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सोमवार, 7 जनवरी 2013

बंगलादेश में राष्ट्रपति शासन

                                      बंगलादेश में राष्ट्रपति शासन   (1975 )
  बंगलादेश में राष्ट्रपति शासन प्रो डी खत्री द्वारा फरवरी १९७५ में पत्र 'दिनमान ' में प्रकाशन के लिए भेजा गया था जो नहीं छप सका .रद्दी कागजों में यह पुनः मिला इस पुराने पत्र को पाठकों के समक्ष ३६ वर्ष पश्चात प्रस्तुत करने का उद्देश्य है , इसकी सत्य भविष्य वाणी जो बंगलादेश की राजनीति दिशा के लिए की गई थी और जिसे कोई महत्त्व नहीं दिया गया था बंगलादेश की आजादी के बाद मुजीबुर्रहमान पहले प्रधान मंत्री बने .उन्होंने सभी विपक्षी दलों को प्रतिबंधित कर दिया था तथा एक नया संविधान बनाकर वे बंगलादेश के राष्ट्रपति बन गए तथा सारी शक्तियां अपने हाथ में समेट लीं भारत की प्रधान मंत्री इंदिरागांधी समेट अनेक राष्ट्राध्यक्षों ने इसे बंगला देश की दूसरी आजादी कहा तथा उन्हें बधाइयाँ दी जाने लगीं डा खत्री ने इस पत्र के माध्यम से चेतावनी देनी चाही कि उनके साथी उनकी हत्या कर सकते हैं तथा इसका अंत मिलिट्री शासन में होगा और छः माह बाद वही हुआ पत्र कि याह भविष्यवाणी भी सही हुई कि रूस में कमुनिस्ट शासन का अंत उनके आतंरिक विस्फोट से होगा परंतु यह अनुमान गलत निकला कि वहां पर कम्युनिस्टों का शासन दो -ढाई सौ साल बाद नष्ट होगा , वह ७६-७७ वर्ष संसदीय ही समाप्त हो गया
       संसदीय प्रणाली से अध्यक्षीय प्रणाली में परिवर्तन करना क्रांति का पर्याय नहीं हो सकताइस प्रकार का परिवर्तन तानाशाही का प्रतीक भी नहीं है परन्तु एक ही द का शासन होना तानाशाही हैइस पद्धति में एक ही व्यक्ति जो द का अध्यक्ष होता है राज्य की सभी शक्तियों ( व्यवस्थापिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका ) का नियंत्रण करता हैबंगलादेश की नवीन पद्धति के अनुसार सरकारी कर्मचारी भी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के सदस्य हो सकते हैं .यह इस तथ्य का पर्याय मात्रा है कि दल के सदस्य ही सरकारी कर्मचारी हो सकते हैंविधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का एकीकरण होने से राष्ट्र के अध्यक्ष को असीम अधिकार प्राप्त हो जाते हैंयदि हम उसे निरंकुश शासक कहें तो अधिक उपयुक्त होगा.अधिकार सुखद परिणाम के द्योतक नहीं हैं अधिकार शब्द कर्तव्य का ही रूपांतर है अधिकारों कि व्यापकता का अर्थ है कर्तव्यों कि व्यापकताअतः निरंकुश शासक के कर्तव्य भी असीम हो जाते हैं .व्यक्ति सीमित होता है ,वह असीमित कर्तव्यों का पालन कभी नहीं कर सकेगा
      बंगलादेश कि वर्तमान शासन पद्धति में मुजीब का प्रभाव इतना अधिक है कि देश का कोई भी व्यक्ति उनकी आलोचना नहीं कर सकेगाबंगबंधु सर्व व्यापी नहीं हैं उन्हें उस समूह के व्यक्तियों का विश्वास करना होगा जो उन्हें सदैव घेरे रहेंगे .देश कि वर्तमान समस्याओं को देखते हुए स्वार्थी लोगों का एक नया वर्ग जन्म लेगा कुछ दिनों ताक ये लोग अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं परन्तु शीघ्र ही वे अपने अधिकारों द्वारा दलित वर्ग का शोषण प्रारंभ कर देंगेनिरंकुश शासन में षड्यंत्रों की सम्भावना भी बढ़ जाती हैयह कार्य उन लोगों के लिए अधिक सुगम होता है जो शासक दल के निकट रहते हैं .कालांतर में ये लोग षड्यंत्रों में रूचि लेने लगेंगे , शासन मुजीब का हो या उनके उत्तराधिकारियों काइन लोगों की महत्वाकांक्षा अधिक अधिकार पाने की ओर प्रवृत होगी की कर्तव्यों का पालन करने मेंइससे जो राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न होगी उसका अंत सैनिक तानाशाही में होगा
       एक दलीय शासन पद्धति साम्यवादी देशों में फलीभूत हो रही हैनिश्चित रूप से यह पद्धति संक्रमण कल में उपयुक्त है , स्थायी भी अपेक्षा कृत अधिक हैइसका मुख्य आधार दल की दार्शनिक विचारधारा हैदल का सदस्य केवल उस व्यक्ति को बनाया जाता है जो कार्य एवं विचारों द्वारा साम्यवाद में आस्था प्रदर्शित करता हैपरन्तु ये विचार रूढ़ीवादिता को जन्म देंगे .उदहारण स्वरूप वैदिक एवं उसके पश्चात् बौद्ध धर्म का विकास चरम सीमा ताक हुआ था .समय के साथ ही लोग धर्म को कर्तव्य मान कर पंथ मानने लगे और कुछ विशेष क्रियाओं के करने में ही उनके कर्तव्य की इतिश्री होने लगीवे रूढ़ी वादी हो गए और उनका पतन हो गयाअतः साम्यवाद का अंत भी अराजकता में , जैसा कि कार्ल मार्क्स ने कहा है , होकर सैनिक तानाशाही में होगा परन्तु इसमें पर्याप्त समय लगेगा इसके विपरीत बंगलादेश की राजनीति में द का पतन कभी भी हो सकता है
   'बंगला देश अब्सर्वर ' ने लिखा है , बंगबंधु चाहे जिस भी रूप में देश का नेतृत्व करें , वे बंग बन्धु ही हैं , वह राष्ट्र पिता हैं ',मैं इससे सहमत नहीं हूँ .एक पिता अपने पुत्र को जन्म देने के बाद उसका उपयोग अपनी इच्छा से नहीं कर सकतायहाँ एक व्यक्ति की इच्छा का प्रश्न हैदेश की सीमा में बहुत लोग रहते हैं जिन्होंने देश के लिए त्याग किया हैउन सब को किसी एक व्यक्ति की इच्छा से चलने के लिए बाध्य करना मानवता की हत्या होगी फिर वह इच्छा चाहे राष्ट्र-पिता की ही होयदि श्री मुजीब इस पद्धति को संक्रमण काल के रूप में एक निश्चित अवधि तक लागू करके पुनः प्रजातंत्र की स्थापना करते हैं तो निश्चय ही वे एक राष्ट्र के जनक हैं , श्रद्धा के पात्र हैं .इतिहास उनकी भूरी भूरी प्रशंसा करेगायदि यह स्थायित्व ग्रहण करती है तो यह क्रांति नहीं भ्रान्ति होगी और इतिहास इसके परिणामों का दोष भी मुजीब के सिर पर मढ़ देगा

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

वफादार

पंडित राम नारायण एक सरकारी अधिकारी थे . बीस साल की अफसरी  हो गई थी . उनकी बड़ी इच्छा  थी कि एक अपना भी मकान हो. अब उन्हें किराये पर रहना अच्छा नहीं लगता था . कहने को सरकारी अफसर थे , परन्तु ईमानदारी का लबादा ओढ़े बैठे थे . इसलिए अभी तक एक मकान भी नहीं बनवा पाए थे . उनके लिपिकों के भी अच्छे खासे बंगले थे . विभाग के लोग उनसे सहानुभूति तो रखते थे , परन्तु  मकान बनाने में कोई क्या मदद करता . पंडित जी को इसका भी मलाल होता कि जो लोग दादागिरी करके सरकारी जमीन पर  कब्ज़ा कर लेते हैं , सरकार ने हाथ - पैर जोड़कर उन्हें मुफ्त के मकान  बांटे पर ईमानदार अफसर होने के कारण उनसे झूठ- मूठ में कोई पूछने तक नहीं आया . पर सब के दिन फिरते हैं , उनके भी फिरे . बैंक से लोन  मिल गया . उन्हें एक अच्छा सा बिल्डर भी मिल गया और  वह मकान मालिक हो गए . शुभ मुहूर्त देख कर गृह - प्रवेश किया . उनकी  धर्म पत्नी  की ख़ुशी का तो ठिकाना ही न था और ख़ुशी क्यों न होती . उन्होंने घर को अन्दर- बाहर  से खूब सजाया . घर के बाहर क्यारियां बनाईं . उनमें  सुन्दर  फूलों के पौधे लगाये , गमले सजाये . कोई भी देखता उनकी तारीफ करता .

फूल बड़े कोमल होते हैं . यदि बड़ी बाउंड्री वाल बनाकर उन्हें पापियों की नज़र से नहीं बचाया गया ,तो उनका जीवन असंभव सा हो जाता है . पापी लोग भगवान  को खुश करने के लिए , जहाँ से भी संभव हो  फूल प्राप्त करने में कोई संकोच नहीं करते हैं . कुछ लोग तो बाकायदा एक बड़ा प्लास्टिक का झोलानुमा लिफाफा लेकर चलते हैं  दूसरे   हाथ में लम्बी डंडी ले कर चलते हैं जिसके आगे मुड़ी हुई तार लगी रहती है . अगर कोई फूल शराफत से हाथ में न आये तो वे डंडी उचका कर तार  उस फूल की गर्दन में फंसाकर उसकी गर्दन मरोड़ने से भी नहीं चूकते हैं .देवी जी को चढ़ने वाले गुलहड़ के लाल   फूल की तो कली  को भी लोग नहीं छोड़ते हैं  . उनके पापों को धोने के लिए झउआ भर फूल भी पूरे नहीं पड़ते हैं . 

पंडिताइन जी मेहनत  करतीं , पानी देतीं , खाद डालतीं  , घास निकालती , पौधों की कांट - छांट  करवातीं , दो - चार फूल भगवान को भी अर्पित करतीं .  उनके फूलों को भी पापियों की  नज़र लग गई . सुबह छः बजे सोकर बाहर  आतीं तो देखती फूल नदारत हैं . रोज थोड़े- थोड़े फूल जाते ,थोडा - थोडा गुस्सा भी आता . गुस्सा आ तो रोज रहा था , पर निकल नहीं पा  रहा था . बेचारे  पंडित जी इतने सीधे कि डर के मारे कोई गड़बड़ ही न करते . रोब झाड़ने के लिए पंडिताइन उन्हें कभी - कभी डपट लेती थी पर प्यार की डपट से कही गुस्सा शांत होता है ?

एक दिन तो गजब हो गया . वे जब ऊपर से बगिया को निहार रहीं थीं, उनकी खासम - खास सहेली ही दिन दहाड़े साधिकार उनका फूल तोड़ ले गईं  , पूछना तो दूर , पूछने की जरूरत ही नहीं समझी . सहेली तो अपनी थी और अपनों पर भी गुस्सा निकाल लेने में कोई हर्ज नहीं है बशर्ते अगले ने कोई  अक्षम्य अपराध किया हो . वे गुस्से से नीचे उतरीं और सहेली के घर बिना पूछे घुस गईं  . जैसे उसने बिना पूछे फूल तोड़े थे ,उससे भी  बिना स्पष्टीकरण मांगे , बिना बचाव का अवसर दिए  पंडिताइन ने ताबड़तोड़ चिल्लाना शुरू कर  दिया . जब तक वह समझ पातीं की बात क्या है , पंडिताइन ने रोना - चिल्लाना शुरू कर दिया और झटपट बाहर को दौड़ीं  . बचाओ - बचाओ चिल्लाते अपने घर में जा घुसीं . जब पंडिताइन डपट रहीं थी तो पड़ोसन के वफादार कुत्ते ने सोचा कि आज वफ़ादारी का सुअवसर मिला है , चूक गए तो जिंदगी भर पछताना पड़ेगा कि मालिक की रोटी मुफ्त में तोड़ते रहे और उनके प्यार के बदले बेवफाई की .जब इन्सान ही पूछने की जरूरत नहीं समझता , वह तो है ही जानवर!सोफे के नीचे से निकलकर लपका और  उसने मालकिन की प्रिय सहेली को बिना पूछे ही पैर  चाब लिया .

वफादार कुत्ते  की मालकिन इस बात से भयभीत हो गईं कि  पंडिताइन बहुत गुस्से में है , कहीं पुलिस में रपट न कर दे  या उसे सहेली से बहुत सहानुभूति पैदा हो गयी या फिर सहेली की हरकत पर दया आ गयी , वह भी सारा काम - काज छोड़कर उसके पीछे - पीछे आ गई और समझाने लगी कि उनका कुत्ता पागल बिलकुल नहीं हैं , उसे सारे इंजेक्शन लगे हुए हैं . डरने की कोई बात नहीं है और इसके साथ ही बार- बार सॉरी भी बोलती जा रहीं थी . पंडिताइन तो अपना गुस्सा पहले ही निकाल आईं  थीं . रोनी हंसी के आलावा उनके पास अब कुछ नहीं बचा था . बेचारे पंडित जी ने गाड़ी निकाली और पंडिताइन को धैर्य बंधवाते , समझाते - बुझाते ,सुई लगवाने अस्पताल ले गए .

   फूलों ने गुल ऐसा खिलाया , बदनाम गुलशन हो गया .
    बागवान देखता रह गया   ,चमन  ही  दुश्मन  हो गया .

रविवार, 23 सितंबर 2012

सिकुलर भ्रष्टाचार , माया की माया , उलूक वाहन

सिकुलर भ्रष्टाचार 
सिकुलर -सांप्रदायिक हो गया , मंहगाई - भ्रष्टाचार ,
सपा पार्टी समझा रही , इन दोनों के व्यवहार .
पार्टी के काम हैं भिन्न , ये भी भिन्न रूप के होंगे ,
कांग्रेस - सपा के भ्रष्टाचार , पूर्णतयः सिकुलर होंगे .
भाजपा के भ्रष्टाचार को वे घोर साम्प्रदायिक कहते ,
सिकुलर भ्रष्टाचार भला , उसको ये  पूर्ण  समर्थन देते .
       माया की माया 
कांग्रेस को बसपा मानती , सांपनाथ का रूप ,
भाजपा को वह कह रही ,नागनाथ स्वरूप .
सांपनाथ स्वीकार  है , विष थोड़ा कम  होय ,
कांग्रेस का हाथ पकड़ कर , सपने रही संजोय .
केंद्र से  मिलता  लाभ , पकाओ कांग्रेस संग खिचड़ी ,
माया तो माया में डूबी , बसपा राजनीति में पिछड़ी .

            उलूक  वाहन
रहस्य मय दिन भर रहे , रात्रि करे निज काम .
अन्धकार में देख सके , लक्ष्मी रहे उसके धाम ..
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उलूक बनायें व्यक्ति को  , उस पर हो जांए सवार 
वह अपना धन दे जायगा , करिए उस पर अधिकार .
 करिए उस पर अधिकार  और लक्ष्मी पुत्र कहलाएं ,
उद्यमी , शासक , ऋषि राज , सभी से आदर पाएं  .
जो उलूकों को लेता  पाल , उन्हें चहुँ  ओर उड़ाता ,
पाता पद और मान ,        कुबेर नाथ बन जाता ..