की थी . १९४५ में उनकी आयु १४ वर्ष थी . वह अखबारों और सभी स्थानों पर रेडियो  का ज़माना भी नहीं था . लोग अफवाहों में जीते थे . लक्की मरवत में उनका घर बन्नू जिला मुख्यालय से तीस मील दूर था . किसानी और कुछ व्यवसाय से घर का काम  बड़ी अच्छी तरह चल जाता था . छः भाइयों में से सबसे बड़े भाई का विवाह हो चुका था . वे घर पर ही काम देखते थे .उसके बाद के दो भाई पुलिस में और तीसरा फ़ौज में भरती हो गया था . उनसे बड़े भाई ने दसवीं पास कर ली थी और वहीं क्लर्क बन गए थे . उन दिनों मुस्लिम लीग का आतंक बढ़ता जा रहा था . १९४५ के अंत में उन्होंने हवा उड़ा दी कि देश में हिन्दू मुसलमानों की हत्याएं कर रहे हैं . इससे मुस्लिमों में क्रोध बढ़ना स्वाभाविक था . परन्तु उस समय कोई दंगे नहीं हुए . उस क्षेत्र में मुसलमानों का बाहुल्य था . अतः हिन्दू डरे – डरे से रहते थे .  १९४७ में  तो यह स्पष्ट हो गया था कि भारत का विभाजन होगा और वह क्षेत्र  पकिस्तान में रहेगा . राजनीति के व्यक्ति तो यह जानते थे परन्तु जन साधारण को दंगों के भय के अतिरिक्त और कुछ पता नहीं था . राज के पिता का अपने क्षेत्र में बहुत सम्मान था . एक दिन राज ने देखा कि उनके पिता के एक मुस्लिम मित्र उनसे धीरे- धीरे कुछ बातें कर रहे थे . उनके जाने के बाद घर में भी कुछ चर्चा हुई और तय किया गया कि हालात बहुत बिगड़ने वाले हैं, अतः कुछ दिनों के लिए बन्नू में अन्य संबंधियों के साथ रहना ठीक होगा .सबसे बड़ी समस्या तो ऊँट और गाय - भैंस की थी कि उन्हें किसके भरोसे छोड़ा जाय . पर  चारों ओर से  दंगे होने  और हिन्दुओं के मारे जाने की ख़बरें हवा में विष घोल रहीं थीं . भाई पुलिस में थे ही . वे भी इसकी पुष्टि करने लगे .घर के सभी सदस्य चिंता में डूब गए थे .                 
  अंततः यह तय किया गया कि नौकरी वाले भाइयों को छोड़कर सभी लोग पूर्वी पंजाब चले जांय . संभव है चार- पांच महीने बाद हालात सुधर जाएँ तो सब वापस आ जायेंगे . राज, उनके भाई , उनके सबसे बड़े  भाई – भाभी और लगभग डेढ़ वर्ष की सुन्दर बेटी रानी तथा माता- पिता ने घर द्वार छोड़ने का निर्णय कर लिया . जब वे जाने लगे तो उनके पिता के मित्र के छह बेटे हथियार बंद होकर उनके साथ चले , उन्हें गाड़ी में बैठाया और जब गाड़ी चल पड़ी, उन्हें अलविदा कहकर वापस लौटे . घर से लेकर सारी  यात्रा का माहौल ऐसा बना हुआ था कि जरा सी आहट होती तो लगता था कि  पता नहीं क्या होने वाला है . एक दिन प्रातः लगभग ग्यारह बजे गाड़ी में बैठे तो दूसरे दिन रात्रि  में आठ-नौ बजे लाहौर पंहुचे . लाहौर प्लेटफार्म से दूर आग जलती दिख रही थी परन्तु ट्रेन के साथ कोई समस्या नहीं आई . लाहौर से पटियाला के लिए रवाना  हुए . रास्ते में रायपुर में ट्रेन बदलनी पड़ती थी . राज को इतना ध्यान है कि ट्रेन बदली तो उस समय परिवार के पास कोई पैसा नहीं था . पटियाला पहुंचे तो स्टेशन पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्त्ता मिल गए . वे सबको कैम्प ले गए जो पटियाला के महाराजा ने विस्थापितों के लिए खोल रखे थे .
      कैम्प में भोजन मिलता था परन्तु असहाय बन कर हाथ कब तक फैलाते . हर क्षण अंतरात्मा चीत्कार कर उठती . तीनो भाई मजदूरी करने लगे . सात-आठ दिन बाद एक कमरा मिल गया . सब लोग उसमें चले गये . उन दिनों मजदूरी दो रूपये मिलती थी . आटा १५-१६ रुपये मन ( लगभग ३७ किलो) था , देसी घी पांच रुपये सेर था . उन दिनों पटियाला में डालडा घी  नहीं मिलता था . सब्जियां भी सस्ती थीं . गुजारा होने लगा . मझले भाई से मजदूरी नहीं हो पाती थी अतः उसे काम  मिलने में असुविध होने लगी . वह दसवीं पास था . उसे पांच रूपये देकर काम ढूढने दिल्ली भेज दिया .
     अचानक भाभी जी बीमार हो गईं . इलाज क्या करवा पाते ! वह पंद्रह दिन में चल बसीं . घर में संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे . उन्हें अच्छी तरह याद है कि किस प्रकार मकान मालिक से १५ रूपये उधार लेकर उनका अंतिम संस्कार किया गया था . घर मातम से भर गया, ऊपर से छोटी सी बच्ची का रुदन . दादी उसे लिए रहतीं. सुबह और शाम जब कोई घर पर रहकर उसे पकड़ता तो वे  घर का काम कर पातीं . पता नहीं ईश्वर सब की कौन सी परीक्षा ले रहा था . कुछ दिन बीते नहीं कि बच्ची भी बीमार हो गई . उसे सूखा रोग हो गया .थोड़ा - बहुत जो इलाज करवा सकते थे करवाया  परन्तु उसकी हालत नहीं सुधर पाई . डाक्टरों ने जवाब दे दिया कि यह ठीक नहीं हो सकती है . असहाय होकर स्थिति को भुगतने से अधिक गरीब और कर भी क्या सकता है ?
   बाद में वहां पटियाला में  पाकिस्तान से अन्य रिश्तेदार भी आये . वहां वे सात-आठ महीने रहे . घर में सबको लगने लगा कि यहाँ भविष्य ठीक नहीं है . जब कुछ सम्बन्धी हरिद्वार जाने लगे तो हम लोग भी उनके साथ चले गए . वहां फिर पहले रिफ्यूजी कैम्प में रहना पड़ा . वहां जाकर पुनः मजदूरी करने लगे . फिर राज ने स्टेशन के बाहर मूंगफली बेचना शुरू कर दिया . रानी लगातार बीमार चल रही थी . न दूध पीती न रोटी खाती , सिर्फ थोड़ा  सा दलिया खा लेती थी . घर की समस्या पूर्ववत  थी . शाम को उसे पकड़ते तो माँ खाना बनाती .      वे स्टेशन के बाहर बैठकर मूंगफली बेचते ही थे , रानी को भी पास में बैठा लेते . पता नहीं कैसे रानी ने इच्छा व्यक्त की या उन्होंने स्वयं ही उसे मूंगफली के कुछ दाने दे दिए , उसने खा लिए . वह तो कुछ खा ही नहीं पाती  थी . न पचने वाली मूंगफली उस छोटी सी बच्ची को खिलाकर वे कितना  पछताये थे . रात भर नींद नहीं आई थी . वे सोचते जाते  कि पता नहीं उसकी तबियत कितनी खराब हो जायेगी  . रात बीत गई , उसे कुछ नहीं हुआ . सुबह वे  आश्वस्त हो गए थे कि अब रानी को कुछ नहीं होगा . उसके बाद  रानी जब भी साथ बैठती, मूंगफली मांगती ,वे  भी दे देते  , उसके लिए और कुछ तो उनके  पास था नहीं .
    कुछ दिनों बाद घर में सब का ध्यान रानी की ओर गया . वह पहले से अच्छी लगने लगी थी . यह आश्चर्य कैसे हो गया ? तब राज ने बताया था कि वह उसे मूंगफली खिलाता रहा है . कुछ ही समय में रानी स्वस्थ हो गई , सुन्दर वह थी ही . अब घर उसकी चहलकदमी से आनंदित हो उठा .
    उनको भी तो मजदूरी करने या मूंगफली बेचने में रूचि नहीं थी . मजबूरी में करना पड़ रहा था . इस मध्य बड़े भाई की दिल्ली में नौकरी लग गई तो राज भी उसके पास चले गए थे .उस समय  वह सिर्फ आठवीं पास थे .उन्होंने आई टी आई में प्रवेश लिया तो उनका  मन पसंद ट्रेड उन्हें इसलिए नहीं दिया गया कि वे १० वीं पास नहीं हैं . तब उन्होंने  आगे पढने का निश्चय किया था . दसवीं पास करने के बाद वे कैसे वायु सेना में चले  गये थे  और जिन्दगी पटरी पर चलने लगी थी . कब उनका विवाह हुआ, बच्चे हुए और परिवार बढ़ा  और फिर एक दिन जीवन संगिनी का साथ छूट गया और लगा जैसे जीवन पुनः एक छोटे से दायरे में सिमट गया हो . बेटा –पोता अच्छा काम कर रहे हैं , जीवन में देखने में तो कोई कमी नहीं दिखती है परन्तु परन्तु वे एक - एक दिन आज भी नहीं भूलते जब उन्होंने जीवन और मृत्यु को साथ- साथ चलते देखा था और पूरी तरह ईश्वर और भाग्य के आधीन हो गए थे . फिर सोचने लगे कि  वे आज भी तो कालचक्र के आधीन होकर ही जी रहे हैं . 
        


      

जेब में कानून

                             जेब में कानून
   भारत की कानून व्यवस्था विलम्ब से निर्णय देने के लिए तो कुख्यात है ही ,उसे सत्ताबल, धनबल, बाहुबल, और रिश्तेदारी से इच्छित रूप भी दिया जा सकता है , यह अनेक प्रकरणों से सिद्ध होता है . सीबीआई के दुरूपयोग के आरोप को सरकार अर्थात सत्तासीन नेता बार- बार अस्वीकार करते रहते हैं . सीबीआई द्वारा कोयला घोटाले की जांच में  केन्द्रीय क़ानून  मंत्री द्वारा किये गए हस्तक्षेप को उच्चतम न्यायालय ने  रंगे हाथ पकड़ लिया और सीबीआई को सरकार का तोता कहा . करूणानिधि ने केन्द्रीय सरकार में कांग्रेस के साथ मिलकर मंत्री मंडल बनाया था . जब उसने सरकार से अपना समर्थन  वापस लिया तो अगले ही दिन उसके पुत्र स्टालिन के भवनों पर  छापा मार दिया गया कि उसने ५ वर्ष पूर्व  एक मंहगी विदेशी कार खरीदी थी जिस पर कस्टम कर नहीं चुकाया था . करूणानिधि समझ गए कि उनकी  सारी संपत्ति को निशाना बनाया जा सकता है अतः उन्होंने विरोध के स्वर वापस ले लिए . उसके एक दिन पहले तक सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह भी केन्द्रीय सरकार को आँखे दिखा रहे थे . स्टालिन  के घर पर छापे के बाद उन्होंने भी आँखें नीची कर लीं . मायावती पहले से ही समझदार हैं . इन दोनों के पास  आय से अधिक संपत्ति होने की जांच सीबीआई कर रही है . करूणानिधि के मुंह बंद करते ही सत्तासीन नेता  कहने लगे कि सीबीआईको ऐसा नहीं करना था और उसकी सारी  कार्यवाही रुकवा दी . सरकार के पास पैसे नहीं हैं . प्रधान मंत्री बड़े भोलेपन से कहते हैं कि पैसे पेड़ों पर तो उगते नहीं हैं . वित्त मंत्री कहते हैं कि कर वसूली तेज करो और जब ये अधिकारी ऐसा करते हैं तो यही नेता उन्हें गलत कहते हैं , उनके जांच के काम को रुकवा देते हैं क्योंकि कानून उनकी जेब में है .
     जब अन्ना  हजारे ने लोकपाल के लिए आन्दोलन किया तो यही सरकारी नेता कहते थे कि कानून सड़क पर नहीं, संसद में बनता है . लेकिन जब वोट राजनीति के चलते सरकार ने खाद्य सुरक्षा कानून एक अध्यादेश द्वारा लागू करवा दिया तो संसद की बात क्यों नहीं याद आई क्योंकि कानून उनकी जेब में है . जब चाहा , जैसा चाहा कानून बनाया और लागू कर दिया . यह सरकार की इस परिभाषा को साकार करता है कि सरकार सर्वशक्तिमान और संप्रभु है और वह सब कुछ कर सकती है .
   संजय दत्त ने अंडरवर्ड के उन लोगों से चीनी बन्दूक और गोले लिए थे जिन्होंने १९९३  में मुम्बई मे विस्फोट करके लगभग ३०० लोगो की हत्या की थी , अनेक लोग घायल हुए था और संपत्ति की भारी क्षति हुई थी . पहले उस पर टाडा के अंतर्गत  केस लगाया गया  फिर उसे टाडा की धाराओं से मुक्त कर दिया गया . निचली अदालत ने उसे ६ वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई जिसे उच्चतम न्यायालय ने ५ वर्ष कर दिया क्योंकि उस अपराध में उससे कम सजा दी ही नहीं जा सकती थी . भारत की शिक्षा प्रणाली ने लोगों में  राष्ट्र चेतना समाप्त कर दी है . अतः उसके अनेक प्रशंसक सजा के विरुद्ध मुखरित हो गए . उनमें उच्चतम  न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मारकंडेय काटजू भी थे जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से सहमत नहीं थे . इसके विपरीत प्रज्ञा ठाकुर को अस्वस्थ होने के बावजूद पिछले ५ वर्षों से जमानत तक नहीं दी जा रही है और न ही अभी तक समुचित आरोप पत्र दाखिल किया गया है . उसका इतना ही अपराध कहा जा रहा है कि एक हत्या कांड में अपराधी ने उसकी मोटर साईंकिल प्रयुक्त की थी , जबकि प्रज्ञा ठाकुर का कहना है कि उसने वह मोटर साइकिल बेच दी थी परन्तु नाम नहीं बदलवा सकी थी . संजय दत्त को प्रारम्भिक डेढ़ वर्ष की जेल के बाद जमानत मिल गई थी और वह २० वर्षों से अभिनेता का अपना काम बखूबी कर रहा था . कांग्रेस के एक दिग्गज नेता हैं सज्जन सिंह जिन पर २९ वर्ष बाद १९८४ में हुए सिख दंगों के लिए अब निचली अदालत में मुकदमा चलाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया है जबकि अनेक गवाह अब इस दुनियां में नहीं होंगे . सलमान खान ने २००२ में कर सर कुछ लोगों को कुचल दिया था , ११ वर्ष बाद अब मुक़दमे के विन्दु तय किये जा रहे हैं .
  भारतीय  मछुआरों की हत्या के आरोप में इटली के दो मछुआरे पकड़ लिए गए . वे मृतक दोनों मछुआरो के परिवार को एक-एक करोड़ रूपये देने तथा उनके बच्चों को इटली में पढ़ाने का पूरा व्यय देने के लिए तैयार थे परन्तु न्यायालय ने उन्हें नहीं छोड़ा कि उचित सजा दी जायगी . बाद में इटली के राजदूत ने सर्वोच्च न्यायलय में उन्हें वापस जेल तक लाने का शपथ पत्र देकर उन्हें जमानत पर छुड़वाया और  इटली वोट डालने के नाम पर भेज दिया . परन्तु राजदूत ने उन्हें वापस लाने में असमर्थता व्यक्त कर दी . न्यायालय ने राजदूत को समन जारी किया , भारत सरकार ने उन्हें वापस आने की चेतावनी दी परन्तु उन पर कोई असर नहीं हुआ . लेकिन जब सोनिया गाँधी ने उन्हें वापस आने के लिए कहा तो वे आ गए . बाद में ज्ञात हुआ कि उन्हें आने के लिए अनेक छूटें दी गई हैं जैसे उन्हें फांसी नहीं दी जायगी, उन्हें जेल में बंद नहीं किया जायगा , वे इटली के दिल्ली स्थित दूतावास में आराम से रहेंगे और अपनी कुशल मंगल की जानकारी पुलिस को सप्ताह में एक बार देते रहेंगे . उन्हें ये विशेष छूटें किस नियम के आधार पर दी गईं ? क्या  किसी भारतीय को भी ऐसी छूट मिल सकती है ? दिन प्रतिदिन होने वाली घटनाओं में ऐसी कानूनी स्थितियां  उत्पन्न होती रहती हैं जब नेताओं और अधिकारीयों को तत्थ उनके सम्बन्धियों को छोड़ दिया जाता है और साधारण व्यक्ति के लिए सारे क़ानून एक साथ लगा दिए जाते हैं .
      जिला अदालतों में जज न्यायिक सेवाओं से आते हैं . सेक्स और हत्या के प्रकरणों में इन जजों ने जितनी तीव्रता से कुछ प्रकरण निपटाए हैं वे प्रशंसनीय हैं . उच्च एवं उच्चतम न्यायालय में अनेक जज वरिष्ठ अधिवक्ताओं में से बनते हैं जिन्हें अपराध, अपराधियों और कानून की बारीकियों का बहुत अनुभव होता है . इन्वारिष्ठ जजों को बहुत ही स्पष्ट निर्णय देने चाहिए ताकि निचली अदालतों के न्यायाधीशों को प्रकरणों को निपटाने में कानूनी दुविधाएं न हों . इसके साथ ही स्वयं को सरकार कहने और मानने वाले नेता भी कानून बनवाते समय उनमें यह स्पष्ट रूप से लिखवा दिया करें कि वे क़ानून किस पर लागू होंगे और किस नेता, अधिकारी पर नहीं, किसके पुत्र ,पुत्री, दामाद, भाई , पिता तथा अन्य सम्बन्धी पर वे लागू होंगे और किस पर नहीं . अधिक अच्छा  हो कि छूट प्राप्त  महापुरुषों के नाम ही क़ानून में लिख दिए जांय ताकि कोई कार्यवाही या  निर्णय करने वाले अधिकारी , जज दुविधा में न पड़ें और न ही उनके लिए लोगों को हड़ताल. प्रदर्शन का अवसर मिले और न ही अफसरों के ऐसे किसी कार्य के लिए सरकारी नेताओं को शर्मिंदा होने पड़े और अफसरों को उनकी बातें सुनकर अपमानित होना पड़े . फ़्रांस में १७८९ की क्रान्ति के पूर्व ऐसे स्पष्ट प्रावधान थे कि कर सिर्फ नंगी – भूखी जनता पर ही लगाए जांयगे, अमीर सामन्तो और पादरियों पर नहीं . सरकार का काम कर लेना है , देना नहीं . १९७५ में जब इंदिरा गांधी को चुनावी भ्रष्टाचार के कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने संसद की सदस्यता से वंचित कर दिया तो उन्होंने प्रधान मंत्री का पद  छोड़ने के स्थान पर आपात काल लगा दिया , सारे विपक्षियों और चूं  तक करने वाले हजारों लोगो को जेल में बंद करवा दिया और कानून पास करवा दिया कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधान मंत्री और लोक सभाध्यक्ष के विरुद्ध कोई मुकदमा नहीं चल सकता है . इसके साथ ही  नागरिकों के सारे अधिकार भी छीन लिए गए . सभी न्यायालयों ने उसी के अनुसार निर्णय दिए, किसी ने आपत्ति नहीं की और इंदिरा गाँधी प्रधान मंत्री बनी रहीं . पुनः ढुलमुल नहीं, ऐसे ही स्पष्ट कानूनों की आवश्यकता है .   

    

भारत के महान क्रन्तिकारी



                       भारत के महान क्रन्तिकारी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कितने लोगो ने अपने प्राणों की आहुति दी है , इसका लेखा- जोखा करना संभव नहीं है . अनेकों शहीदों के नाम तो ऐसे हैं जैसे किसी भवन में छुपे हुए बालू के कण हों , जिनके बिना भवन निर्माण संभव ही नहीं होता है परन्तु वे किसी को दिखाई नहीं देते हैं . क्रांतिकारियों ने अलग-अलग प्रकार से अपना जीवन न्योछावर किया . प्रस्तुत लेख में उनमें से कुछ चर्चित लोगों के जीवन का अति संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है जिन्हें फांसी पर लटका दिया गया था . ये सभी युवा क्रन्तिकारी थे .
खुदीराम बोस :बोस का जन्म ३ दिसंबर १८८९ को बंगाल प्रान्त के मिदनापुर जिले में हबीबपुर में हुआ था . १९०२-०३ में अरविन्द घोष और सिस्टर निवेदिता के क्रन्तिकारी विचारों को सुनकर बालक बोस का मन राष्ट्र सेवा के लिए उद्वेलित हो उठा . उस समय अंग्रेज अधिकारी भारतीय क्रांतिकारियों को बहुत कठोर सजाएं देते थे . बोस ने उन्हें सबक सिखाने का निश्चय किया. १६ वर्ष की आयु में उन्होंने पुलिस स्टेशन के निकट बम रखकर पुलिस अधिकारीयों को निशाना बनाया . एक जज किंगफोर्ड ने कुछ क्रांतिकारियों को  फंसी की सजा दी थी . खुदीराम बोस ने उसे बम से उड़ाने की योजना बनाई. 
    ३० अप्रेल १९०८ को जज किंगफोर्ड बग्गी में बैठकर वहां यूरोपियन क्लब में गए थे . क्लब के बाहर बोस उनकी प्रतीक्षा करने लगा . उसके एक हाथ में बम था दूसरे में भरा हुआ पिस्टल कि यदि बम का निशाना चूक गया तो गोली मार देंगे . रात्री ८.३० बजे सामने से बग्गी आती दिखी . बोस ने पोजीशन ले ली . बग्गी जैसे ही निकट आई उसने बम फेंक दिया जो निशाने पर लगा . उस बग्गी में जज के मित्र की पत्नी तथा पुत्री थीं  जो बम का शिकार हो गईं . उनकी चीख निकली . बोस को गलती का अहसास हुआ . शीघ्र ही पुलिस ने स्टेशन एवं बस स्टैंड पर अपना जाल बिछा दिया . बोस को पकड़ने के लिए रूपये १००० के पुरस्कार की घोषणा की गई .वह रात भर पैदल चलता रहा . ४० किमी चलने के बाद वह एक स्टेशन के बाहर एक टी स्टाल पर रुका और उससे पानी का गिलास माँगा . वहां पर दो सशस्त्र सिपाही भी खड़े थे . थका हुआ मलिन चेहरा एवं नंगे पैर देखकर संदेह के आधार पर उसे पकड़ लिया . उसी समय उसका एक पिस्टल भी गिर पड़ा . बोस ने उनसे छूटने का प्रयास तो किया परन्तु एक दुबला-पतला थका हुआ लड़का दो सिपाहियों से नहीं छूट पाया . पूर्व में भी उस पर हत्या के केस दर्ज़  थे . मुकदमा चला और दंड स्वरूप उसे ११ अगस्त १९०८ को फांसी दे दी गई .
   बोस के बलिदान का बंगाल ही नहीं सरे देश पर व्यापक असर पड़ा . बंगाल में तो लोग उसके नाम के दीवाने हो गए . उसके फोटो लगे वस्त्र पहने जाने लगे . महिलाओं ने उसके  नाम साडी के बार्डर पर लिखवा लिए . १९ वर्षीय खुदीराम बोस के साहस और बलिदान के लिए उसे  महान  क्रांतिकारी देश भक्त का सम्मान प्राप्त हुआ. स्वतंत्रता का अंकुर फूट कर कोपलें झाँकने लगीं .
   मदन लाल धींगरा : मदनलाल ढींगरा का जन्म अमृतसर , पंजाब में १८ फरवरी १८८३ को हुआ था .उसके पिता प्रतिष्ठित डाक्टर थे . जून १९०६ में उन्हें इंजिनीयरिंग पद्धने के लिए लन्दन भेजा गया . संपन्न परिवार का होने के कारण उन्हें किसी प्रकार की कोई कमी न थी . पढ़ाई के साथ वे अपने धर्म एवं मातृभूमि के लिए भी बहुत श्रद्धा रखते थे .वहां पर प्रसिद्ध  क्रन्तिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने ‘ इण्डिया हाउस ‘ की स्थापना की थी .उन दिनों वीर सावरकर भी उनके साथ क्रांतिकारियों को बम बनाने से लेकर विभिन्न योजनाएं बनाने तक सभी तरह के प्रशिक्षण देते थे . मदन लाल भी उनसे जुड़ गए . एक बार वहाँ विस्फोट हो गया परन्तु मदन लाल की सूझ बूझ से सब ठीक हो गया .
    सावरकर जी ने १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की ५०वीं वर्षगांठ  पर सभा की तथा  सभी भारतीयों से  कहा कि वे अपनी बांह  पर ‘1857-commemoration’(१८५७-स्मरणोत्सव )की पट्टी  लगाकर काम पर जाएँ.मदनलाल भी पट्टी लगाकर गए . एक अंग्रेज विद्यार्थी ने उस पट्टी को खींचना चाहा . ढींगरा को इतना गुस्सा आया कि उसने उसे एक जोरदार झापड़ मारा और पटक दिया तथा उसके ऊपर चाकू तानकर कहा कि हमारे देश की प्रतिष्ठा के प्रतीक को छोने का प्रयास किया तो मार डालूँगा .उस छात्र ने माफ़ी मांगी और भाग गया . एक दिन इंडिया हॉउस में युवक एकत्र थे . वे जापान –रूस युद्ध में जापान की जीत पर खुशिया मना रहे थे .वे  जापान के तारीफ़ कर रहे थे और एशिया श्रेष्ठ है (क्योंकि किसी एशियाई देश ने युद्ध में यूरोपीय देश को पहली बार हराया था ) कह रहे थे . मदन लाल को इस पर गुस्सा आ गया . उसने कहा ,’तुम लोग भारतीयों को क्या समझते हो ?’ उस समय तक लोग मदन लाल को एक खूबसूरत और शांत स्वभाव के लड़के के रूप में देखते आ रहे थे जो उससे किये गए मजाक का जवाब भी नहीं दे पाता था . उसकी उत्तेजना देख  कर वे उसका उपहास करने लगे .ढींगरा क्रोधित हो गया और उसने कैसी  भी परीक्षा लेने की उन्हें चुनौती दी. उसकी बहादुरी देखने के लिए एक सुई उसकी हथेली में चुभाई गई . उसके हाथ से खून निकलता रहा परन्तु वह मुस्कुराता रहा .
   धीरे- धीरे मदन लाल ब्रिटेन के विरुद्ध होते गए . वहां एक संगठन और भी था – ‘नेशनल इंडियन असोसिएशन ‘. उसका उद्देश्य था ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों को ब्रिटेन का भक्त बनाना . ढींगरा उससे भी जुड़ गए . एक दिन वहाँ पर वहां संगीत कार्यक्रम था . उसमें असोसिएशन का सदस्य लार्ड कर्जन विली भी आया जो भारत में एस्टेट सेक्रेटरी रहा था और भारतीयों पर अत्याचार करने के लिए कुख्यात था . ढींगरा ने उसके निकट जाकर ५ गोलिया चलाईं . एक पारसी कोवासी लालकामा उसे पकड़ने के लिए लपका . ढींगरा ने छठी गोली उसे मार दी . वह भी मर गया .
    परिणाम तो निश्चित था .१९०९ में उन्हें वहीँ जेल में फांसी दे दी गई . उनके बलिदान से पंजाब में भगत सिंह एवं ऊधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों को बहुत प्रेरणा मिली .
ऊधम सिंह : उनका जन्म २६ दिसंबर १८९९ को  सुनाम पंजाब में हुआ था .बचपन का नाम शेर सिंह था . १९०१ में माता तह १९०७ में पिता के देहांत के बाद उन्हें  और उनके भाई मुक्ता  सिंह को केन्द्रीय खालसा अनाथालय पुतलीघर, अमृतसर में लाया गया . वहां उनका नाम रखा गया ऊधम सिंह .१९१७ में भाई का भी निधन हो गया .उन्होंने १९१८ में हाई स्कूल पास किया और १९१९ में अनाथालय छोड़ दिया .
   १९१९ में अमृतसर में जलियांवाला बाग़ में सभा करती हुए जन समूह पर  डायर ने
अंधाधुंध गोलियां चलाकर नृशंस जन संहार किया था . उसके विरुद्ध सारे भारत में तीव्र आक्रोश था . ऊधम सिंह तो अमृतसर का ही रहने वाला था जहां यह घटित हुआ . उसने प्राण किया कि वह इसका बदला लेकर रहेगा . दिल में इसी आग को लेकर वह क्रन्तिकारी बन गया .
   वह १९२० में अफ्रीका गया ,१९२१ में नैरोबी में रहा . उसने अमेरिका जाने का प्रयास किया परन्तु सफल नहीं हुआ और १९२४ में भारत लौट आया. उसी वर्ष वह अमेरिका चला गया. वहां वह ग़दर पार्टी का सदस्य बन गया जो अमेरिका में क्रांतिकारियों को संगठित कर रही थी . वहां तीन वर्ष कार्य किया . १९२७ में वापस लौटे तो उनके साथ २५ साथी भी थे . वे अपने साथ पिस्तौलें और कारतूस भी लेकर आये . इस समय तक उनका संपर्क भगत सिंह से हो चुका था .
 वे ३० अगस्त १९२७ को अमृतसर में पकडे गए . उनके पास बिना लाइसेंस के पिस्तोलें और कारतूस के साथ ही ग़दर पार्टी का साहित्य भी मिला जिसके लिए उन्हें ५ वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा हुई . ४ वर्ष बाद छोटे तो गृह नगर सुनाम आये . वहां पुलिस का अधिक दबाव था .अतः पुनः अमृतसर  लौट आये तथा मोहम्मद सिंह आजाद के नाम से पेंटर की दूकान खोल ली. क्रांतिकारी होने के कारण  पुलिस पीछे लगी ही रहती थी  और वे क्रन्तिकारी कम छोड़ नहीं सकते थे , अतः उन्होंने अपने कई नाम बदले –शेर सिंह , ऊधम सिंह, उदे  सिंह, उदय सिंह ,फ्रैंक ब्राजील और अंतिम सर्वधर्म नाम राम मोहम्मद सिंह आजाद रखा .
   तीन वर्ष बाद पुनः यात्राएं प्रारंभ कीं .१९३४ में  पहले कश्मीर गए , वहां से जर्मनी और वहां से इंग्लैण्ड  पहुंचे और  वहीँ रहने लगे .परन्तु पुलिस के दबाव के कारन पुनः भारत आ गए. कुछ समय बाद वे इटली गए , वहां से फ़्रांस , स्विटज़रलैंड ,आस्ट्रिया होते हुए १९३४ में ही इंग्लॅण्ड पहुँच गए . वहां कर ले ली ताकि स्वतन्त्र रूप से आ-जा सकें और इन्डियन वर्कर्स असोसिएशन के सदस्य बन गए . वहां वे चुपचाप कम करने लगे .
     १३ मार्च १९४० को लन्दन के कैक्सटन हाल में एक सभा थी जिसमें जलियांवाला के हत्यारे माइकेल ओ’ डायर को भाषण देने आना था . उन्होंने एक आधुनिक पिस्तौल ली तथा उसे एक मोटी किताब के अन्दर के पन्ने काट कर रख लिया . वे २१ वर्षों से डायर की तलाश कर रहे थे . सभा के अंत में जैसे उन्हें अवसर मिला डायर को शूट कर दिया . उन्हें पकड़ने के लिए भारत के लिए सचिव जेटलैंड दौड़े , उन्हें भी गोली मार दी , लुईस डेन और लार्ड लेमिंगटन भी उन्हें पकड़ने के लिय आगे बढ़े ,उन्हें भी गोली मर दी . शेष तीनों लोक बुरी तरह घायल होकर गिर पड़े . वे गिरफ्तार हुए . ३१ जुलाई १९४० को उन्हें पेंटन विले जेल में फंसी दे दी गई . जलियाँ वाला कांड आज तक नहीं भूलता , तब कैसे भूलता ! उनके साहस पूर्ण कार्य से समस्त भारत में उनकी प्रशंसा हुई . जुलाई १९७४ में उनके अस्थि अवशेष इंग्लैण्ड से भारत लाये गए और शहीद का सम्मान दिया गया .  
             चंद्रशेखर आजाद –बिस्मिल- भगत सिंह समूह  
  आज़ाद ,बिस्मिल ने पहले हिंदुस्तान रिपब्लिक असोसिएशन एच आर ए) नामक संघठन  बनाया था . बाद में भगत सिंह के कहने पर उसका नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक असोसिएशन ( एच .एस.आर.ए.) कर दिया गया  .उन दिनों कानपुर, बनारस ,अमृतसर, लाहौर जैसे शहर क्रांतिकारियों के गढ़ बने हुए थे . देश के विभिन्न भागों से यहाँ पढ़ने के लिए आने वाले युवा इस संघसे जुड़ते जा रहे थे और देश की स्वतंत्रता के लिए क्रन्तिकारी कार्यों में सहयोग कर रहे थे . इनमें से अधिकांश क्रांतिकारियों पर आर्य समाज का बहुत प्रभाव था . क्योंकि तिलक से बहुत पहले सर्वप्रथम स्वामी दयानंद सरस्वाती ने आर्य धर्म की पुनरस्थापना करते हुए कहा था कि स्वतंत्रता मनुष्य का मौलिक अधिकार है . अमृतसर में १३ अप्रेल १९१९ को हुए जलियांवाला बाग़ के नर संहार से सभी क्रन्तिकारी बहुत उत्तेजित थे और अंग्रेजों के विरुद्ध प्रबल संघर्ष के पक्ष में थे .  इनमें से अधिकांश युवक प्रारंभ में गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रहे परन्तु उनके द्वारा आन्दोलन बीच में ही स्थगित करने से इन्हें बड़ी निराशा हुई और वे क्रन्तिकारी हो गए , उन्होंने अपना पृथक संघठन बना लिया .   क्रांतिकारियों को कोई आर्थिक सहयोग नहीं देता था . अंग्रेजी सरकार के डर से लोग उनसे मिलने में भी डरते थे . क्रांतिकारियों के मुखबिर भी बहुत होते थे . अतः वे सार्वजानिक रूप से  तो काम कर नहीं सकते थे तथा  बिना धन के जीवन यापन करना और क्रांति के लिए संसाधन जुटाना संभव नहीं था . अतः धन के लिए चन्द्र शेखर आज़ाद, बिस्मिल , रौशन सिंह आदि ने २५ दिसंबर १९२४ को साहूकार और शुगर किंग के नाम से मशहूर बलदेव प्रसाद के घर ४००० रुपये की लूट की . उन्हें मारने के लिए आगे आये उसके गन मैन  को रौशन ने मार डाला तथा उसकी बन्दूक छीन ले गए . इसके पश्चात उन्होंने उत्तर प्रदेश में काकोरी स्टेशन के पास ९ अगस्त १९२५ को  ट्रेन से सरकारी खजाना लूट लिया .आज़ाद को छोड़कर इसके सभी आरोपी राम प्रसाद ‘बिस्मिल‘ ,अशफाकुल्लाह खान,ठाकुर रौशन सिंह और राजेंद्र लाहिड़ी,बनवारी लाल आदि पकडे गए . बनवारी लाल सरकारी गवाह बन गया , उसे ५ वर्ष की कैद हुई . उन पर मुकदमें  चले और अलग – अलग जेलों में फांसी दी गई . उत्तर प्रदेश में दिसंबर १९२७ की तारीख १७ को राजेंद्र लाहिड़ी को गोंडा में ,तथा १९ को ही तींनों  क्रन्तिकारियों, राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ को गोरखपुर में, अशफाकुल्लाह खान को फैजाबाद में तथा ठाकुर रौशन सिंह को गोंडा जेल में फांसी दी गई . भारत में जब साइमन कमीशन आया तो लोगों ने देश भर में उसका विरोध किया .  अमृतसर  में प्रदर्शन कारियों पर २० अक्टूबर १९२८ को डिप्टी एस पी सांडर्स के नेतृत्व  में पुलिस ने बहुत लाठियां  बरसाईं जिसमें अत्यंत प्रतिष्ठित नेता लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और दिनांक १७ नवम्बर १९२८ को उनका देहांत हो गया . इससे क्रांतिकारियों का खून खुल उठा और उन्होंने सांडर्स से बदला लेने का प्राण किया . आजाद्द, भगत सिंह . राजगुरु आदि ने अवसर पाकर १७ दिसंबर १९२८ को सांडर्स पर हमला कर दिया . उसे राजगुरु ने शूट कर दिया .अंग्रेजों द्वारा किये जा रहे जुल्मों के विरुद्ध जन जागृति उत्पन्न करने के लिए ८ अप्रेल १९२९ को भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने सेट्रल लेगिस्लेटिव  असेम्बली दिल्ली में दो बम तथा इन्कलाब ज़िन्दाबाद के नारे लगाते हुए क्रन्तिकारी पर्चे भी फेंके . इससे वहाँ अफरा-तफरी मच गई . बम किसी को मरने के लिए नहीं फेंके गए थे , न ही उनसे कोई घायल हुआ . दोनों क्रांतिकार पकड़ लिए गए . बाद में सुखदेव तथा राजगुरु भी पकड़ लिए गए . जेल में  भारतीय राजनीतिक बंदियों से भेदभाव पूर्ण व्यव्हार करने के कारण भगत सिंह एवं सुखदेव ने ११६ दिनतक भूख हड़ताल की . लाहौर की जेल में २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई . बटुकेश्वर दत्त को काले पानी की  सजा हुई .
सरदार भगत सिंह :  उनका जन्म पंजाब के लायलपुर जिले के जरांवाला ( वर्तमान पाक )में २८ सितम्बर १९०७ को हुआ था . उनके दादा दयानंद के अनुयायी थे तथा पिता एवं चाचा ग़दर पार्टी के सदस्य थे . उन्होंने डी ए वी स्कूल में शिक्षा प्राप्त की . १९२० में महात्मा गाँधी के आन्दोलन में सक्रिय  रहे , १९२३ में लाहोर में कालेज में सक्रिय रहे . उन्होंने नौजवान भारत सभा की स्थापना १९२६ में की .वे कीर्ति किसान पार्टी के नेता बने तथा बाद में  आज़ाद के संघठन हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन  असोसिएशन के सदस्य बने . शादी से बचने के लिए १९२७ में कानपुर चले गए . उन्होंने पजाब में उर्दू एवं पंजाबी  समाचार पत्रों का सम्पादन तथा दिल्ली में वीर अर्जुन समाचार पत्र में  भी काम किया . उन्हें २३ जुलाई १९३१ को लाहोर जेल में शहीद किया गया .
 सुखदेव थापर :लुधियाना में १५ मई १९०७ को जन्म हुआ . १८ अक्टूबर १९२८ को लाहोर षड्यंत्र केस में उनका नाम चर्चित हुआ २३ मार्च  १९३१ को लाहोर में फंसी दी गई .
शिवराम हरि राजगुरु : पूना जिले में खेड़ में १९०६ में ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ . परिवार के साथ बचपन में ही बनारस आ गए थे . वहीं पर शिक्षा प्राप्त की . देश की स्वतंत्रता उनका एक मात्र ध्येय था .वहीँ पर आज़ाद, भगत सिंह जतिन दस के संपर्क में आकर क्रन्तिकारी हो गए .वे पार्टी के शूटर कहे जाते थे . सांडर्स की हत्या के आरोप में ३० सितम्बर १९२९ को पकडे गए . भगत सिंह के साथ २३ मार्च १९३१ को लाहोर में फांसी दी गई . 
बटुकेश्वर दत्त : बंगाल के बर्दवान जिले में १८ नवम्बर १९१० को ब्राह्मण परिवार में जन्म हुआ . उनकी प्रारम्भिक शिक्षा कानपपुर में हुई .१९२४ में आज़ाद , भगत सिंह के संपर्क में आए . भगत सिंह के साथ लाहोर जेल में मुकदमा चला . उन्हें आजीवन काले पानी कि सजा हुई .  वे कुख्यात अंडमान जेल में बंद रहे . उन्हें टी बी हो गई थी .१९३७ में उन्हें भारत लाया गया . वे १९३८ में जेल से छूटे . १९४२ में  भारत छोड़ो  आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भाग लिया जिसके लिए पुनः ४ वर्ष की जेल हुई .१९४७ में अंजलि से विवाह किया . स्वतंत्रता के बाद उन्हें किसी ने नहीं पूछा . १९६५ में उनका लम्बी बीमारी के बाद देहांत हो गया . उनका संस्कार हुसैन्वाला में किया गया जहां वर्षों पूर्व भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव का संस्कार किया गया था .
पंडित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ : उत्तर प्रदेश  में शाहजहाँपुर में जन्म हुआ .बचपन में आर्य समाज का प्रभाव पड़ा . वे हिंदी,संस्कृत, उर्दू, बंगाली और अंग्रेजी के ज्ञाता थे काकोरी केस में जेल हुई .जेल में उन्होंने लम्बी जेल डायरी लिखी जो बाद में प्रकाशित हुई . वे प्रसिद्ध शायर एवं कवि
थे .उनकी इस शायरी ने जवानों को आज़ादी के लिए मर-मिटने की प्रेरणा दी :
 सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोश कितना बाजुए कातिल में है .
वक्त आने दे तुझे बता देंगे ऐ आसमां    
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है .
१९ दिसंबर १९२७ को गोरखपुर जेल में फांसी हुई .
अश्फाकुल्लाह खान :शाहजहांपुर में २२ अक्टूबर १९०० को जन्म हुआ . अशफाकुल्लाह का बड़ा भाई बिस्मिल का सहपाठी था जो उसे बिस्मिल के विचारों और शायरी के बारे में बताता रहता था . अशफाकुल्लाह की बिस्मिल में रूचि बढती गई . वे बिस्मिल से शायरी प्रेम के कारण मिले और आजादी के दीवाने हो गए . काकोरी केस के बाद वे बचकर  दिल्ली चले गए और कोई काम करने लगे . वे ग़दर पार्टी से जुड़ने के लिए अमेरिका जाने का प्रयास कर रहे थे कि एक गद्दार ने मुखबरी करके उन्हें पकड़वा दिया .उन्हें  फ़ैजाबाद में १९ दिसंबर १९२७ को फांसी दी गई .  वे कहते थे कि उनके जाने के बाद उनके मित्र और बंधु रोएंगे पर वे उनके ठन्डे खून और राष्ट्र के प्रति उदासीन भाव के कारण रोते थे . वे बच्चों  और बुजुर्गो को न रोने के लिए भी कहते कि वे अमर हैं , अमर हैं . वे हसरत एवं नाम से शायरी करते थे :
किए थे काम हमने भी जो कुछ हमसे बन पाए
ये बातें तब की हैं , आज़ाद थे और था शबाब अपना
मगर अब जो भी उम्मीदें हैं , बस वो तुमसे हैं ,
जवान तुम हो लबे-बाम , आ चुका है आफ़ताब अपना .
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जाऊंगा खाली हाथ मगर ये दर्द भी साथ जायेगा
जाने किस दिन हिंदुस्तान , आज़ाद वतन कहलायेगा ?
बिस्मिल हिन्दू हैं , कहते हैं , “फिर आऊँगा, फिर आऊँगा
फिर आ के ऐ भारत माँ , तुझको आज़ाद कराऊंगा
जी करता है, मैं भी कह दूं, पर मजहब से बंध जाता हूँ
मैं मुसलमान हूँ,पुनर्जन्म की बात नहींकर पता हूँ .
हाँ, खुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूंगा,
और जन्नत के बदले , उससे याक पुनर्जन्म ही मांगूंगा .
राजेंद्र लाहिड़ी : बंगाल के पबना जिले में लाहिड़ी मोहनपुर (वर्तमान  बंगला देश )में  ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म २३ जून १९०१ को  हुआ था . उनके पिता क्षितिज मोहन की बंगाल एवं बनारस में काफी भूमि एवं संपत्ति थी . वे बनारस में पढ़े तथा एम ए के विद्यार्थी थे जब क्रन्तिकारी कार्यों से आज़ाद – भगत सिंह के साथ जुड़ गए . दक्षिणेश्वर बम केस में शामिल थे .काकोरी केस के बाद पकडे गए . उन्हें दो दिन पूर्व १७ दिसंबर को गोंडा (उ प्र) में फांसी दी गई .
 ठाकुर रौशन सिंह : शाहजहांपुर के नवादा में २२ जनवरी १८९२ को उनका जन्म हुआ . वे पहलवान तथा अच्छे निशाने बाज थे . आर्य समाज में उनकी  आज़ाद से  भेंट हुई . वे उनके साथ जुड़ गए . वे क्रांतिकारियों को शूटिंग सिखाते थे . १९२१-२२ में बरेली शूटिंग केस में उनका नाम था . वे काकोरी केस में सम्मिलित नहीं थे . बिस्मिल के साथ उन्हें भी फांसी हुई . वे विवाहित थे . उनके शहीद होने के बाद उनके परिवार को बहुत कष्ट उठाने पड़े . आर्थिक संकट तो था ही , जब उनकी लड़की का कहीं रिश्ता तय होने लगता पुलिस वाले लड़के वालों को धमका देते थे . आज़ादी के पहले क्या आज़ादी के बाद भी उनके परिवार को किसी ने नहीं पूछा . उनका क़स्बा आज भी उतना ही पिछड़ा है जितना उस समय था .
चन्द्र शेखर आज़ाद : पिता पंडित सीता राम तिवारी तथा माता जगरानी देवी के पुत्र चन्द्र शेखर आज़ाद का जन्म उ.प्र. के उन्नाव जिले बदरका गाँव में २३ जुलाई १९०६ को हुआ था . उनके पिता मध्य प्रान्त में अलीराजपुर एस्टेट की सेवा में थे . अतः उनका बचपन अलीराजपुर में बीता .  माँ ने संस्कृत पढने के लिए बनारस भेजा जहां वे क्रन्तिकारी बन गए . उन्हें जब पहली बार जेल हुई और मुकदमा चलाया गया तो उन्होंने जज के प्रत्येक प्रश्न जैसे नाम क्या है ,पिता का नाम क्या है , आवास कहाँ है आदि का एक ही उत्तर दिया –‘आज़ाद ‘. उन्होंने १९२६ में वायसराय की ट्रेन को उड़ाने का प्रयास किया , वे काकोरी कांड के मुखिया थे ही , १९२८ में सांडर्स की शूटिंग में भी शामिल थे . शूटिंग के बाद पीछा करने वाले चानन  सिंह को  उन्होंने गोली मार दी थी . पुलिस उन्हें कभी  नहीं पकड़ सकी . वे अपना पैसा इलाहबाद में जिस मित्र के पास सुरक्षित रखते थे , उससे धन प्राप्त करने के लिए वे अल्फ्रेड पार्क में प्रतीक्षा कर रहे थे . उसने गद्दारी करते हुए पुलिस को सूचना दे दी . पुलिस की फ़ौज ने उन्हें घेर लिया . वे बरगद के वृक्ष की आड़ में छुप कर उनका सामना करने लगे . उन्होंने तीन पुलिस वाले मार गिराए . जब अंतिम गोली बची तो स्वयं अपनी कनपटी पर मार कर आत्मोत्सर्ग कर दिया और अंत तक अपने आज़द नाम को सार्थक किया (२७ फरवरी १९३१).  
  

                              

मोदी का संसार

                         मोदी का संसार

 मोदी के संसार के दो भाग हैं – बाहरी  संसार और आतंरिक संसार . पहले बात बाहरी  संसार की करते हैं . मोदी के बाहरी संसार में तीन प्रकार के लोग हैं – पहले ठग ,दूसरे वे लोग जिन्हें कुछ कहना है , उसकी सार्थकता हो या न हो और तीसरे दर्शक जिनके मन में कोई नहीं जानता कि क्या है . ठगों की बात समझने के लिए एक लोक कथा कहता हूँ . एक सीधा-सादा ब्राह्मण एक दिन बड़े उत्साह से एक बकरी खरीद कर ले जा रहा था . उसे  रास्ते में चार ठग मिले . उन्होंने उसकी बकरी ठगने की योजना बनाई . चारों ठग रास्ते में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर अलग -अलग  स्थानों पर खड़े हो गए . जब ब्राह्मण उनके पास आता तो वे उससे ऐसे घुलमिल जाते जैसे वे उसके बहुत हितैषी हों . फिर बातों में उलझाकर उसे समझाते कि यह कुत्ता किसके लिए ले जा रहे हो . एक के बाद एक उन चारों  ठगों ने बार- बार एक ही बात कही वह कुत्ता कहाँ ले जा रहे हो . उन्होंने  ब्राह्मण को पूरा विश्वास  दिला दिया कि वह बकरी नहीं है, कुत्ता है  और चौथे ठग के बाद तो वह इतना क्षुब्ध हो गया कि उसने कुत्ता समझ कर बकरी रास्ते में ही छोड़ दी जिसे लेकर ठग भाग गए . विभिन्न चैनेलों पर बैठे खूबसूरत एंकर जिस प्रकार मोदी के विरुद्ध माहौल बना रहे हैं , जिस प्रकार उनकी सही बातों को भी मीडिया घुमा-फिराकर कह रहा है , वे उन ठगों की ही  भांति मोदी को घेरने में लगे हैं . देखें मोदी उनसे कब तक बच पाते हैं .
  दूसरी लोक कथा में एक पिता एवं उसका पुत्र एक गधे के साथ यात्रा पर जा रहे थे . वे गधे के साथ  पैदल चल रहे थे . उन्हें देखकर लोग कहने लगे कि ये कैसे मूर्ख हैं ! साथ में गधा है फिर भी पैदल चले जा रहे हैं . पिता ने पुत्र को गधे पर बैठा दिया और स्वयं पैदल चलने लगा तो लोग कहने लगे  कि लड़के को देखो, वृद्ध पिता तो पैदल चल रहा है और स्वयं  गधे पर बैठ कर जा रहा है . बेटे को बहुत बुरा लगता है . वह स्वयं गधे से उतर जाता है और पिता को बैठा देता है . फिर लोग कहते हैं कि देखो, पिता खुद तो आराम से गधे की सवारी कर रहा है और लड़के को पैदल चला रहा है .  लोगों के तानों से बचने के लिए पिता-पुत्र दोनों गधे पर बैठ गए . तब देखने वालों ने कहा कि देखो, ये कितने निर्दयी हैं, दोनों एक साथ गधे पर बैठ गए हैं, उस बेचारे को कितना कष्ट हो रहा होगा ! लोगों को संतुष्ट करने के लिए अंत में उन्होंने गधे के पैर बांधे और उसमें एक मजबूत डंडा लगाकर  उसे उठा कर चलने लगे तो लोग उनकी खिल्ली उड़ाने लगे कि देखो ,ये कितने मूर्ख हैं, गधे पर बैठने के बदले उसे लाद  कर ले जा रहे हैं . अर्थात दुनिया वाले अकारण ही दूसरों की आलोचना करते हैं जिनसे उनका कोई वास्ता तक नहीं होता है . अतः अनेक लोग  मोदी के प्रत्येक काम की आलोचना करेंगे , वह काम भले ही कितना भी अच्छा हो . जैसे ‘पिल्ला काण्ड’ हो गया . मोदी ने इतना कह दिया था कि यदि गाड़ी के नीच पिल्ला आकर दब जाए तो उसका भी बहुत दुःख होता है , बस विरोधी नेता और मिडिया पिल्ला मय हो गए .
                             राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भूमिका
   जहां तक मोदी के आतंरिक संसार का प्रश्न है तो उसका प्रथम आधार  संघ अर्थात राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ है . संघ एक हिन्दू संघठन है और भारत का इतिहास बताता है कि हिन्दू राजनीति में फिस्सडी रहे हैं . अतः संघ भी उनसे भिन्न नहीं है . इतिहास में यदि  हिन्दू  राजनीतिज्ञों के नाम लें तो मुख्य रूप से चाणक्य, शिवाजी, छत्रसाल और सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम सामने आते हैं . १९७७ में आपातकाल के बाद जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया . जनता पार्टी के शासन काल में संघ समर्थकों ने चौधरी चरण सिंह और बाबू जगजीवन राम का  भरपूर समर्थन  किया . जब चरण सिंह प्रधान मंत्री देसाई के विरुद्ध षड्यंत्र करने लगे तो देसाई ने उन्हें  मंत्री मंडल से बाहर निकाल दिया . तब अटल बिहारी बाजपेई और आडवाणी ने देसाई पर दबाव बनाकर उनको पुनः मंत्रिमंडल में स्थान दिलवाया . वे सोचते थे कि इससे उनकी किसानों के मध्य प्रतिष्ठा और प्रभाव बढ़ जायगा . परन्तु चरण सिंह ने शीघ्र ही इंदिरा गाँधी के साथ मिल कर देसाई सरकार को गिरा दिया ..  जनता पार्टी में  जगजीवन राम का समर्थन करके संघ समझता था कि दलितों में उसका प्रभाव बढ़ जाएगा .परन्तु उन्होंने भी संघियों को साम्प्रदायिक कह कर जनता में अपने सम्मान की रक्षा की . और तो और १९७७ में जनता पार्टी में संघ के जो लोग जीत कर सांसद या विधायक बने थे , जनता पार्टी के शासन काल में वे भी संघ के लोगों को दूर रहने के लिए कहते थे ताकि उन्हें समाजवादी और अन्य लोग सांप्रदायिक न कहें . जनता पार्टी के विघटन के बाद सबने संघियों को साम्प्रदायिक कहकर पृथक कर दिया तो उन्होंने  भारतीय जनता पार्टी बनाई . उस समय मीडिया में साम्यवादी हावी थे . उन पर सांप्रदायिक होने का ऐसा माहौल बनाया गया कि १९८० के चुनावों में भाजपा पूरी तरह साफ़ हो गई . १९८९ में इन्होंने वी पी सिंह , विद्याचरण शुक्ल का साथ दिया . भाजपा के सहयोग से  वी पी सिंह प्रधान मंत्री बन गए और भाजपा सांप्रदायिक पार्टी घोषित की गई . भाजपा ने दो बार मायावती को मुख्य मंत्री बनवाया, उसने भी भाजपा को सांप्रदायिक करार  दिया . और बसपा ने अभी – अभी अपने एक सांसद को इसलिए पार्टी  से निकाल दिया कि उसने मोदी की उस बात का समर्थन कर दिया था जिसमें उन्होंने स्वयं को  राष्ट्रवादी हिन्दू कहा था . ब्राह्मणों का पूरा समर्थन प्राप्त करने की आकांक्षा रखने वाली सेकुलर मायावती जानती हैं कि स्वयं को ‘हिन्दू’ कहना ही साम्प्रदायिक होने का स्पष्ट प्रमाण है . २००४ में बाजपेई सरकार में सम्मिलित एन डी ए के अनेक घटक सदस्य भाजपा पर प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष रूप से साम्प्रदायिकता का आरोप लगाते हुए उससे अलग हो गए और अब मोदी के नाम पर उसका प्रमुख सहयोगी जनता दल  (यू ) भी उससे साम्प्रदायिकता के नाम पर ही अलग हो गया . अतः संघ की सक्रियता मोदी को प्रधान मंत्री बना पाएगी , पूर्णतयः संदिग्ध है .
   जहां तक मोदी के भाजपा सहयोगियों की बात है तो अधिकाँश भाजपा नेता उनके अक्खड़ स्वभाव से सशंकित हैं कि वे कब , किसे दूर कर दें, पता नहीं . मोदी प्रधान मंत्री तभी बन पायेंगे जब एनडीए का संसद में बहुमत हो और एनडीए के सभी सदस्य उन्हें समर्थन दें . भाजपा के हाथ से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड  और कर्नाटक  की सत्ता खिसक चुकी है अर्थात  उन प्रदेशों में भाजपा की  पूर्ववर्ती सरकारें लोकप्रिय नहीं थीं . मध्य प्रदेश में २००३ में भाजपा इसलिए नहीं जीती कि उसे लोकप्रियता प्राप्त थी अपितु इसलिए जीती कि लोग  कांग्रेस के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से त्रस्त  थे . एक तो वे ऐसे राजा थे जो आदिवासियों से बेहद प्यार करते थे . उन्होंने अपने अधिकाँश अधिकारी प्रदेश भर में सड़कें खोदने और बिजली के तार नोचने में लगा दिए थे ताकि सारे प्रदेश को आदिवासी प्रदेश बनाया जा सके . लोग इससे नाराज हो गए . दूसरी समस्या यह थी कि कर्मचारियों को उनके फंड से भी समय पर पैसा नहीं दिया जाता था कि सरकार के पास पैसा नहीं है . कर्मचारी संघ जब भी उनके पास कोई मांग लेकर जाते थे,  उनका व्यवहार अहंकार युक्त तथा उपेक्षा पूर्ण रहता था .  जिससे कर्मचारी वर्ग चिढ़ गया और २००३ में कांग्रेस को  हरवा दिया . कांग्रेस के नेता भी उनसे खुश नहीं थे क्योंकि उनका सभी मंत्रियों के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप था और विधायकों की चलती नहीं थी . कमजोर दिग्गी  राजा उमा भाभरती के प्रबल हमलों को नहीं सह सके और भाजपा  जीत गई थी . २००८ में भी दिग्गी राजा सामने थे . अतः लोग पुनः सतर्क हो गए . इसलिए महामंत्री के रूप में वे देश में जहां – जहां गए कांग्रेस हार गई . वर्तमान में कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी का प्रभाव मध्य प्रदेश में रहेगा और सफलता की सम्भावना कम है .
    छत्तीस गढ़ में मुख्यमंत्री अजीत जोगी के भ्रष्टाचार के अनेक किस्से लोगों की जुबान  पर थे . श्यामा चरण शुक्ल ने मध्य प्रदेश का मुख्य मंत्री रहते और विद्याचरण शुक्ल ने केन्द्रीय मंत्री रहते छत्तीस गढ़ के लिए कुछ नहीं किया था . अतः वहां कांग्रेस की हार निश्चित थी . वर्तमान परिस्थितियों में इन दोनों राज्यों में भाजपा आगे रहेगी , उत्तराखंड में सरकार के निकम्मेपन का आक्रोश भी कांग्रेस को भुगतना होगा . गुजरात – गोवा भी भाजपा के पास हैं . परन्तु भाजपा अपने बलबूते पर  केंद्र में सरकार बना पायेगा , वर्तमान में ऐसी कोई सम्भावना नहीं दिखती है .   
  भारत में भाजपा और कांग्रेस केवल दो ही दल नहीं हैं . तमिलनाडु, बंगाल ,आन्ध्र प्रदेश , उड़ीसा , केरल जैसे अनेक  राज्यों में भाजपा हाशिये पर है . वहां किसी चमत्कार की सम्भावना भी नहीं है . बाजपेई जी भी प्रधान मंत्री तभी बन पाए थे जब एन डी ए के संयोजक जार्ज फर्नान्डीज़ सभी घटकों को साथ मिलाए रखते थे . अभी यह कार्य शरद यादव कर सकते थे परन्तु मोदी के नाम पर वे स्वयं ही अलग हो गए . भाजपा में अन्य दल के  लोगों को एक साथ लाने  की  कला केवल शिवराज सिंह चौहान में ही है . अभी तो वे अपने प्रदेश को बचाने में लगे हैं कि हार किसी भी कारण से हो गई तो वे बहुत पीछे हो जायेंगे . वे  तभी यह प्रयास करेंगे और प्रयास सफल भी हो सकते हैं जब वे स्वयं या राजनाथ प्रधान मंत्री पद के दावेदार हों . वर्तमान में भारत में जनतंत्र नहीं सामंत वाद हावी है जिसमें वही प्रधान मंत्री बन पायेगा जो अधिकाँश सामंतों को अपने पक्ष में कर लेगा और सामंत उसके पक्ष में तभी होंगे जब वे आश्वस्त हो जायेंगे कि सरकार में उन्हें अधिकतम हिस्सा मिल रहा है और वे अपने विभाग स्वेच्छा से चला पायेंगे . नमो से ऐसी आशा  कोई सामंत रख पायेगा , अभी तो इसकी संभावना नहीं है . राजनाथ को शिवराज की अपेक्षा भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का समर्थन जल्दी मिल जायेगा . अतः पहले यदि उन्हें आगे करके शिवराज सिंह चौहान प्रयास करेंगे तो भाजपा और एन डी ए को अधिक लाभ होगा . अभी तो एन डी ए में कोई सक्षम संयोजक भी नहीं है .

     रजत पथ में यह पूर्व में लिखा जा चुका है कि मीडिया पूरा प्रयास करेगा कि भावी प्रधान मंत्री के लिए भाजपा नरेंद्र मोदी का नाम घोषित कर दे जिससे जनता दल (यू) उससे अलग हो जाय . इसके बाद सेकुलर और साम्प्रदायिकता का ताना-बाना बुनकर कांग्रेस के नेततृत्व  में पुनः ऐसी सरकार बना दी जाए जो भारत में विदेशियों को सर्वाधिकार प्रदान कर दे . लेख में यह भी लिखा था कि पार्टी एवं जन हित में मोदी स्वयं प्रधानमन्त्री पद  की दावेदारी छोड़कर सहयोग देंगे परन्तु वर्तमान में ऐसा नहीं लगता है . मोदी स्वयं को अघोषित प्रधान मंत्री पद का उम्मीदवार ही नहीं, प्रधान मंत्री ही मान कर चल रहे हैं . आत्म विशवास अच्छा होता है परन्तु यह वास्तविकता के धरातल पर होना चाहिए . यदि यह क्लाइव और सिराजुद्दौला जैसी आमने – सामने कि  सैनिक लड़ाई होती तो एक बार माना जा सकता था कि मोदी बड़े योद्धा हैं और युद्ध जीतकर  सिंहासन पर बैठ जाएंगे परन्तु यहाँ तो करोड़ों मतदाताओं के मत का सवाल है जो देश में दूर- दूर तक फैले हुए हैं , जहां स्थानीय नेताओं का प्रभाव है . ऐसी स्थिति में मोदी अपने नाम से ढेर सारे वोट प्राप्त करने का अहम् पाले  हुए हैं यह आश्चर्य जनक है और उससे आश्चर्य जनक है संघ की  वही परम्परागत हिन्दू राजनीति जो इतिहास में असफल सिद्ध हुई है . केवल शिवाजी का उत्सव मनाने से कोई लाभ मिलने वाला नहीं है . कल्पना लोक से बाहर निकल कर राणा  प्रताप की नहीं,  शिवाजी और छत्रसाल की  रणनीति और राजनीति दोनों को  समझना होगा .

राष्ट्र – स्वप्न tatha क्या खोया क्या पाया

                          राष्ट्र – स्वप्न

युवकों तुम क्या  सोच रहे, अंगड़ाई लो हुंकार भरो .
 समय नहीं है मस्ती का ,राष्ट्र - स्वप्न साकार करो ..
लक्ष्मी बाई के हमलों से अंग्रेजी  हौसले पस्त हुए .
गद्दारों की  गद्दारी से, जीत के सपने ध्वस्त हुए  ..
विवेकानंद ने विश्व मंच पर, देश का ऊंचा नाम किया  .
सदियों से दबी हुई जनता में, जागृति का था काम किया  .. 
तिलक ने कहा, स्वतंत्रता है, जन्म सिद्ध अधिकार हमारा .
काले पानी की सजा सही,  देश को देकर ऐसा नारा ..
गांधी ने सत्याग्रह छेड़ा ,  चेतना का संचार हुआ  .
नई  शक्ति उत्पन्न हुई , राष्ट्र भावना का विस्तार हुआ .
 दयानंद सरस्वती ने ,आर्य धर्म का पुनरुत्थान किया..
स्वतंत्रता का विचार देकर, मानव गरिमा को मान दिया ..
उनके सन्देश से प्रेरित हो, युवा राष्ट्र-प्रेम  से झूम उठे .
आज़ादी की आग सीने में ले, वे राष्ट्र यज्ञ  में कूद पड़े ..
जलियाँवाला संहार की अग्नि, शोले बन कर बरसी थी .
ऊधम सिंह ने लन्दन जाकर, हत्यारे को सज़ा  दी थी ..
ऊधम सिंह , मदन और खुदीराम,थे अंग्रेजों के काल बने.
जीवन अपना न्यौछावर कर, अमर भारत के लाल बने ..
सुखदेव,भगत सिंह, राजगुरु ने, अपना ऐसा बलिदान दिया..
धरती का कण-कण उबल पड़ा, साहस का भाव प्रदान किया ..
चन्द्र शेखर आज़ाद अकेले ,ब्रिटिश पुलिस पर भारी थे .
अंतिम क्षण तक  रहे डटे, ऐसे महान क्रांतिकारी थे ..
‘सर फ़रोशी की तमन्ना’, बिस्मिल ने शेर सुनाया था 
युवा जोश में झूम उठे, उसने वह राग बजाया था 
बिस्मिल, अशफाक़ शहीद हुए, स्वतन्त्र राष्ट्र का लेकर सपना .
आज़ादहिन्दफौज़ गठित करके, सुभाष ने किया हमला अपना ..
भारत माँ की रण-वेदी पर हज़ारों जन कुर्बान हुए .
सदियों बाद मिली आज़ादी, सभी स्वतन्त्र समान हुए ..
राष्ट्र गौरव की वृद्धि करो तुम, उनके सपने साकार करो .
भूख, अशिक्षा, रोग मुक्त हों, भाईचारे का व्यवहार करो ..
धन,संपत्ति,सुख बढ़ें सभी के, उद्योग व्यवसाय असीमित हों .
राष्ट्र प्रतिष्ठा सर्वोपरि हो, प्रत्येक प्राणी की कीमत हो..
राष्ट्र - शक्ति की वृद्धि करो, सम्मान सहित जी पाओगे .
राष्ट्र हित में सब काम करो , सदियों तक आनंद पाओगे ..
        
               क्या खोया क्या पाया
क्या खोया क्या पाया हमने , इतने वर्ष व्यतीत हुए .
किसने क्या बलिदान दिए थे किस्से सभी अतीत हुए ..
लक्ष्मी बाई की युद्ध कथा, नहीं प्रेरित करती पीढ़ी को .
अनैतिकता पर चढ़ते जाते, ले भ्रष्टाचार की सीढ़ी को ..
विवेकानंद का क्या सन्देश, धर्म का क्या था काम किया ?
देश, समाज, शिक्षा के लिए, उन्होंने क्या प्रचार किया ?
कौन थे गांधी, तिलक कहाँ गए, युवा पीढ़ी को ज्ञान नहीं. 
आज़ाद, भगत के कार्यों का, इनको है कोई ध्यान नहीं ..
स्वदेशी का था मन्त्र जपा, जन उत्थान कराने को .
सोचा था  मिलके काम करेंगे, अशिक्षा भूख मिटाने को ..
लोगों में था उत्साह  प्रबल, राष्ट्र विकास को तत्पर था .
शिक्षा का भी प्रसार हुआ जनहित सबसे ऊपर था ..
हमने इतिहास को बंद किया, नहीं सबक लिया घटनाओं से.
मतभेद परस्पर बढ़ने लगे, उलटी – सीधी  रचनाओं से ..
धनवृद्धि हुई ,समृद्धि हुई, अच्छा खाने और पीने लगे .
सब मस्त हुए सुविधाओं में, हम स्वप्नलोक में जीने लगे ..
धीरे से विदेशी घुसने लगे, सत्ता को लिया नियंत्रण में .
शासक बोलें  उनकी बोली, विकास दिशा के अंतरण में ..
विदेशी धन से देश चलेगा, मनमोहक मन्त्र प्रचार किया .
आतंक से लेकर शान्ति तक,बाह्य शक्तियों का संचार किया ..
कौन उबारे देश को इससे, युवक राष्ट्र के मस्त हुए .
नहीं देश की है  चिंता उनको, उपभोगवाद के भक्त हुए ..
‘मेरा क्या ? देश नहीं मेरा’, लोगों को नहीं कोई  सरोकार .
विदेशी फिर अधिकार करेंगे, यदि लोग रहे न होशियार ..