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सोमवार, 3 नवंबर 2014

धारा ३७६ की नई व्याख्या


                        धारा ३७६ की नई व्याख्या
  समाचार पत्र से ज्ञात हुआ कि दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस प्रदीप नंद्रा जोग और जस्टिस मुक्ता गुप्ता ने ६५-७० वर्ष की एक महिला से हुए बलात्कार मामले में भारतीय दंड संहिता की नई व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहा है कि महिला की आयु ६५-७० वर्ष है. वह रजो निवृत्त हो चुकी है. रजोनिवृत्त महिला से सम्बन्ध बनाना जबरन बनाए गए सम्बन्ध ( फोर्सिबुल) की श्रेणी में नहीं आता है ,यह सम्बन्ध उग्र प्रकार का ( फोर्सफुल ) हो सकता है. अतः उस पर धारा ३७६ अर्थात बलात्कार का आरोप नहीं बनता है. बलात्कार के आरोप में निचली अदालत ने आरोपी को १० वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा दी थी जिसे उन्होंने बरी कर दिया . इस पर कुछ महिला वकील एवं महिला संगठनों ने आपत्ति की है .
     भारत में तो वही न्याय है जिसे जन साधारण नहीं केवल जज ही समझते हैं. यदि जज अपराधी को दोष मुक्त कर रहे हैं तो उन्हें सज़ा कौन और कैसे दे सकता है . फ़िल्मी स्टाइल में कोई पेड हीरो तो यहाँ होता नहीं है जो पुलिस- न्यायालय को लांघता हुआ अपराधी को स्वयं दंड दे दे  या मार डाले. यदि किसी को लगता है कि निर्णय गलत है तो सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है . इन्हीं टेढ़े - मेढ़े निर्णयों के कारण अंग्रेजी काल से यह क़ानून बना हुआ है कि  न्यायालय के निर्णय की आलोचना नहीं की जा सकती है भले ही वह कितना भी गलत हो . यदि कोई आलोचना करता है तो वह न्यायाधीश की नहीं, माननीय न्यायालय की अवमानना का दोषी होगा और उसे वही जज इच्छानुसार दंड दे सकते हैं . इसलिए हम तो नहीं कह सकते कि निर्णय गलत है. निर्णय देने वाले दो जजों में एक आदमी है, दूसरी औरत है. वही कह रही है कि बलात्कार नहीं हुआ तो दूसरा, तीसरा या स्वयं भुक्त भोगी कैसे कह सकती है कि बलात्कार हुआ.
    आपराधिक निर्णय सामान्य रूप से राज्य का विषय होते हैं . राज्य ही आरोपी को सज़ा दिलवाने के लिए अपना सरकारी वकील करते हैं जब कि आरोपी धन-बल के दम पर बड़ा से बड़ा वकील रखता है ताकि वह बच जाए. क्या इस प्रकरण में दिल्ली राज्य की सरकार सर्वोच्च न्यायालय जायेगी ? यदि वह नहीं जाती है तो कम से कम दिल्ली राज्य के लिए तो यह लागू हो ही जायगा कि रजो निवृत्त महिला से, जिसकी आयु ५० वर्ष या अधिक हो सकती है कोई भी पड़ोसी, रिश्तेदार या अपिरिचित व्यक्ति स्वेच्छानुसार फोर्सफुल सम्बन्ध बना सकेगा और पुलिस में उसकी रिपोर्ट भी दर्ज नहीं होगी क्योंकि इसे बलात्कार न मानकर हलके-फुल्के धक्का देने या चांटा मारने जैसा प्रकरण माना जायगा . कार्यालय या सेवा स्थान में अधीनस्थों क्या, महिला अधिकारीयों से कोई मुंह जबानी छेड़छाड़ करेगा तो उस पर प्रकरण दर्ज होगा परन्तु यदि वह फोर्सफुल सम्बन्ध बनाता है तो उसका कोई कुछ नहीं कर पायेगा. घर के अन्दर काम करने वाली महिलाओं का तो हाल और भी बद्तर हो जायेगा . वे बेचारी किससे शिकायत करेंगी और इस निर्णय के आगे उनकी बात कौन सुनेगा ? उतना ही भय तथा कथित बड़े घर की महिलाओं को भी रहेगा जो घर में नौकरों से काम करवाती है. कड़े क़ानून की परवाह न करते हुए जब लोग २-३ वर्ष की कन्याओं को नहीं छोड़ते हैं तो महिलाओं की बात कौन करे जहाँ क़ानून अपराधी के साथ होगा.
     कुछ माह पूर्व मीडिया के एक चैनेल में दिखाया गया था कि विदेशी लोग विशेषकर अफ्रीकी खुले आम सौदा कर रहे हैं कि किस प्रकार की कितनी लड़कियां कहाँ चाहिए. पुलिस को तो ये सब धंधे शुरू होने के पहले ही पता चल जाते हैं. यदि पुलिस का सहयोग न हो तो ऐसे धंधों में संलिप्त शरीफों की शराफ़त कब तक टिक सकती है ? आम पार्टी के समय क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती को कुछ लड़कियों के पत्र प्राप्त हुए कि वे विदेशी चकलेबाज़ों के चंगुल में फंस गई हैं , उन्हें मुक्त कराया जाय. नए-नए बने क़ानून मंत्री भारती ने अति उत्साह दिखाते हुए ऐसे ही एक स्थान पर छापा मार दिया . परिणाम यह निकला कि धंधेबाज़ तो धंधे में मस्त हैं , भारती के विरुद्ध विदेशी महिला के घर में जबरन घुसने और परेशान  करने का प्रकरण दिल्ली पुलिस ने दायर कर दिया है.
   कुल मिलाकर स्थिति यह है कि पहले पुलिस अकेले दम पर जिन अनैतिक कार्यों को प्रोत्साहन दे रही थी, अब कानून भी उनके साथ आ गया है. अब देखना है कि भारतीय संस्कृति और गौरव की दुहाई देने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी इस प्रकरण को कितनी गंभीरता से लेते हैं . वे स्वयं पहल करते हुए धारा ३७६ की पुनर्व्याख्या संसद में करवाएंगे या इसको देश के और भी बड़े जजों की दया पर छोड़ देंगे. इस निर्णय ने तो समलैंगिकता से भी बहुत बड़ी छलांग लगा दी है जिसके नीचे महिलाएं ही नहीं पूरा देश और समाज आ गए है. स्वयं स्त्री और पुरुष जज भी आ गए हैं क्योंकि अपवाद छोड़कर पुरुष जजों के घर में भी प्रौढ़ एवं वृद्ध स्त्रियाँ होती है, नहीं हैं तो भविष्य में होंगी.  

सोमवार, 7 जनवरी 2013

बंगलादेश में राष्ट्रपति शासन

                                      बंगलादेश में राष्ट्रपति शासन   (1975 )
  बंगलादेश में राष्ट्रपति शासन प्रो डी खत्री द्वारा फरवरी १९७५ में पत्र 'दिनमान ' में प्रकाशन के लिए भेजा गया था जो नहीं छप सका .रद्दी कागजों में यह पुनः मिला इस पुराने पत्र को पाठकों के समक्ष ३६ वर्ष पश्चात प्रस्तुत करने का उद्देश्य है , इसकी सत्य भविष्य वाणी जो बंगलादेश की राजनीति दिशा के लिए की गई थी और जिसे कोई महत्त्व नहीं दिया गया था बंगलादेश की आजादी के बाद मुजीबुर्रहमान पहले प्रधान मंत्री बने .उन्होंने सभी विपक्षी दलों को प्रतिबंधित कर दिया था तथा एक नया संविधान बनाकर वे बंगलादेश के राष्ट्रपति बन गए तथा सारी शक्तियां अपने हाथ में समेट लीं भारत की प्रधान मंत्री इंदिरागांधी समेट अनेक राष्ट्राध्यक्षों ने इसे बंगला देश की दूसरी आजादी कहा तथा उन्हें बधाइयाँ दी जाने लगीं डा खत्री ने इस पत्र के माध्यम से चेतावनी देनी चाही कि उनके साथी उनकी हत्या कर सकते हैं तथा इसका अंत मिलिट्री शासन में होगा और छः माह बाद वही हुआ पत्र कि याह भविष्यवाणी भी सही हुई कि रूस में कमुनिस्ट शासन का अंत उनके आतंरिक विस्फोट से होगा परंतु यह अनुमान गलत निकला कि वहां पर कम्युनिस्टों का शासन दो -ढाई सौ साल बाद नष्ट होगा , वह ७६-७७ वर्ष संसदीय ही समाप्त हो गया
       संसदीय प्रणाली से अध्यक्षीय प्रणाली में परिवर्तन करना क्रांति का पर्याय नहीं हो सकताइस प्रकार का परिवर्तन तानाशाही का प्रतीक भी नहीं है परन्तु एक ही द का शासन होना तानाशाही हैइस पद्धति में एक ही व्यक्ति जो द का अध्यक्ष होता है राज्य की सभी शक्तियों ( व्यवस्थापिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका ) का नियंत्रण करता हैबंगलादेश की नवीन पद्धति के अनुसार सरकारी कर्मचारी भी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के सदस्य हो सकते हैं .यह इस तथ्य का पर्याय मात्रा है कि दल के सदस्य ही सरकारी कर्मचारी हो सकते हैंविधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का एकीकरण होने से राष्ट्र के अध्यक्ष को असीम अधिकार प्राप्त हो जाते हैंयदि हम उसे निरंकुश शासक कहें तो अधिक उपयुक्त होगा.अधिकार सुखद परिणाम के द्योतक नहीं हैं अधिकार शब्द कर्तव्य का ही रूपांतर है अधिकारों कि व्यापकता का अर्थ है कर्तव्यों कि व्यापकताअतः निरंकुश शासक के कर्तव्य भी असीम हो जाते हैं .व्यक्ति सीमित होता है ,वह असीमित कर्तव्यों का पालन कभी नहीं कर सकेगा
      बंगलादेश कि वर्तमान शासन पद्धति में मुजीब का प्रभाव इतना अधिक है कि देश का कोई भी व्यक्ति उनकी आलोचना नहीं कर सकेगाबंगबंधु सर्व व्यापी नहीं हैं उन्हें उस समूह के व्यक्तियों का विश्वास करना होगा जो उन्हें सदैव घेरे रहेंगे .देश कि वर्तमान समस्याओं को देखते हुए स्वार्थी लोगों का एक नया वर्ग जन्म लेगा कुछ दिनों ताक ये लोग अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं परन्तु शीघ्र ही वे अपने अधिकारों द्वारा दलित वर्ग का शोषण प्रारंभ कर देंगेनिरंकुश शासन में षड्यंत्रों की सम्भावना भी बढ़ जाती हैयह कार्य उन लोगों के लिए अधिक सुगम होता है जो शासक दल के निकट रहते हैं .कालांतर में ये लोग षड्यंत्रों में रूचि लेने लगेंगे , शासन मुजीब का हो या उनके उत्तराधिकारियों काइन लोगों की महत्वाकांक्षा अधिक अधिकार पाने की ओर प्रवृत होगी की कर्तव्यों का पालन करने मेंइससे जो राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होगी उसका अंत सैनिक तानाशाही में होगा
       एक दलीय शासन पद्धति साम्यवादी देशों में फलीभूत हो रही हैनिश्चित रूप से यह पद्धति संक्रमण कल में उपयुक्त है , स्थायी भी अपेक्षा कृत अधिक हैइसका मुख्य आधार दल की दार्शनिक विचारधारा हैदल का सदस्य केवल उस व्यक्ति को बनाया जाता है जो कार्य एवं विचारों द्वारा साम्यवाद में आस्था प्रदर्शित करता हैपरन्तु ये विचार रूढ़ीवादिता को जन्म देंगे .उदहारण स्वरूप वैदिक एवं उसके पश्चात् बौद्ध धर्म का विकास चरम सीमा ताक हुआ था .समय के साथ ही लोग धर्म को कर्तव्य मान कर पंथ मानने लगे और कुछ विशेष क्रियाओं के करने में ही उनके कर्तव्य की इतिश्री होने लगीवे रूढ़ी वादी हो गए और उनका पतन हो गयाअतः साम्यवाद का अंत भी अराजकता में , जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा है , होकर सैनिक तानाशाही में होगा परन्तु इसमें पर्याप्त समय लगेगा इसके विपरीत बंगलादेश की राजनीति में द का पतन कभी भी हो सकता है
   'बंगला देश अब्सर्वर ' ने लिखा है , बंगबंधु चाहे जिस भी रूप में देश का नेतृत्व करें , वे बंग बन्धु ही हैं , वह राष्ट्र पिता हैं ',मैं इससे सहमत नहीं हूँ .एक पिता अपने पुत्र को जन्म देने के बाद उसका उपयोग अपनी इच्छा से नहीं कर सकतायहाँ एक व्यक्ति की इच्छा का प्रश्न हैदेश की सीमा में बहुत लोग रहते हैं जिन्होंने देश के लिए त्याग किया हैउन सब को किसी एक व्यक्ति की इच्छा से चलने के लिए बाध्य करना मानवता की हत्या होगी फिर वह इच्छा चाहे राष्ट्र-पिता की ही होयदि श्री मुजीब इस पद्धति को संक्रमण काल के रूप में एक निश्चित अवधि तक लागू करके पुनः प्रजातंत्र की स्थापना करते हैं तो निश्चय ही वे एक राष्ट्र के जनक हैं , श्रद्धा के पात्र हैं .इतिहास उनकी भूरी भूरी प्रशंसा करेगायदि यह स्थायित्व ग्रहण करती है तो यह क्रांति नहीं भ्रान्ति होगी और इतिहास इसके परिणामों का दोष भी मुजीब के सिर पर मढ़ देगा

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

महिला अपराध रोकने के उपाय

                                           महिला अपराध रोकने के उपाय 

      महिलाओं से दुष्कर्म आदिकाल से होते आ रहे हैं . कुछ समय पूर्व तक महिलाएं इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देखती थीं .अतः अधिकांश प्रकरणों में वे और उनके सम्बन्धी चुप रह जाते थे . विज्ञान की प्रगति एवं शिक्षा के प्रचार- प्रसार से महिलाओं के स्तर में बहुत उन्नति हुई है और अब दुष्कर्म को छुपाने की अपेक्षा अपराधी को सजा दिलाने के लिए वे आगे बढ़ी हैं . इस अपराध में सबसे कष्टप्रद स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जब महिलाओं से कुरेद - कुरेद कर घटना के बारे में पूछा जाता है और अनेक वर्षों तक मुकदमें चलते रहते हैं तथा अपराधी अपराध करते जाते हैं .दिल्ली रेप केस में युवा पीढ़ी ने  जिस प्रकार अपना प्रबल रोष व्यक्त किया है, उससे भयभीत होकर सरकार ने अपना पिंड छुड़ाने के लिए आनन्- फानन में वर्मा आयोग का गठन कर दिया है .
          कायदा तो यह कहता है की पहले आयोग के सदस्य इस पर अपने विचार रखते . उन तथ्यों को सामने लाते जिनसे मुकदमों के निर्णय नहीं हो पाते हैं और अपने सुझाव भी देते . उस पर विस्तृत चर्चा होती , लोग अपने नए विचार भी रखते और एक संतोषप्रद कानून बनाया जाता . अब लोग क्या विचार देंगे किसी को पता भी नहीं चलेगा और पुरानी  परम्परा के अनुसार पुनः ऐसा क़ानून बन सकता है जिससे लाभ कम हानि अधिक हो . आज अनेक लोग रेप के लिए फांसी की मांग कर रहे हैं परन्तु इनसे सभी महिलाओं का कितना भला होगा कहना कठिन है जबकि उनका दुरुप करके काल गर्ल , और बाजारू औरतें कितनों को ब्लैक मेल कर देंगी कहना कठिन है जैसा दहेज़ कानूनों के द्वारा किया जा रहा है।
   भारतीय शिक्षा  से  नैतिकता पूरी तरह समाप्त कर दी गई है . अनैतिकता होगी तो सभी प्रकार के अपराध भी होंगे . अतः अब कठोर दंड व्यवस्था से दुष्टों को वैसे ही नियंत्रित करने का प्रयास किया जाय जैसे जानवरों को किया जाता है क्योंकि मनुष्य में से नैतिकता निकाल दें तो पीछे जानवर ही बचता है .भारत के गृहमंत्री शिंदे जी ने इसे रेयर अमंग रेयरेस्ट कह कर शीघ्र सुनवाई की बात की  है .  रेयर अमंग रेयरेस्ट की परिभाषा कौन तय करेगा ? कानून स्पष्ट सिद्धान्तों के आधार पर बनाए जाने चाहिए ताकि निर्णय देने में दुविधा न हो . रेप के इन प्रकरणों में यथा शीघ्र फांसी की सजा होनी चाहिए :
(1)10 वर्ष से छोटे बच्चे का , निकट सम्बन्धी द्वारा अवयस्क का  रेप, असहाय, लाचार, घायल , मानसिक रूप से विकृत लोगों का रेप तथा रेप के बाद हत्या करने वाले अपराधी . 
 (2)  इन प्रकरणों में आजीवन कारावास होना चाहिए :डरा- धमकाकर अवयस्क का रेप, शिक्षक या अभिभावक  द्वारा रेप ( यदि सहमति  से किया गया हो तो 7 से 10 वर्ष की कैद ), सामूहिक बलात्कार ( सभी को सजा हो ), कंडिका (1) में वर्णित रेप के प्रयास .
(3)अन्य  प्रकरणों में 7 वर्ष .अपराधी यदि अवयस्क हों तो जज उनके हाव-भाव और चाल- चलन के आधार पर समुचित निर्णय लें। 
   इन अपराधियों की संपत्ति अथवा इनके हिस्से की संपत्ति भी कुर्क करके  पीड़ित को मानहानि  की क्षतिपूर्ति के रूप में दी  जानी  चाहिए . यदि कुर्क करने से प्राप्त राशि अधिक हो तो उसका पर्याप्त भाग राजसात करना चाहिए . 
    एक सामान्य सिद्धांत यह होना चाहिए कि रेप के साथ और कौन सा अपराध किया गया है।  दंड संहिता में उस अपराध की जो सजा निर्धारित हो , रेप की सजा में उसे जोड़कर कुल सजा दी जानी  चाहिए। प्रत्येक सजा के साथ भारी अर्थ दंड अवश्य लगाना  चाहिए .जैसे दिल्ली रेप कांड  में  युवती को क्रूरता से घायल किया, राक्षसी प्रवृत्ति से रेप किया और राजधानी की सड़कों पर देश की क़ानून व्यवस्था को चुनौती देते हुए किया की जिससे जो बने कर ले . उनकी तो पूरी संपत्ति राजसात करके फांसी ही होनी चाहिए . 
 अब काला पानी तथा कोल्हू चलाने जैसी सजाएं तो होती नहीं हैं . किसी भी प्रकार के कठोर अपराध करने वाले लोग यदि प्रायश्चित  करते हैं , अपना अपराध स्वीकार कर लेते हैं , तो उन्हें सेना की  देख-रेख में सीमान्त या वन क्षेत्रों में चलने वाले निर्माण कार्यों में मजदूर के रूप में भेज देना चाहिए . मजदूरी का एक भाग उनके भोजन पर तथा शेष उनके खाते में जमा कर  देना चाहिए .
 यदि कानून का यह सिद्धांत रहेगा की 99 अपराधी भले ही छूट  जाएँ , एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए और 99 अभियुक्त छूटते रहेंगे तो वर्तमान के अनुसार अपराध तो होंगे और बढ़ते भी  जायेंगे परन्तु अपराधी नहीं मिलेंगे।न्याय में करुणा दिखाने पर  अन्याय और अपराध शेष रहता है . 
           भोपाल में एक बहुचर्चित रेप प्रकरण दर्ज हुआ था जिसमें एक निर्दोष व्यक्ति को अनेक दिन जेल में रख कर प्रताड़ित किया गया . बाद में ज्ञात हुआ की रेप की पूरी कहानी एक षड्यंत्र थी जिसमें गुजरात के एक व्यापारी ने किसी को फंसाने के लिए 20 हजार रूपये किराये में एक लड़की भेजी थी . ऐसे प्रकरणों में अन्य अपराधियों के पूर्व ऐसी लड़की को कठोर अर्थ दंड के साथ सश्रम जेल की सजा देनी चाहिए . रायपुर मेंछापे में एक लड़की  कई लड़कों के साथ पकड़ी गई . वह कहती है कि वह बेचारी गरीब है , मुंबई से 10 दिनों के लिए 50हजार रूपये में सेक्स करने आई है . उच्चतम न्यायालय  भी यह कह चूका है कि जो स्वेच्छा से सेक्स का आनद ले रही है उनके निपटारा किन कानूनों से किया जाय . जब सरकारी स्तर  पर सेक्स को बढ़ावा दिया जा रहा है , राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गर्व से कहती हैं कि सेक्सी कही जाने पर महिलाएं खुश हों , युवा लड़कियों को बार में जाने को पूरा संरक्षण दिया जा रहा है तो सेक्स कार्यों के लाइसेंस देने में शर्म क्यों आ रही है . इससे जहां एक ओर मनचलों का ध्यान सामान्य लड़कियों से हट जायगा , राष्ट्र की आय भी बढ़ जायेगी जिसकी  सरकार को भारी आवश्यकता है। नैतिकता के अभाव में महिला अत्याचार रोकने का यह मार्ग भी हो सकता है .
 डा . ए . डी .खत्री , भोपाल