मंगलवार, 27 अगस्त 2013

शिक्षा की संकल्पना

स्वामी विवेकानंद ने कहा है, ’’ कोई देश उसी अनुपात में विकास करता है जिस अनुपात में वहां की जनता में शिक्षा और बुद्धि का विकास होता है .” .....”जिस अध्ययन द्वारा मनुष्य की संकल्प शक्ति का प्रवाह संयमित होकर प्रभावोत्पादक हो सके ,उसी का नाम शिक्षा है .“ वेदांत दर्शन के अनुसार बालक / बालिका के में अनन्त  ज्ञान, अनन्त  बल  तथा अनंत व्यापकता की शक्तियां विद्यमान हैं .शिक्षा द्वारा इन्हीं शक्तियों की अनुभूति तथा विकास किया जाना चाहिए . विवेकानंद ने स्पष्ट शब्दों में कहा है ,” शिक्षक के प्रति श्रद्धा, विनम्रता, सन तथा समर्पण की भावना के बिना हमारे जीवन में कोई विकास नहीं हो सकता है .” .... “ यदि देश के बच्चों की शिक्षा का भर फिर से त्यागी और नि:स्पृह व्यक्तियों के कन्धों पर नहीं आता तो भारत को दूसरों की पादुकाओं को सदा के लिए ढोते रहना होगा .” वे धर्म को शिक्षा की आत्मा मानते थे . पाठ्यक्रम के अन्य विषय मन तथा बुद्धि का परिष्कार करते हैं परन्तु धर्म ह्रदय को समुन्नत करता है . ह्रदय ज्ञान का प्रकाश है . ईश्वर ह्रदय के माध्यम से ही हमें सन्देश देता है . अतः ह्रदय का परिष्कार करो . परन्तु धर्म शिक्षा के पूर्व वे युवकों को सबल बनाने, उनमें नैतिक बल विकसित करने, सिंह के समान साहसी बनाने तथा चरित्र गठन पर अधिक जोर देते हैं .
 महात्मा गाँधी शिक्षा का सर्वोच्च ध्येय चरित्र निर्माण तथा व्यक्ति में उत्पादकता की भावना का विकास मानते थे . वे कहते हैं कि सभी बालकों में सामान दैवी शक्ति विद्यमान है परन्तु प्रत्येक का व्यक्तित्व विशिष्ट एवं विलक्षण होता है जिससे वह समाज को अपना योगदान विभिन्न प्रकार से देता है . यह शिक्षक ही होता है जो उसकी विलक्षणता को पहचान कर उसे व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करता है . अतः समाज में शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है .वे कहते हैं कि आचार्य तथा अध्यापक गण पुस्तकों के पृष्ठों से चरित्र नहीं सिखा सकते . चरित्र निर्माण तो उनके जीवन से ही सीखा जा सकता है . गुरु होने के लिए विद्यार्थी से आत्मिक सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है अर्थात्  शिक्षक उसकी रुचियों, योग्यताओं एवं आवश्यकताओं को समझ कर उन्हें उचित शिक्षा दे . वे अध्यापन कार्य में समर्पण भाव चाहते हैं तथा वेतन एवं अध्यापन कार्य को परस्पर मिलाना उचित नहीं मानते . उनके अनुसार शिक्षा व्यर्थ है यदि उसका निर्माण सत्य एवं पवित्रता की नींव पर नहीं हुआ है . उनकी दृष्टि में पवित्रता के बिना सब व्यर्थ है, व्यक्ति चाहे कितना भी विद्वान् क्यों न हो जाये .
   भारतीय शिक्षा शास्त्रियों में गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है . वे कहते है कि प्रत्येक छात्र को प्रकृति की ओर से अनन्त मानसिक शक्ति प्राप्त हुई है जिसका अल्पांश ही जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति में व्यय होता है . उसके पश्चात् उसकी विपुल शक्ति अवशिष्ट रहती है . इसका उपयोग सृजन के लिए किया जाना चाहिए . यह अतिरिक्त मानसिक शक्ति व्यक्ति को सृजन की विभीन्न दिशाओं में कार्य करने के लिए उत्प्रेरित करती है . शिक्षा का प्रमुख कार्य इस सृजन शक्ति का विकास करना तथा उसे उचित दिशा प्रदान करना है . विद्यालय स्तर पर तो सभी विषय अनिवार्य होते हैं परन्तु महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय स्तर पर चुने हुए विषय ही पढ़ने होते हैं . अतः उच्च शिक्षा की प्रमुख संकल्पना विद्यार्थियों की रूचि को समझना एवं तदनुसार उन्हें शिक्षा प्रदान करना है ताकि उनकी क्षमताओं का समाज हित में अधिकतम लाभलिया जा सके .
       गीता के कर्मयोग की व्याख्या करते हुए विनोबा भावे ने कहा है कि जब व्यक्ति मन की रूचि के अनुसार कार्य करता है तो उसका मन और शरीर एक ही दिशा में कार्य करते हैं , मन और शरीर का योग हो जाता है जिससे व्यक्ति बिना तनाव के अधिक कार्य करते हुए आनंद की अनुभूति करता है .
    शिक्षा एवं कार्य के उपर्युक्त प्रतिपादित सिद्धांतों के आधार पर विश्लेषण  करने पर यह  ज्ञात होता है कि भारत में उनके विपरीत कार्य किया जाता है और विदेशों में उनका यथा संभव पालन किया जाता है जिसके कारण भारत के शिक्षा संस्थान विदेशी संस्थानों से बहुत पीछे हैं . म.प्र. में तो महाविद्यालय के प्राध्यापकों को बाबूगीरी करने का प्रशिक्षण दे दिया गया है . प्राध्यापक अपनी इच्छा एवं रूचि के विपरीत कुढ़ते हुए सारा समय रिकार्ड बनाने में लगाते हैं क्योंकि म. प्र. शासन ने उनसे पढ़ने- पढ़ाने का कार्य छीन लिया है . प्रदेश के अनेक महाविद्यालयों में शिक्षक हैं ही नहीं परन्तु विद्यार्थी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होते जाते हैं . इससे शासन ने यह सफलता पूर्वक सिद्ध कर दिया है कि शिक्षा का प्रमाण पत्र देने में शिक्षक, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, पुस्तकों आदि की कोई आवश्यकता नहीं है . विद्यार्थियों को महाविद्यालय आना और परीक्षा देना इसलिए अनिवार्य रखा गया है कि आने वाले छात्रों से शुल्क लेना है और उनके  नाम पर विश्व भर के वित्तीय संस्थानों से उधारी लेनी है नहीं तो खायेंगे क्या ? अभी तो प्रदेश सरकार ने उच्च शिक्षा के लिए मात्र १००० करोड़ रूपये के कर्ज का जुगाड़ किया है, और प्रयास जारी हैं . छात्र संख्या बढ़ाने पर इसलिए जोर दिया जा रहा है ताकि कर्ज देने वालों को बताया जा सके कि हमारे इतने सारे बच्चे हैं जो जीवन भर आपका कर्ज चुकाते रहेंगे . शासन बहुत अच्छी शिक्षा व्यवस्था कर रहा है इसको सिद्ध करने के लिए प्राध्यापकों से बनवाये गए रिकार्ड वक्त जरूरत बहुत काम आते हैं .

  महाविद्यालयों से निकलने वाले विद्यार्थियों की योग्यता की इसलिए आवश्यकता नहीं होती है कि उन्हें कौन सा काम करना है . सरकार जमीन, घर, राशन, पानी, बिजली सब तो मुफ्त में दे ही रही  है . अनेक प्रदेश सरकारें तो टीवी, फ्रिज, साइकिल, लैपटाप , मिक्सी आदि भी खुले हाथों से बाँट रही हैं . सरकारी नौकरियाँ उन्हें देनी नहीं हैं और यदि शिक्षक ही बन गए तो उन्हें राशन ढोना, खाना बनवाना और बच्चों को खिलना ही तो है, कौन सा पढ़ाना है .विद्यालय के छात्रों को तो विद्यालय आने की आवश्यकता भी नहीं है . डिग्री लेने वाले लोगों को यदि राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री के नाम भी न पता हों, ठीक से पुस्तकें भी न पढ़ पाते हों, गणित के प्रश्न भी न हल कर पाते हों तो क्या फर्क पड़ता है . गुरुजिओं के नियमितीकरण के लिए ली गई परीक्षा में यही परिणाम सामने आये थे .ऐसे शिक्षक छात्रों के सामने कौन सा आदर्श प्रस्तुत करेंगे और उनके कैसे चरित्र का निर्माण करेंगे ?
   म.प्र. समेत देश के प्राय: सभी प्रान्तों में महाविद्यालयों  में तदर्थ नियुक्तियां ही की जा रही हैं . कार्ल मार्क्स ने अपना शोषण का सिद्धांत श्रमिकों के लिए लिखा था, माओ ने उसमें सुधार करके किसानों को जमींदारों के चंगुल से छुड़ाया . वे बेचारे क्या जानते थे कि भारत में अच्छे पढ़े लिखे लोगों का  समाजवाद के नाम पर चलने वाली कल्याणकारी सरकारें स्वयं क्रूरता पूर्वक शोषण  करेंगी . म. प्र. में दूसरी समस्या विषयों की है . विश्वविद्यालय विषयों के सीमित समूह बनाते हैं जिससे विद्यार्थी अपनी पसंद के विषय नहीं ले पाते हैं . ऐसे शिक्षक और शिक्षा व्यवस्था के प्रति विद्यार्थियों या समाज में क्या श्रद्धा होगी . भारत में दूसरी सबसे बड़ी समस्या आरक्षण की है . अच्छे छात्रों को जाति-धर्म के नाम  पर उच्च शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश नहीं मिलता है  अथवा उनके रूचि के विषय नहीं मिलते हैं परिणाम स्वरूप ऐसे अनेक छात्र विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए चले जाते हैं वे प्रत्येक वर्ष एक लाख करोड़ रूपये से अधिक राशि वे विदेशों में व्यय करते हैं तथा उनमें से अधिकांश युवक वहीँ बस जाते हैं अर्थात भारत को बौद्धिक पलायन के कारण भारी क्षति उठानी पड़ती है . सरकार धन का रोना तो रोती  रहती है परन्तु देश से धन एवं बुद्धि का पलायन रोकने के प्रयास करना तो दूर , उसे और प्रोत्साहित करती रहती है . इतने धन में तो अनेक अच्छी संस्थाएं खुल सकती हैं यदि सरकार  में इच्छा शक्ति हो .परन्तु  महापुरुषों के विचारों के विपरीत काम करने वाली सरकारों से यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है ?
  हमारे देश के भौतिक शास्त्री रामकृष्ण वेंकट रमण को अपनी रूचि के विषय के उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाना पड़ा . वहां उन्हें रसायन शास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला . क्या भारत में एक विषय में उपाधि प्राप्त व्यक्ति को दूसरे विषय में अध्ययन की अनुमति दी जा सकती है ? कभी नहीं . अमेरिका के अनेक विश्वविद्यालयों में नोबेल पुरस्कार प्राप्त विद्वान अध्यापन करते हैं . स्वाभाविक है छात्र उनकी लगन एवं ज्ञान के प्रति अपार श्रद्धा रखते हैं . अतः उनके सानिध्य में वे अच्छे शोध कार्य करते हैं . वहां पर अनेक पूर्व छात्र अच्छी नौकरी लगने के बाद या व्यवसाय जमाने के बाद अपने पूर्व संस्थानों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार नियमित रूप से सहयोग राशि  देते हैं जिससे वे संस्थान सतत रूप से स्तरीय शिक्षा देने में सक्षम बने हुए हैं . आई आई टी के पूर्व छात्र भी जो विदेशो में कार्य रत हैं, अपने संस्थानों को कुछ सहयोग राशि  भेजते रहते हैं . भारत में स्वतंत्रता के बाद से आज तक लाखों लोगों को जनता के धन पर जीवन की सभी सुविधाओं को देते हुए उच्च शिक्षित किया गया , उन्हें अच्छे-अच्छे पद एवं वेतन  भी दिए गए परन्तु उनमे से शायद ही किसी ने अपने पूर्व शिक्षण संस्थान को कोई राशी दी हो जिससे भविष्य में आने  वाले जरूरत मंद लोगों की सहायता की जा सके .
    म. प्र. की सरकार  ने एक योजना बनाई कि सरकारी विद्यालयों को पूँजी पति दान दें और भवन निर्माण आदि में सहयोग करें . कोई भी आगे नहीं आया . स्वयं नेता –अधिकारी- धनवान लोगों ने अपने धन शिक्षण संस्थाओं में तो लगाए परन्तु निजी संस्थाओं में लगाए ताकि शिक्षा का व्यवसाय कर सकें और खूब धन कमा सकें . पता नहीं किस आदर्शवादी ने यह विचार दिया था . सरकारी विद्यालयों या अन्य संस्थाओं ने ऐसा कोई प्रतिष्ठा का काम किया है या उनके मंत्री – नेता – अधिकारीयों ने ऐसा कोई कार्य किया है जिसे देख कर शिक्षा व्यवस्था के प्रति श्रद्धा उत्पन्न हो ? भारत में तो सरकारों का एक ही रूप सामने आता है और वह है भ्रष्टाचार का . गाँधी जी कहते हैं शिक्षा देने का कार्य त्याग का कार्य है . शिक्षक को समर्पित भाव से अध्यापन करना चाहिए . आज ऐसे कितने शिक्षक होंगे ? विदेशों में और हमारे देश में यही मौलिक अंतर है कि वे महापुरुषों एवं विद्वानों के विचारों के अनुसार कार्य करते हैं, हम उनकी फोटो सामने रख कर आरती उतारते हैं, उनकी जय-जयकार करते हैं, लोगों में उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न करते हैं कि वे महान थे और काम सारे उलटे करते हैं . आज देश का यही संकट है . यही चरित्र का संकट है जिसके अच्छा होने की बात महापुरुष बार – बार कहते रहे हैं . जब रक्षक ही भक्षक बन बैठे तो देश बेचारा क्या करे ? लोग अपनी वेदना किससे कहें ?
प्रकृति की यह विडंबना ही कही जाएगी कि ऐसी व्यवस्था में भी कुछ शिक्षक अच्छा पढ़ा देते हैं, कुछ छात्र अच्छे से पढ़ लेते हैं और इतने व्यक्ति मिल जाते हैं जिनसे देश चलता जा रहा है .

   शिक्षा का उद्देश्य प्रत्येक  स्तर पर मनुष्य की आतंरिक शक्तियों का विकास करना है . परन्तु उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सभी विषय आते हैं , वह चाहे आर्थिक संकट हो या आतंकवादी एवं विदेशी हमला . उच्च शिक्षा की संकल्पना का अभिप्राय उस शिक्षा से है जो व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करे, उसे गौरव पूर्ण, गरिमा पूर्ण जीवन यापन के लिय सक्षम बनाए, सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करे, राष्ट्र को समृद्ध करे तथा अंतर्राष्ट्रीय चुनौतियों का सामना करने में समर्थ हो . हमारे नेताओं एवं अधिकारीयों  के द्वारा अच्छे विचारों से घृणा करने का ही परिणाम है कि देश में नेता आतंकवाद और विदेशी हमलों के समय भी एकमत नहीं हो पाते हैं . अनेक नेता तो ऐसे कुतर्क करते हैं जैसे वे विदेशी हमलावरों या व्यापारियों के वेतन भोगी एजेंट हों . दुनिया में संभवतः भारत ही इकलौता देश है जहां राष्ट्रीय आपदा के समय भी नेता-अधिकारी पहले निजि  स्वार्थ देखते हैं तथा राष्ट्रीय हितो के विरुद्ध बेझिझक काम करते रहते हैं . व्यवस्था यहाँ तक बिगड़ चुकी है कि उच्च प्राशासनिक अधिकारी भी अब असहाय होने लगे हैं . भारत में सबसे अधिक युवा हैं , यह कहने मात्र से देश को उसकी ऊर्जा का लाभ नहीं मिल जायेगा . उसके लिए शिक्षा को सुधारना होगा . तभी अच्छे नागरिक बनेंगे और अनेक समस्याएं स्वयं विलुप्त हो जांयगी .   

    भोपाल में  एक फार्मेसी की छात्रा  ने रैगिंग से त्रस्त  होकर आत्म हत्या कर ली थी . रैगिंग रोकने के लिए सरकार ने नियम बनाए हैं , उच्चतम न्यायलय ने कठोर निर्णय लेने की बात कई बार कही है , फिर भी रैगिंग क्यों नहीं रुक रही है ? यदि संस्थानों में अध्यापन कार्य होता रहे तो छात्र-छात्राएं उसमें व्यस्त रहें . यदि महाविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव होते रहते तो अनेक प्रत्याशी नए छात्रों को अपने पक्ष में करने के लिए उन्हें संरक्षण देते, रैगिंग होती ही नहीं .परन्तु मनमानी लूट के लिए छात्र संघ बंद कर दिए गए , पढ़ाई होती नहीं , फ़िल्में , मीडिया और नेट हिंसा और सेक्स परोस रहे हैं तो अपराध नहीं होंगे तो क्या होगा ? फिर अपराध का स्वरूप कुछ भी हो सकता है .  

मंगलवार, 13 अगस्त 2013

हिंदी-हिंदी जपने से कोई लाभ नहीं होगा

अगस्त २०१३ में पाकिस्तानियों ने ५ भारतीय सैनिकों को मार दिया था . एक समाचार चैनेल पर बहस हो रही थी . उसमें एक पाकिस्तानी प्रवक्ता को भी सम्मिलित किया गया था . जब हमारे एक व्यक्ति ने उनके लिए शहीद शब्द का प्रयोग किया तो पाकिस्तानी ने तुरंत आपत्ति की कि शहीद शब्द तो उनका है , हम उसका उपयोग कैसे कर सकते हैं . भार्गव हिंदी –अंग्रेजी शब्दकोष में शहीद का अर्थ दिया है ‘ धर्म के लिए मरने वाला मुस्लिम’ . यह शब्दकोष पुराना है, देश पर मर-मिटने वालों के लिए इस शहीद शब्द का प्रयोग वर्षों से होता आ रहा है परन्तु हिंदी शब्दकोष में भी शहीद का अर्थ ‘देश पर आत्मोत्सर्ग करने वाला’ नहीं लिखा हुआ है . उसके लिए हिंदी शब्द है हुतात्मा . उस बहस में भारतीयों के पास इसका कोई उत्तर नहीं था . इसलिए जब कोई व्यक्ति विदेशी से बात करे और उसे यह ज्ञात हो जाये कि इसकी अपनी कोई भाषा नहीं है तो उसके मन में उसके प्रति सच्चा सम्मान कभी नहीं हो सकता . विदेशी समझ जाता है कि इसमें राष्ट्र गौरव की कोई भावना नहीं है क्योंकि इनका देश अत्यंत पिछड़ा हुआ है .

अनेक ऐसे भक्त देखे जा सकते हैं जो भगवान का नाम जपते रहते हैं परन्तु उनका व्यवहार मानवता के सर्वथा विपरीत होता है . कुछ लोग तो दूसरों का सर्वदा अहित ही करते रहते हैं . उनके लिए ‘मुंह में राम बगल में छुरी’ की कहावत बनाई गई है . कुछ ऐसा ही हाल म. प्र. सरकार का है . जो हिंदी प्रेम तो ऐसे प्रदर्शित करती है जैसे परम देश भक्त हों . लेकिन जब बी आर टी एस भोपाल के नाम करण की बात आई तो फट से नाम रख दिया “माई बस “. बस शब्द तो हिंदी ने गृहण कर लिया है परन्तु “माई” शब्द की हिंदी नहीं कर पाए . हिंदी विश्वविद्यालय खोलने का ढोंग करने से हिंदी का विकास नहीं होगा न ही हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान का नारा देने से होगा जब तक अन्दर पवित्र भावना नहीं होगी . हिंदी नाम रखने में शर्म आ रही थी तो उर्दू में ही रख देते, कोई अन्य भारतीय भाषा में रख देते . हिंदी –संस्कृत का इतना अपमान कम से कम भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाली भाजपा को तो शोभा नहीं देता और वह भी म.प्र. में . ‘माई बस’ नाम के लिए भोपाल की महापौर कृष्णा गौर ही उत्तर दाई नहीं हैं पूरी भाजपा है . संघ ने इस पर आपत्ति क्यों नहीं की , यह भी आश्चर्यजनक है .

हिन्दू अपनी प्राचीन संस्कृति और गौरव की प्रशंसा करते हुए नहीं थकते हैं . रसायन शास्त्र में कणाद ऋषि का नाम आदर से लिया जाता है कि उन्होंने सर्व प्रथम कहा था कि पदार्थ सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है जिसे परमाणु कहते हैं . इसी प्रकार हम चिकित्सा, गणित, ज्योतिष आदि अनेक विषयों में अपने प्राचीन विद्वानों के नाम लेते हैं . उन्होंने काम किये थे तो उनका नाम लेना अच्छी बात है , उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया जाना चाहिए

आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने १९४० के दशक में मनोविज्ञान के अनेक व्यावहारिक विषयों , उत्साह, श्रद्धा-भक्ति, करुणा, लज्जा-ग्लानि, लोभ, घृणा, ईर्ष्या, भय, क्रोध और बैर पर उत्कृष्ट मौलिक निबंध लिखे हैं . परन्तु इन विषयों को मनोविज्ञान विषय में सम्मिलित नहीं किया गया . यदि उनके विचारों को गंभीरता पूर्वक समझ लिया जाय और व्यवहार में लाया जाय तो अनेक सामाजिक, आर्थिक, आप्राधिक तथा विधिक समस्याओं को घटने से पहले ही रोका जा सकता है जिनसे आज लोग त्रस्त हैं . परन्तु उन विचारों को हिंदी विषय के निबंधों तक ही सीमित रखा गया . रजत पथ में अप्रेल-मई २०११ के अंक में उन सभी निबंधों का सार-संक्षेप दिया गया था . उस पत्रिका के साथ मैंने मैंने अनेक प्राध्यापकों से अनुरोध किया कि उन्हें मनोविज्ञान विषय में सम्मिलित किया जाय . सबने एक ही समस्या बताई कि अब कोई प्राध्यापक यह नहीं कर सकता है . पाठ्यक्रम में सुधार तभी संभव है जब म.प्र. शासन का उच्च शिक्षा विभाग इसमें रूचि ले . उसकी पहल पर माननीय राज्यपाल, जो विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं, उस विषय के प्राध्यापकों की संयोजन समिति की बैठक बुलायंगे तो उसमें ही कोई विषय जोड़े या घटाए जा सकते हैं . अतः प्राध्यापकों ने निजी स्तर पर कोई परिवर्तन करने में असमर्थता व्यक्त कर दी .

मैंने उस पत्रिका की प्रतियों के साथ, जो उन निबंधों के महत्त्व को दर्शाती हैं, म.प्र. के उच्च शिक्षा मंत्री से लिखित में अनुरोध किया, माननीय राज्यपाल जी से भी निवेदन किया तथा मुख्यमंत्री जी को पत्र लिखा . इस पर न तो कोई व्यय होना था न यह कार्य किसी के विपरीत था . परन्तु इस पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई . राजनीतिज्ञ कोई काम तभी करते हैं जब उन्हें कोई लाभ दिखे . इस काम से क्या लाभ होना था ? आचार्य रामचंद्र शुक्ल न तो कोई प्राचीन काल के हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति के गौरव शाली व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया जा सके और न ही उनका नाम सरकार की लोकप्रियता में वृद्धि कर सकता है . संभवतः इसीलिए मेरे अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया गया .

जहां तक विश्विद्यालय के पप्राध्यापकों का प्रश्न है, अधिकांश लोग अंग्रेजी के विद्वान् हैं . उन्हें हिंदी कम समझ आती है . दूसरे किसी तथ्य को तभी स्वीकार करने की पारम्परा है जब कोई विदेशी विद्वान् उसे अच्छा कह दे . इसलिए स्वतन्त्र भारत के ६६ वर्षों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, विधिक, धार्मिक आदि किसी भी क्षेत्र में कोई मौलिक कार्य सामने नहीं आया है . आज इसीलिए हम देश की अर्थ व्यवस्था सुधारने के लिए विदेशी पूंजीपतियों की चिरौरी कर रहे हैं . देश में मेधावी युवकों को विदेश जाने के लिए बाध्य किया जाता है और वे जब वहां अपना काम और नाम स्थापित कर लेते हैं तो हम उन भारतीयों पर झूठा गर्व करते हैं . इनसे देश का कोई हित होने वाला नहीं है .यदि ये निबंध किसी विदेशी के होते तो हमारे प्राध्यापक उन्हें सर-आँखों पर लेते .

चीन और चीनी भाषा की प्रगति का यही मुख्य कारण है कि १९४९ में माओत्सेतुंग ने जब चीन पर आधिपत्य स्थापित किया , उसने सर्वप्रथम अंग्रेजी दां प्राध्यापकों और विद्वानों को निकाल बाहर किया और श्रम केन्द्रों में भेज दिया कि देश में कोई काम हो या न हो पर काम होगा तो अपनी भाषा में होगा , अपने देश की परिस्थितियों के अनुसार होगा .

मैंने अनेक हिंदी विद्वानों तथा साहित्यकारों से भी इस पर चर्चा की परन्तु किसी ने इस पर कोई पहल नहीं की क्योंकि आचार्य शुक्ल जी का आपना कोई गुट नहीं है . शुक्ल जी से मेरी भी कोई रिश्तेदारी नहीं है परन्तु हिंदी पत्रकारिता से जुड़े होने के कारण यह मेरा दायित्व है कि मैं उन तथ्यों पर प्रकाश डालूँ जिनसे इस देश और देश के लोगों का कल्याण हो सकता है . जहां तक म.प्र. सरकार के सहयोग का प्रश्न है तो जो राजधानी भोपाल की बस सेवा का नाम तक हिंदी में नहीं रखना चाहती है, उससे किसी हिंदी विद्वान के सम्मान की आशा करना ही व्यर्थ है .

पटना साहिब एवं बैजनाथ धाम

हमने यह यात्रा मार्च के अंत में की थी . हम भोपाल से इटारसी और वहां से पटना पहुंचे . पटना जंक्शन पर सामने ही पटना साहिब जाने वाली ट्रेन खड़ी थी .  हम दूसरी तरफ से उस ट्रेन में चढ़ गए और २० मिनट में पटना साहिब स्टेशन पहुँच गए . वहां रिक्शे से हम  पटना साहिब गुरुद्वारे गए . हम वहां पहली बार गए थे . कोई जानकारी नहीं थी . रिक्शे वाले ने हमें उनके काउंटर तक पहुंचा दिया जहाँ हमने गुरुद्वारे में ही एक वी आई पी कमरा ले लिया . किराया है २०० रुपये . अच्छे , खुले, बड़े  कमरे  हैं .  
      पटना साहिब सिखों के ५ बड़े तीर्थ स्थानों में से एक है . वहां सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ था . प्राचीन गुरुद्वारा है परन्तु शहर उससे भी बहुत प्राचीन है . अतः उसमें अपेक्षा कृत कम स्थान है और घनी आबादी में है , सड़कें संकरी हैं . नहा- धोकर हमने दरबार साहिब में दर्शन किये , प्रसाद ग्रहण किया . उसके बाद हमने लंगर छका . गुरुद्वारे में हमने म्यूजियम देखा . उसमें सिख इतिहास को चित्रों एवं उनके नीचे लिखी टिप्पणी द्वारा बहुत सहज तरीके से जीवंत किया गया है . उसे देखकर सिख धर्म की कुर्बानियों ,सेवा भाव तथा जन कल्याणकारी कार्यों को अच्छी प्रकार समझा जा सकता है . दरबार साहिब में हमने गुरु गोबिंद सिंह जी के अस्त्र- शस्त्रों के भी दर्शन किये .
       दूसरे दिन हम गुरुद्वारे की बसों से निकटवर्ती चार प्रमुख अन्य गुरुद्वारों में भी गए . प्रत्येक गुरुद्वारे का अलग इतिहास है . उसे जानकर सिख गुरुओं के महान कार्यों को समझा जा सकता है . बस यात्रा लगभग ४ घंटे की थी . बस में बैठे हुए हमने पटना शहर भी देख लिया जो अन्यथा संभव नहीं था . हम प्रातः गुरुद्वारे से नाश्ता करके निकले थे , लौट के आये तो लंगर का प्रसाद लिया और वहां से स्टेशन के लिए प्रस्थान किया .

                          बैजनाथ धाम

   पटना साहिब स्टेशन से हम ट्रेन द्वारा जसीडीह के लिए चल पड़े . बैजनाथ धाम स्टेशन से कितना दूर है , रात्रि में वहां जाने के लिए कोई  वाहन वहां मिलेगा या नहीं , रात्रि में रास्ते में लूट- पाट  तो नहीं होती है, जैसे अनेक प्रश्न दिमाग में दौड़ रहे थे . ट्रेन में हमारे सहयात्री रवि भूषण तथा उनका परिवार था . उन्होंने हमें आश्वस्त किया कि वहां बहुत साधन मिलेंगे और कोई चिंता की बात नहीं है .रात्रि ९ बजे जब हम जसीडीह स्टेशन पर उतर कर बाहर आये तो वहां बहुत चहल-पहल थी .बाहर अनेक ऑटो रिक्शा और शेयर ऑटो रिक्शा खड़े थे . वे देवघर के लिए आवाजें लगा रहे थे . बैजनाथ धाम जिला देवघर का मुख्यालय है . वहां  देवघर रेलवे स्टेशन भी है जहाँ से प्रातः ६ बजे से रात्रि १०  बजे तक लोकल ट्रेन कई चक्कर लगाती है .वहां का केन्द्रीय स्थान लाईट टावर है जो स्टेशन से ३-४ सौ मीटर दूर होगा . वहीँ पास में बस स्टैंड भी है .  रवि भूषण उसी क्षेत्र में एक कंपनी में अधिकारी हैं . उन्हें लेने गाड़ी आई तो उन्होंने हमें भी बैठा लिया और रास्ते में बैजनाथ धाम में होटलों के मध्य लाईट टावर चौक में उतार दिया .
  वहां  आस – पास के होटल या तो भरे हुए थे या  मंहगे थे . हमने एक रिक्शे वाले से कहा तो वह हमें थोड़ी दूरी पर एक होटल में ले गया . हमारे कमरे में प्रवेश करते ही एक बुजुर्ग पंडा आ गया . वह हमें दूसरे दिन मंदिर दर्शन कराने ले जाना चाहता था . पंडों के नाम से ही पसीने छूटने लगते हैं कि पता नहीं क्या गुल खिलाएंगे . हमने उससे कहा कि हम स्वयं दर्शन कर लेंगे , उसकी आवश्यकता  नहीं है . वह चला गया . प्रातः हम तैयार हुए कि वह सामने आ गया और बोला कि वह हमें दर्शन करवाएगा . हमारे मना करने पर भी वह हमारे साथ मंदिर तक चलता गया . मंदिर एक-डेढ़  किलोमीटर दूर होगा. लाईट टावर से एक किमी होगा . चौक के आगे सकरी सड़क है . रिक्शा एवं ऑटो वहां तक आते-जाते रहते हैं . वहां के मावे एवं पेड़ों का स्वाद अच्छा है . हमें दूरी का अंदाज नहीं था .हमें लगा कि मंदिर पास में ही होगा अतः हम पैदल चलते गए . पंडा साथ चल ही रहा था .रास्ते में और पण्डे भी मिले परन्तु एक पण्डे को साथ देखकर वे कुछ नहीं बोले . यदि वह साथ न होता तो दूसरा पंडा पकड़ लेता अर्थात बिना पण्डे के मंदिर में प्रवेश असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है . 
    मंदिर परिसर में  प्रवेश करते ही वह सक्रिय हो गया .यहाँ जूते- चप्पल उतारो , यहाँ से फूल लो , यहाँ से गंगा जल लो . जब हमने गंगा जल के दाम पूछे तो विक्रेता ने बताया २५ रूपये में करीब १०० मिली और वह भी साफ़ नहीं था . मैंने पण्डे से कहा कि हम इसे नहीं लेंगे , जल से अभिषेक करेंगे . पण्डे ने कहा कि जल से अभिषेक नहीं कर सकते तो हमने कहा कि हम बिना अभिषेक के ही दर्शन कर लेंगे . पंडा हमें किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था . खत्री जी ने उससे कहा कि हम उसे २१ रुपये दक्षिणा देंगे , वह तैयार हो गया . उसने हमें तत्काल एक युवा पण्डे के हवाले कर दिया .
   प्रातः ९-१० बजे  के मध्य का समय था . उस दिन कोई ज्यादा भीड़ नहीं थी . १०० लोग भी नहीं थे . वहां पंक्ति बनाने के लिए रेलिंग नहीं है . धक्का- मुक्की ही एक सहारा है . उस युवा पण्डे ने खत्री जी से कहा कि अपनी दोनों बाहें सामने करे , मुझे कहा कि मैं उसकी ओर मुंह करके दोनों बाँहों के बीच में खड़ी हो जाऊं . फिर उसने भी अपने हाथ लम्बे करके खत्रीजी कि बाँहों को पकड़ लिया और खत्री जी ने उसकी बाहों को . कुल मिलाकर ऐसा दृश्य बना जैसे खत्रीजी गाड़ी हों , मैं सवार और पंडा उसे खींचने वाला . हम देश में सभी ज्योतिलिंगों के दर्शन कर चुके हैं . यह नया तरीका हमने बैजनाथ धाम में देखा . वह हमें घसीट कर भीड़ में ले जानी लगा . पहली किश्त में अन्दर बरामदे तक ले गया और दूसरी में मंदिर के अन्दर . मंदिर में जाने – आने का एक छोटा सा द्वार है . वहाँ रोक थी . गर्भ गृह खाली होने के बाद अन्दर जाने देते हैं . हम अन्दर गए तो पैर बड़ी कठिनाई से रखे हुए थे . जितने लोग ठूंस सकते थे अन्दर ढूंस दिए . पण्डे ने हमें दीवार से सटा  के खड़ा कर दिया कि चलने की जगह बने तो ज्योतिर्लिंग तक ले चलें . ५ मिनट में हिलने- डुलने लायक जगह हो गई . गेट पर खड़ा एक व्यक्ति हाथ में मोटी प्लास्टिक तीलियों से बना एक पतला झाडू नुमा बंच लेकर सबको आगे हांक रहा था . हम दो थे , किसी समूह में ४, ६ या ज्यादा लोग भी हो सकते हैं . जब सबको एक साथ खींचा जायेगा तो धक्का – मुक्की होनी ही है . यदि वहां पंक्ति व्यवस्था होती तो समय भले ही कुछ ज्यादा लगता परन्तु सबको अच्छे से दर्शन हो जाते . धक्कों के कारण लोग प्रसाद के डब्बों को , जल के लोटों को ऊपर करके छलकते हुए ले जा रहे थे . धक्कों में बच्चे. बड़े ,बूढ़े, स्त्रियाँ सभी आनंद ले रहे थे . प्रवेश करने से पूर्व पण्डे ने समझा दिया था कि पाकेटमारों से सावधान रहना . बहरहाल हमने ज्योतिलिंग के दर्शन किये , पण्डे ने फूल अर्पित करवा दिए , पूजा करवा दी , दो मिनट लगे होंगे . रेले से बाहर आ गए .
      बाहर आकर बुजुर्ग पण्डे को तय २१ रूपये दिए , वह चुप था , हमने १०० रूपये और दिए और युवक को भी २१ रूपये दिए . उसने विवाद नहीं किया . बाद में उसने बताया कि दोपहर बाद भीड़ नहीं होती है . खत्रीजी की भांजी और दामाद दो वर्ष पूर्व गए थे , उन्हें बिना किसी परेशानी के अच्छे से दर्शन हो गए थे. फिर पण्डे ने कहा कि उनके संघ को भी दान देना होता है . हम उसके साथ गए , वहां हमने ५१ रूपये दिए . किसी ने इस पर कहीं  विवाद नहीं किया . परन्तु ओंकारेश्वर में एक पण्डे ने कुछ न लेने की  बात पर शार्टकट ४-५ मिनट में पूजा करवा दी और १०१ रूपये लेकर ब्राह्मण भोजन के नाम पर १००० से ५०० रुपयों की मांग करने लगा और झंझट करने लगा .अतः मन में भय बना रहता है कि पता नहीं बाद में ये क्या करेंगे.
    हमने उसी परिसर में स्थित अन्य  मंदिरों में भी दर्शन किये . हर मंदिर और मोड़ पर पण्डे हाथ फैलाए दक्षिणा मांग रहे थे भले ही कोई एक रुपया दे  .कुछ  हिन्दू लोग बहुत बड़े भक्त होते हैं . वे चाहे – अनचाहे सभी मूर्तियों को नहलाते जाते हैं जिससे परिसर में चारों ओर किच-किच मची रहती है. साफ-सफाई की फुर्सत किसे है ? बस सबको पैसा चाहिए .दर्शन करके हम बाहर आये और रिक्शे से चौक तक आ गए . वहां ऑटो या रिक्शे के रेट  ढीक हैं , कभी थोड़ा मोलतोल करना पड़ता है .चौक पर एक ही ठीक स्थान दिखा जहां हमने भोजन किया . उसके बाद हमने एक ऑटो किया आसपास के स्थानों को दिखने के लिए . वह ६०० रूपये मांग रहा था हमने ५५० कहा .हमें तो वहां के किसी स्थान या दूरी का पता था नहीं , उसके विश्वास पर घूमने चल पड़े .
   देवघर से ४५ किमी दूर वासुकी नाग मंदिर है . परिसर में अन्य मंदिर भी हैं . वहां भी वैसी ही अव्यवस्थाएं तथा गंदगी है . बाहर चढ़ाने के लिए अनेक चीजें मिलती रहती हैं जबकि अन्दर उन्हें चढाने नहीं दिया जाता है . अतः फूल - प्रसाद के आलावा हमने कुछ नहीं लिया और बिना पण्डे के ही दर्शन किये . वहां कोई जबरन पीछे लगा भी नहीं . लौटते  में हम अनेक स्थानों को देखते हुए आये . रास्ते में त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित तपोवन में गए . यह रामायण काल के प्रसिद्ध  जटायु कि पहाड़ी कही जाती है .  त्रिकुटा पहाड़ी पर वृक्षावलियों के मध्य एक सन्यासी का आश्रम था जो  आज भी है . वहां वानरों की  संख्या बहुत अधिक है परन्तु किसी को परेशान  करते नहीं देखा . पहाड़ी पर चढ़ने के लिए ट्राली व्यवस्था है परन्तु समयाभाव के कारण हम ऊपर नहीं जा सके जहां जटायु का स्मारक है . वहां भ्रमण करना अच्छा लगा .इसके पश्चात मार्ग में हमने नौलखा मंदिर देखा .यह आधुनिक शैली का है .साथमें आश्रम परिसर भी है . हम उसके बाद श्री जगत बंधु आश्रम , श्री बालानंदन आश्रम , मोहन  मंदिर ( बंद था ) तथा नंदन पार्क गए .ये सभी स्थान वहां के प्रसिद्द गुरुओं के आश्रम हैं . वहाँ पर मंदिर, उनकी मूर्ती या समाधि स्थित हैं . सभी स्थान रमणीक हैं और देखने योग्य हैं .
   लगभग साढ़े पांच घंटे कि यात्रा के बाद हम देवघर लौटे . सभी स्थानों के बारे में ऑटो चालक ने संक्षिप्त जानकारी दे दी थी . उसने किसी स्थान पर यह भी नहीं कहा कि इतनी देर में वापस आ जाओ . उसका व्यवहार बहुत अच्छा था और ४५ किमी जाकर वापस घुमाते हुए लाने का किराया भी बहुत ठीक था .
  देवघर में हमने समाचार पढ़ा कि झारखण्ड राज्य के  १६.५ हजार करोड़ रूपये के २०१२-१३ के लिए स्वीकृत   सालाना योजना व्यय  में से राज्य के निकम्मे अफसर – नेता ५००० करोड़ रूपये  व्यय ही नहीं कर पाए . ३१ मार्च रविवार के दिन उन्होंने ताबड़तोड़ १५०० करोड़ रूपये निकाल लिए . शेष राशि लेप्स हो गई . ऐसे अयोग्य शासकों- प्रशासकों  वाला प्रदेश कहाँ से तरक्की करेगा ? यह देखकर डा खत्री के  राजतपथ के पूर्व अंक में प्रकाशित लेख की सत्यता दृष्टि गोचर हुई कि ‘नौकर देश का निर्माण नहीं कर सकते ‘.
        हम बैजनाथ धाम से राजगीर  जाना चाहते थे परन्तु हमें कोई मार्ग बताने वाला ही न था , न होटल वाला और न बस स्टैंड पर . अतः अगले दिन प्रातः हम देवघर से ट्रेन द्वारा जसीडीह पहुंचे और वहां से पैसेंजर नुमा एक्सप्रेस ट्रेन से अपरान्ह वापस  पटना पहुंचे .