शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

लोकतान्त्रिक समाज


                    
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          लोकतान्त्रिक समाज 
      लोकतान्त्रिक समाज वह  समाज है जो लोगों की सामान्य इच्छा से स्वतः स्फूर्त चलता है। प्रत्येक व्यक्ति के विचार एवं  आवश्यकताएं भिन्न होती हैं।  व्यक्ति की भाषा, वाणी, खान-पान,  पहनावा, चाल-ढाल, कार्य और कार्य करने के ढंग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं परन्तु ऐसी अनेक आवश्यकताएं है जो लोगों में समान हो सकती है जैसे सुरक्षा व्यवस्था, आवास व्यवस्था, खाद्य पदार्थों की उपलब्धता, जल, विद्युत्, शिक्षा, सड़कें, वाहन, स्वास्थ्य  सेवाएं, उद्योग, व्यवसाय, धन-संपत्ति, ईँधन,  क्षेत्र की साफ-सफाई,  सीवेज आदि।  इनको सुचारू रूप से दो प्रकार से चलाया जा सकता है।  एक, कोई व्यक्ति निजी स्तर पर ये व्यवस्थाएं करे और लोग उसके लिए भुगतान करें   और दूसरी, लोग मिलजुल कर ऐसी व्यवस्था बनाएं कि उनकी देखरेख में ये सुविधाएं मिलती रहें। पहली व्यवस्था में पैसे देकर काम कराना है , कोई सिरदर्द नहीं है।इस में यह भय बना रहेगा कि सेवा प्रदाता अवसर देखकर भाव बढ़ा दे।  जैसे खाद्य सामग्री के भाव बहुत बढ़ा दे तो लोग क्या खायेंगे ? और यदि सुरक्षा देने वाला भाव बढ़ा दे और व्यक्ति उतना धन न दे सके तो उसका जीवन कैसे चलेगा ? इसे आदिम व्यवस्था के तुल्य समझा जा सकता है जहां मत्स्य न्याय था, शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर का शोषण कर लेता था।  वेदव्यास जी ने कहा है कि मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो मनुष्य को दास बनाकर  उसका शोषण करता  है।  इससे बचने का दूसरा रास्ता है सब मिलजुल कर व्यवस्था बनाएं।  आदिम काल की ऐसी व्यवस्था ने राज्य और शासन व्यवस्था को जन्म दिया जब सभी लोग मिलकर मनु के पास गए और उनसे  सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए अनुरोध किया।  लोगों ने इसके बदले उन्हें अपनी आय का एक भाग देने का वचन दिया।  उस समय की शासन व्यवस्था का उद्देश्य न्याय स्थापित करना था ताकि लोग भय रहित होकर निजी कार्य स्वतंत्रता पूर्वक कर सकें। प्रारम्भ में राजा  का कार्य प्रजा का पालन करना था परन्तु धीरे - धेरे उसमें परिवर्तन होते गए और राजा राज्य को अपनी निजी संपत्ति मानने लग गए।  दार्शनिकों ने इसके लिए प्रतिवाद किये और क्रमशः प्रजातंत्र की स्थापन होती गई जो आज विश्व के अनेक देशों में विद्यमान है। इसमें लोग राजा का चुनाव करते हैं।  इस व्यवस्था में यह मान्यता स्थापित हुई कि राज्य के सम्पूर्ण प्राकृतिक सम्पदा जनता की है जो कि पहले राजा और उसके वंशजों की होती थी।  इस व्यवस्था में यह दोष उत्पन्न हो गया कि जिन्हें राज्याधिकार मिले उन्होंने संसाधनों का उपयोग निजी लाभ के लिए करना शुरू कर दिया।  आज विश्व के अधिकांश देश भ्रष्टाचार की चपेट में हैं।  इस व्यवस्था में कुछ लोग लाभ उठा रहे हैं तो अनेक लोग शोषण और अव्यवस्था का शिकार हो रहे हैं।  इस व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए कैसी सामाजिक व्यवस्था बनाई जाए, यह आज की सबसे बड़ी समस्या है । कानूनऔर  मशीनीकरण से यह आभास तो होता है कि कुछ सुधार हो रहा है परन्तु फिर देखने में आता  है कि  भ्रष्टाचार अपनी सीमाएं पार करके अनंत में बढता जा रहा है।  लोगों को राहत राशि या छात्रों को छात्रवृत्तियां  बाँटने में  बाबू-अफसर घूंस खाते हैं।  उन्हें रोकने के लिए राशि नेट से सीधे उनके खाते में जमा की जाने लगी।  भ्रष्टाचार रुक गया।  मेडिकल कालेजों में प्रवेश और विभिन्न नौकरियां दिलवाने में लाखों रुपये खाए  जाने लगे। केंद्रीय मंत्री तो हजारो करोड़ के नए- नए घपले करने लगे।  न्यायालयों में मुकदमों का अम्बार लगा दिया ताकि लोगों को न्याय न दिया जाए।  अन्ना हजारे ने वर्षों तक आंदोलन करके लोकपाल बिल बनवा दिया।  उससे कितना लाभ मिलेगा अभी कहना कठिन है क्योंकि उसमें बैठेंगे तो इसी भ्रष्ट  व्यवस्था के लोग। यह वैसा ही कार्य कहा जा सकता है जैसे गम्भीर रोगी को तीर-तुक्के से नई  दवा दे दी जाए तो घरवालों और मरीज़ को लगने लगता है कि  अब इससे ठीक हो जायेंगे।  
          भारत में सबसे बड़ी सामाजिक समस्या है स्वार्थ, काम में मक्कारी करना और व्यवस्था के विरुद्ध काम छोड़कर आंदोलन करना।  यहाँ के सांसद और विधायक जिन्हें इस देश को चलाने का दायित्व दिया गया है , काम न करने, काम न करने देने में सबसे आगे हैं और ये सब कार्य वे पूरे वेतन-भत्ते लेकर करते हैं। राज नेता अपनी पूरी सामर्थ्य से समाज को धर्म, जाति , वर्ग, क्षेत्रीयता, भाषा आदि के आधार पर खंडित करते जा रहें हैं।   डा मनमोहन सिंह ने व्यवस्था में यह सुधार किया है कि धीरे- धीरे सारी  व्यवस्था  प्राइवेट स्तर पर दे दी जाय। इससे निचले स्तर पर भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी दोनों समाप्त हो जायेंगे।  सिर्फ बड़े महा भ्रष्ट अधिकारी  और मंत्री जो ठेके देंगे , शेष बचेंगे।  इस प्रथा के लिए उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा की जाती है कि उन्होंने द्देश को नई दिशा दी है।निजी स्तर पर  कतिपय सामाजिक संगठन अच्छे कार्य कर रहे हैं परन्तु इस व्यवस्था ने एन जी ओ का जाल बिछा दिया है जो शासकीय धन अर्थात जनता द्वारा कर के रूप में दिए गए धन को अपने-अपने स्तर पर पचाने में लगे हैं।  हमारे  समाज के सामने आज ये समस्याएं हैं जिन्हें दूर करना है : 
      १. भ्रष्टाचार दूर करना  २. लोगों से मक्कारी और स्वार्थ भावना समाप्त करना  ३. लोगों की भावनाओं और आवश्यकताओं को समझना  ४. उनके अनुसार शासन व्यवस्था स्थापित करना ५. राष्ट्र में सामाजिक समरसता उत्पन करना,  ६. व्यक्तित्व विकसित करने की  की स्वतंत्रता और गरिमा स्थापित करना  और लोगों को रचनात्मक कार्यों में लगाना। 
     यहाँ यह तथ्य ध्यान रखना होगा कि समाज में अनेक लोग ऋणात्मक कार्य करते रहते हैं।  उन्हें रोकने का उपदेश देने से कोई लाभ नहीं होगा।  समाज में ऐसी व्यवस्था बन जानी चाहिए कि लोग स्वप्रेरणा से सकारात्मक कार्य करने में  रूचि लें।  जैसे माँ अपने बेटे या बेटी से टीवी बंद करके पढ़ने के लिए कहती है तो कुछ प्रकरणों में बच्चों ने आत्महत्या तक कर ली।  ऐसे बच्चे समझाने से नहीं समझेंगे।  वातावरण ऐसा हो कि वे  अनावश्यक रूप से टीवी देखे ही नहीं।  
   भारतीय समाज विज्ञान की उपेक्षा एवं विरोध करना  आधुनिक तथा कथित बुद्धिजीवियों का फैशन हो गया है।  सारी  योजनाएं पवित्र विचारधार के विरुद्ध बनाई जाती हैं ताकि सामस्याएं बढ़ें।   रूसो, हॉब और लॉक के समझौता सिद्धांत के चर्चा होती है और अंत में कह दिया जाता है कि यह कपोल कल्पित अवधारणा है जिसका अब कोई महत्व नहीं है। परन्तु भारतीय समझौता सिद्धांत की कहीं चर्चा तक नहीं की जाती जो जीवंत है और सामजिकता का आधार है।  हिन्दू धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है परन्तु संस्कारों से द्विज बनता है।  संस्कार देने का कार्य विद्याध्ययन से प्रारम्भ होता है।  विद्याध्ययन के पूर्व बालक का यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है।  जनेऊ के तीन धागे बालक के गले में दाल दिए जाते हैं।  ये तीन धागे उस समझौते के बंधन है जिसमें उसे कहा जाता है कि तुम्हारे ऊपर तीन ऋण चढ़ रहे है जिन्हें चुकाने पर तुन्हें मोक्ष प्राप्त होगा।  ये तीन ऋण हैं : 
१. पितृऋण : माता - पिता ने उसे जन्म दिया है।  उसका भी कर्तव्य है सृष्टि के विकास में योगदान दे।  इसके साथ ही वह माता-पिता का आज्ञाकारी हो तथा  वृद्धावस्था में उनकी समुचित देखभाल एवं सेवा करे। 
२. ऋषि ऋण : बालक जीवन में अनेक लोगों से एवं प्रकृति से ज्ञान अर्जित करेगा।  उसका दायित्व है कि वह  अपने ज्ञान को समाज में बांटे तथा उसका विस्तार करे जिससे सामाज का कल्याण हो।
३. देवऋण :  व्यक्ति अपने जीवन में अनेक लोगों , पेड़-पौधों से, जीवजन्तुओं से तथा प्रकृति से इस शरीर के विकास के लिए वस्तुएं तथा ज्ञान अर्जित करता है।  उसका दायित्व है है कि वः भी अपने जीवन में जितना हो सके, जो कुछ हो सके,  समाज के लिए दे। 
       इससे स्पष्ट है  कि हमारे ऋषियों ने एक अच्छे समाज के विकास के लिए अनौपचारिक समझौता  किया था।  यदि बच्चे को बचपन से ये बातें हृदयस्थ करवा दी जाएँ तो वे मत-पिता गुरु की आज्ञाओं और वचनों का जीवन में प्रसन्नता पूर्वक पालन करेंगे तथा वृद्धावस्था में उनका भरण-पोषण ही नहीं, दिल से उनकी सेवा भी करेंगे। परन्तु हमारी सर्कार इन डाकिया नूसी बैटन में विश्वास नहीं करती है।  इसके स्थान पर माता-पिता गुरु द्वारा बच्चों को डांटनेऔर पीटने के विरुद्ध दंडात्मक क़ानून बनाती है और वृद्धावस्था में कानून बनाकर सोचती है कि अब बच्चे माता-पिता का भरण-पोषण करने लगेंगे। 
     गुरु जब शिष्य को पढ़ाते थे तो अच्छे समाज की कल्पना उनके मस्तिष्क में होती थी।  आज या तो गुरु नियुक्त ही नहीं होते और शिक्षक के नाम पर धर्म, जाती, घूंस आदि के आधार पर नियुक्तिया कार दी जाती है जिनका उद्देश्य अपना पेट भरना तथा कहीं से भी।, कैसे भी धन अर्जित करना होता है।  समाज से उन्हें क्या सरोकार होगा ? ये अपराध वृद्धि करने वाले समाज का नहीं तो किसका निर्माण करेंगे ? उस समय छात्र भिक्षा मांग कर आश्रम में लेट थे और लोग उन्हें दान देकर प्रसन्नता का अनुभव करते थे।  आज सरकार प्रत्येक वास्तु पर शिक्षा उपकार लगा रही है, दुनिया भर से कर्जे बटोर रही है और शिक्षा का व्यवसाय कर रही है और करवा रही है।  फिर भ्रष्टाचार रोकने के लिए क़ानून और लोकपाल बनाती है।  इन सबसे क्या हित होगा ?
   आज व्यक्ति कमाता है तो उसकी भूख और बढ़ती जाती है।  इसीलिये भारत के मंत्री कुछ भी बेचने के लिए तत्पर रहते है बस उन्हें हज़ारो-लाखों करोड़ रूपये मिलने चाहिए।  देव ऋण उन्हें किसी ने बताया ही नहीं।  
      अपने समझौता सिद्धांत में रूसो कहता है कि मनुष्य स्वतन्त्र जन्म लेता है परन्तु है  जीवन भर बेड़ियों में जकड़ा रहता है जो अत्यंत कष्ट प्रद है।  भारतीय मनीषी कहते हैं कि व्यक्ति जन्म से ही ऋणी है।  मनुष्य जन्म के लिए वह  ईश्वार का ऋणी है , जन्म के लिए वह माता-पिता का ऋणी है।  विद्या प्राप्त करने में वह गुरुओं , ऋषियो और ज्ञानियों का ऋणी है और जीवन यापन के लिए देवताओं और सृष्टि का ऋणी है।  परन्तु  स्वतंत्र होना  अर्थात मोक्ष प्राप्त करना उसका जन्म सिद्ध अधिकार है।  वह  यथाशक्ति उक्त ऋणों को चुकाता जाय, वह स्वतन्त्र हो जायगा, उसे मोक्ष मिल जायेगा।  गुरु नानक देव जी कहते है कि मोक्ष दुनिया से भागने में नहीं उसमें रहकर सेवा कारने  से प्राप्त होगी।  वही ईश्वर की सच्ची उपासना है।  
 कम्युनिस्ट धर्म के नाम से ही घृणा करते हैं  और भारत के  सैकुलर वादी लोग हिन्दूधर्म को साम्प्रदायिकता का  दूसरा नाम समझते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य उस व्यवस्था को बनाना है जिसमे विदेशी, भौतिक वादी , पूंजीवादी और भ्रष्ट लोगों का हित हो।  काग्रेस सरकार के नेता यह बड़े गर्व से कहते हैं कि उन्होंने  भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए , गरीबों की भलाई के लिए अनेक क़ानून बनाए हैं परन्तु वे यह नहीं बताते कि इन कानूनों से देश में भ्रष्टाचार और अपराध क्यों बढ़ते जा रहे हैं।  वर्त्तमान में देश की सभी पार्टियां , वे प्रत्यक्ष कुछ भी कहती हों , इसी ढर्रे पर चल रही हैं।  जिनसे सामजिक अव्यवस्थाएं बढ़नी ही हैं।
      निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का क़ानून केंद्र सरकार  ने बनाया जिसमें निजी स्कूलों को कक्षा ८ तक २५% गरीब एवं दलित-पिछड़ा वर्ग के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देना अनिवार्य किया गया  है परन्तु मुस्लिम और ईसाई वोट प्राप्त करने के लिए उसने यह प्रावधान कर दिया कि स्कूल यदि मुस्लिम या ईसाई व्यक्ति ने खोला है तो उसे किसी को निःशुल्क नहीं पढ़ाना है , सबसे धन कमाना  है।  केवल हिंदुओं की यह उत्तरदायित्व है कि वे सभी धर्म, जाति  के गरीब बच्चों को निःशुल्क पढ़ाएं।  यह लोकतान्त्रिक समाज के सिद्धांतों के विरुद्ध है क्योंकि कानून बनाकर कांग्रेस सरकार ने समाज के एक बड़े वर्ग को सामाजिक दायित्व से दूर कर दिया। संसद में किसी भी दल ने इस कंडिका का विरोध नहीं किया। 
      डा ए डी खत्री (१) ने लोकतान्त्रिक समाज का बेंजीन मॉडल दिया है। जिसके अनुसार समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने हित के लिए कार्य करना चाहिए परन्तु उसे अपनी शक्ति या आय या कार्य का एक उचित हिस्सा समाज को भी अर्पित करना चाहिए तभी उसे यह समाज अपना समाज लगेगा और वः इसके हित के लिए कार्य करेगा , जो विरोध में कार्य करते हैं उन्हें रोकेगा और अन्य लोगों को भी समाज सेवा के लिए प्रेरित करेगा।  जिसके पास धन है , वह धन का अंश दे , जिसके पास विद्या है , वह विद्या दान करे और जो ताथा कथित गरीब हैं वे श्रम दान करें।  सरकार ग्राम विकास के लिए सड़के बनवाती है।  उसका सारा व्यय जनता से प्राप्त कर से पूरा किया जाता  है।  ग्रामीण व्यक्ति जिसे उस सड़क का सीधा लाभ मिलेगा , प्रतिदिन एक-दो घंटे श्रमदान करना चाहिए।  इसे एक तो काम की गुणवत्ता बनी रहेगी और धन बचेगा तो उनकी अन्य आवश्यकताओं के काम अ जायगा।  सरकार लाखों रूपये के फ़्लैट गरीबों को बाँट रही है।  उन्हें बनाने में हितग्राहियों को श्रमदान करना चाहिए।  इस प्रकार जब सभी लोग समझें कि यह देश उनका है इसके प्रति उनके भी कुछ दायित्व हैं तभी वे देश की विभिन्न व्यवस्थाओं में रूचि लेंगे,सहयोग करेंगे , अच्छे- बुरे का भेद समझेंगे जिससे कार्यों की गुणवत्ता बढ़ेगी और भ्रष्टाचार कम होगा।  
   डा खत्री(२) ने दूसरा सिद्धांत सामाजिक दबाव का दिया है।  अभी देश में समूह दबाव काम कर रहे हैं।  जिनका संगठन शाक्तिशाली होता है वे आंदोलन करके  शासन और कंपनी मालिकों से अपनी मांगें मनवा लेते हैं।  जिनका संगठन नहीं होता या कमजोर होता है , उनकी आवश्यक मांगें भी नहीं सुनी जाती हैं।  जैसे पुलिस का व्यक्ति कितने दबाव में काम करता है , उसे क्या-क्या परेशानियां हो रही हैं ,यह  देखने वाला कोई नहीं है कि उसका कितना शोषण हो रहा है।  वह कष्ट सहता है और अवसर मिलने पर अवैध कमाई करके समाज से बदला लेता रहता है।  इसे कौन सुधारेगा। इसी प्रकार कार्यालयों में काम का बोझ बढ़ता जा रहा है और कर्मचारियों - अधिकारीयों की संख्या निरंतर घटती जा रही है जिससे कार्यरत कर्मचारी बहुत दबाव में रहते हैं।  सरकार नियुक्तियां इसलिए नहीं करती कि उसके मंत्रियों को भ्रष्टाचार करने के लिए धन कम पड़  जायेगा।  ऐसी स्थिति को  कौन सुधारेगा ? अतः ऐसी लोकशक्ति होनी चाहिए जो स्वतः सबको देखती रहे और यथा सम्भव उनमें सुधार करते रहें।  यदि लोगों को यह विशवास हो जाए कि उनकी शारीरिक, आर्थिक या अन्य समस्या आने पर समाज उसके साथ है तो भ्रष्टाचार , संपत्ति जमा करने का लोभ  लूटमार, आंदोलन सब समाप्त हो जायेंगे।  आंदोलन विदेशी सरकार के विरुद्ध तो समझ आते थे परन्तु अपनी सरकार  के विरुद्ध भी आंदोलन हों,  काम में बाधाएँ  डाली जांय, कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता।  यह इसलिए हो रहा है कि बिना शक्ति के कोई बात सुनने तक के लिए तैयार नहीं  होता है।  लोक शक्ति का निर्माण युवा विद्यार्थी शक्ति से होगा और उसी से लोकतंत्र वास्तविक अर्थों में साकार होगा (३)।  सब शोषण रहित और समान होंगे तथा असामाजिक तत्वों के स्थान पर परहित करने वाले मनुष्यों  का साम्राज्य होगा। 
 
           
       

लोकतंत्र में कानून


                               
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        लोकतंत्र में कानून 
   राज्य की उत्पत्ति का पहला सिद्धांत प्रजा द्वारा राजा से क़ानून और न्याय व्यवस्था बनाए रखने का अनुरोध करना  ही कहा जाता है। इसलिए यदि न्याय व्यवस्था ठीक नहीं  है तो राज्य की आवश्यकता पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है। प्राचीन भारतीय राजनीतिक दार्शनिक राजा और प्राजा दोनों को 'दण्ड' के अंतर्गत मानते थे।  भारत में निरंकुश राजा के परिकल्पना नहीं की गई है।  राजा अर्थात जो प्रजा का पुत्रवत पालन करे।  आततायी राजाओं को हटाने या मर देने तक का विचार हमारे मनीषियों ने दिया हाई।  प्रजा पर अत्याचार करने वाला कंस चंद्रवंशी क्षत्रिय था परन्तु उसे राक्षसों, दैत्यों जैसा ही माना गया है। तत्समय के एक आम युवक कृष्णा द्वारा उसका और उसके अत्याचारों का अत कर दिया गया था। अत्याचारी राजा वें को ऋषियों ने मार दिया था और प्रजापालक पृथु को राजा बनाया था।  न्याय का प्रथम सोपान सत्ता की सबके प्रति समान दृष्टि का होना है।  जो राजा इसमें विफल रहता है उसका शासन शीघ्र समाप्त हो जाता है। 
      भारत सारकार ने लोकपाल बिल पास किया है।  लोकपाल में सबसे प्रमुख व्यवस्था यह है कि उसमें ९ सदस्य होंगे जिनमें से एक-एक सदस्य अनुसूचित जाति  अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक वर्ग और महिला में से होंगे।  बहुसंख्यक वर्ग का सदस्य होना कोई अनिवार्यता नहीं है। ऐसा इसलिए किया गया है कि देश के बहुसंख्यक अर्थात हिन्दू लोग विश्वसनीय नहीं हैं, अन्य लोगों पर अत्याचार करते रहते हैं। लोकपाल बिल से यह प्रगट होता है कि भ्रष्टाचार भी सांप्रदायिक होता है और उसे सेकुलर किया जाना चाहिए।  देश की इस सेकुलर कांग्रेस ने सांप्रदायिक हिंसा निरोधक बिल में तो यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि यदि  देश के बहुसंख्यक हिन्दू महान अत्याचारी हैं और वे बेचारे निरीह अल्पसंख्यकों पर सदा अत्याचार करते रहते हैं जैसे १९८४ में कांग्रेस की प्रेरणा से सिखों का कत्लेआम किया गया था। उस बिल के अनुसार यदि किसी अल्पसंख्यक ने बहुसंख्यक अर्थात हिंदू पर माँरने-पीटने या बलात्कार का आरोप लगा दिया तो उस हिन्दू को सज़ा दी जायगी परन्तु कोई हिन्दू अल्पसंख्यक पर याह आरोप नहीं लगा सकता क्योंकि अल्पसंख्यक होने के नाते  व्ह कोई अपराध कर ही नहीं सकता है। यह  न्याय व्यवस्था पर सीधा प्रहार है जो पहले ही कह रही है कि कानून के सामनें सब सामान नहीं हैं। इतिहास में ऐसी व्यवस्थाएँ  कट्टर तानाशाहों और कट्टर धर्म पर आधारित सरकारों और शासकों की रही हैं।प्राचीन भारत में ऐसी न्याय व्यवस्था कुछ राक्षसों ( रावण )और दैत्यों ( हिरण्यकश्यप )  में प्रचलित थीं। 
        भारत में संसद और विधान सभाओं में तो होहल्ला होता है जिसमें जितनी उद्दंडता की जाए  उतनी अच्छी मानी जाती है।  किसे बिल के पक्ष या विपक्ष में वोट  देने का अधिकार केवल पार्टी प्रमुख का होता है , शेष सदस्यों को उसके तानाशाही पूर्ण आदेश के अनुसार अपना मत देना या नहीं देना होता है।  अतः कोई जनप्रतिनिधि उसमें अपने दिमाग खपाए भी तो किसके लिए।  इसलिए भारत में क़ानून लिपिक स्तर के लोग बनाते हैं और व्यवस्थापिका उसे पास कर देती है। परिणाम स्वरूप विभिन्न मुद्दों पर देश में भिन्न-भिन्न क़ानून बना दिया गए हैं जिनमे देश की सारी  न्यायव्यवस्था उलझ गई है। कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश जज किस- किस क़ानून को पढ़ें और समझें।  अतः वे निर्णय के स्थान पर तारीखें देकर अपनी नौकरी कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप देश में तीन करोड़ से अधिक वाद लंबित हैं। क़ानून के इस जंगल में भ्रष्टाचारी, अत्याचारी, बेईमान, ठग, चोर, लुटेरे, डाकू, डॉन और आतंकवादी आदि  बड़ी शान-बान से रहते हैं। महिला उत्पीड़न के विरुद्ध कठोर बनते हैं और रेप की जघन्य घटनाएं इत्मीनान से होती रहती हैं, रैगिंग के विरुद्ध कठोरता की बात होती है और उससे बेफिक्र रैगिंग चलती रहती है।भ्रष्टाचार रोकने की बात की जाती है और भ्रष्टाचार रॉकेट के वेग से आकाश के उस पार उड़ जाना चाहता है।  मंहगाई सूर्य को भी बढ़ने के लिए आतुर दिखती है।    
    चूंकि  भारत में कानून की दृष्टि में सब बराबर नहीं हैं , इसलिए देश के कानूनों  का उद्देश्य विपक्ष को दण्डित करना होता है।  जैसे यदि महिला ने शिकायत की तो पुरुष को दण्डित करना है, बहू ने शिकायत की तो पुरुषों के अलावा उसकी सास, नन्द, भाभी, भतीजी , भांजी  और जिसे वह  कहे, कठोर दंड देना है। प्रेमिका ने शिकायत कर दी तो खैर नहीं है।  अनुसूचित वर्ग ने किसी सवर्ण के विरुद्ध शिकायत कर दी तो सवर्ण को बिना पूछे दंड देना ही है । आश्चर्य की बात है इसे विश्व के लोग भी लोकतंत्र कहते हैं।  अमेरिका में क़ानून जाति , धर्म, वर्ग, लिंग, सामाजिक प्रतिष्ठा आदि में भेद नहीं करता। इसलिए वहाँ अपराधी बच नहीं पाते और अधिकांश प्रकरणों में वे स्वयं अपनी गलती मान लेते हैं। वहाँ क़ानून सीमित और स्पष्ट हैं। इसलिए विकृत बुद्धि और विशेष परिस्थितियों को छोड़कर लोग स्वेच्छा से उनका पालन करते हैं।  
     लोकतंत्र में कानून का प्रथम प्रयास होगा कि लोग अपराध करें ही नहीं।  सामाजिक दबाव के सिद्धांत और लोक शक्ति के विस्तार से इसे व्यवहारिक रूप दिया जा जायेगा।  कानून का दूसरा कार्य है लोगों में पश्चाताप उत्पन्न करना।  अतः अचानक होने वाले अपराधों, जो परिस्थिति वश या अज्ञानता के कारण  हुए हों, में इस प्रकार के दण्ड दिए जांयगे जिनमें समाज सेवा का उद्देश्य निहित हो। आदतन अपराधियों , योजना बद्ध ढंग से अपराध करने वालों और जघन्य अपराधियों को कठोर सजाएं दी जांयगी।  सजा की परिमाण सबके लिए सामान न होकर अपराधी के पद और उसकी व्यापकता के आधार पर दिए जांयगे। सामन्य व्यक्ति , आदतन अपराधी , अधिकारी, पुलिस, प्रशासक, मंत्री, जज आदि को उत्तरोत्तर कठोर दण्ड दिए जांयगे। प्राचीन भारतीय व्यवस्था में ऐसे ही विधान थे।  
        भारतीय कानून व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष है न्य़ायालयों का कार्यपालिका अर्थात मंत्री मंडल के आधीन होना। मंत्रिमंडल  के व्यवहारिक प्रमुख की इच्छानुसार ही क़ानून बनते हैं जिनके अनुसार जज निर्णय देते हैं।  सभी जज जानते हैं कि सारकार के निर्णय मंत्रियों के आदेश पर होते हैं।  परन्तु राज्य के विरुद्ध मुकदमों में वे सारा दोष सचिवों  या प्रमुख सचिवों का मानते हैं और दंड का भागी भी उन्हें ही बनाया जाता है।  और ऊससे भी अधिक विचित्र बात ब्याह है कि यदि जज किसी प्राश्निक अधिकारी को दंड देते हैं तो उसे जनता के टैक्स के धन से देना होता है , कुर्क होती है तो उनके कार्यालय की संपत्ति अर्थात जनता की संपत्ति होती है।  जो न्याय व्यवस्था जनता धन को अधिकारी का धन मानती हो , मंत्री का धन मानती हो, वह  स्वाभाविक रूप से  उन्हें ही अपना दाता भी मानती होगी क्योंकि वे ही अपने जनता धन से न्यायालयों को सारी सुविधाएं देते है, जजों को वेतन और निजी सुविधाएं देते हैं और अवकाश ग्रहण करने पर बड़े जजों को पुनः सम्मानजनक पद देते हैं।
  
   भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसमें सरकार के गठन और अधिकारों आदि के सन्दर्भ में कुछ भी नहीं लिखा है।  फिर ये नेता , ये मंत्री सवयम को सरकार कैसे कहने और समझने लगे।  न्यायालय स्वयं  सरकार का  हिस्सा हैं परन्तु जब वे भी उन्हें सरकार कहने और मानने लगे तो उनमे तानाशाही आना और मनमानी करना स्वाभाविक है क्योंकि सरकार का अर्थ ही है जो सम्प्रभु है और जो चाहे, जैसे चाहे कर सकती है। इस परिभाषा और व्यवहार से मंत्रियों के कोई भी कार्य न तो भ्रष्टाचार कहे जाने चाहिए और न ही उन पर ऊँगली उठाई जानी चाहिए।  अपने इन्हें अधिकारों का सदुपयोग करके प्रधान मंत्री इंदिरागांधी ने भ्रष्टाचारी सिद्ध होने पर आपात काल लगा दिया था और एकछत्र तानाशाह बन गई थीं और चाटुकारों ने हिटलर- मुसोलिनी की धुन पर इंदिरा इस इण्डिया और इण्डिया इस इंदिरा का स्तुतिगान प्रारम्भ कर दिया था।  न्यायालयों ने भी उन्हें सरकार मानने के कारन सही माना और उनकी इच्छानुसार न्याय किया।  पदों का दुरूपयोग रोकना यदि न्यायलय अपना दायित्व नहीं समझते तो प्रशासक और नेता अपनी मनमानी करने के लिए स्वतन्त्र हैं। संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर कब्ज़ा करने के बाद संविधान की धज्जियाँ उड़ाना अपना अधिकार समझने वाले शासक क़ानून से ऊपर होने के कारण आज देश संविधान के उद्देश्य -- देश में एकता और भ्रातृत्व भाव विकसित करना तथा व्यक्ति की गरिमा को स्थापित करना कहीं अंतरिक्ष में विलीन हो गए हैं। आज देश में व्यक्ति क्या  किसी पद की प्रतिष्ठा और गरिमा नहीं बची है जिसे लोग आदर की दृष्टि से देख सकें।    
       लोकतंत्र में न्यायालय सरकार का सबस प्रमुख हिस्सा होते हैं।  देश की सामाजिक,  राजनीतिक,  आर्थिक, शैक्षणिक आदि सभी व्यवस्थाओं को सतत रूप से प्रगति के पथ पर ले जाने  वाली न्याय प्रणाली को सुनिश्चित करना न्याय व्यवस्था का दायित्व है।  व्यवस्थापिका को कानून बनाने का अधिकार है परन्तु  अस्पष्ट, भेदभावपूर्ण और अनैतिकता को प्रभावित करने वाले कानून बनाने से रोकना न्यायालयों का कार्य है।  प्रशसनिक अधिकारीयों का दायित्व कानून के अनुसार कार्य  व्यवस्था को बनाए रखना है। छोटे अपराधों का त्वरित निर्णय करने का अधिकार उन्हीं का है परन्तु बड़े अपराधों एवं घपलों पर कार्यवाही का सारा दायित्व न्यायपालिका का ही है।  इसलिए राज्य एवं केंद्रीय स्तर पर सभी जाँच एजेंसियां जैसे एस टी एफ़ और सी बी आई तथा उन्हें सहयोग देने के लिए विशेष सुरक्षा बल न्यायालयों के अंतर्गत आने चाहिए। 
   कर विभाग के अधिकारी अपनी कार्यवाही करते रहेंगे परन्तु न्यायालयों को भी अधिकार होगा कि वे जानकारी मिलने पर छापे डलवाएं और कार्यवाही करें।  इससे कर चोरी की सेटिंग का स्तर न्यून हो जायगा।
     प्रशासनिक  स्तर पर प्रशासन एवं  न्याय अधिकारी पृथक हों तथा न्यायालयीन व्यवस्था में भी सतर्कता और न्याय अधिकारी या जज पृथक हों।  देश में जाँच के लिए बनाये गए जाँच आयोग सीधे न्यायलय के आधीन होंगे तथा न्यायाधीश उन पर सीधे कार्यवाही करेंगे किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।  कैग जैसी संस्थाएं अपने  प्रतिवेदन उच्च या उच्चतम न्यायलय में भी देंगी और उस पर स्पष्टीकरण मांगने तथा कार्यवाही का पूरा अधिकार भी न्यायालय को होगा। लोकपाल और लोकायुक्त जांच के पश्चात् अपना प्रतिवेदन किसी मंत्रिमंडल को नहीं देंगे, जांच उन्होंने की है , दंड भी वे ही देंगे अथवा सीधे न्यायालय को देंगे क्योंकि यदि किसी वरिष्ठ जज द्वारा की गई जाँच भी अविश्वसनीय है तो ऐसी न्यायव्यवस्था का अर्थ क्या है ? साथ ही उनकी जाँच स्वीकार करने या अस्वीकार करने का अधिकार मंत्रिमंडल के पास होने का अभिप्राय यही है कि न्याय व्यवस्था नेताओं- अधिकारीयों के आधीन है और न्यायलय अपने सामंतों की इच्छा का आदर करने के लिए बाध्य हैं।  लोकतंत्र में यह नहीं हो सकता। 
   लोकतान्त्रिक न्यायालयों द्वारा दिए गए  दण्ड के विरुद्ध यदि राज्यपाल या राष्ट्रपति के समक्ष दया की अपील की जाती है तो उसे गृह विभाग के अफसरों और मंत्रियों से पूछने का क्या अर्थ यह नहीं है कि न्यायलय ने उचित दण्ड नहीं दिया है जिस का अंतिम निर्णय उनसे अधिक योग्य और विशेषज्ञ अफसर-मंत्री करेंगे।  ऐसे सभी प्रकरणों पर सामान स्तर  के वर्त्तमान या अवकाश प्राप्त जज से उन्हें स्थिति को समझना चाहिए और उचित निर्णय देना चाहिए।  लोकतंत्र चाहिए तो शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का पालन करना होगा और सक्षम न्यायव्यवस्था स्थापित करनी होगी। 
 
      
                                  

लोकतान्त्रिक अर्थ शास्त्र

                
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                                       लोकतान्त्रिक अर्थ शास्त्र 
    लोकतान्त्रिक अर्थ शास्त्र को समझने के पूर्व पहले भारत के वर्त्तमान अर्थशास्त्र जो तृष्णा का ऋणात्मक अर्थ शास्त्र है (१), को समझना होगा।  तृष्णा के धनात्मक अर्थशास्त्र में उत्पादन बढ़ता है , नवीन खोजें होती हैं , आय बढ़ती है जबकि ऋणात्मक अर्थशास्त्र में प्रत्यक्ष रूप से समृद्धि में वृद्धि दिखाई देती है परन्तु धीरे- धीरे उससे अर्थव्यवस्था  नष्ट होती जाती है।  इतिहास में मीरजाफर ने  इसका बहुत अच्छा   उदाहरण प्रस्तुत किया है।  मीरजाफर बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला का सेनापति था।  अंग्रेजों  की मदद से उसने नवाब को मार दिया और बंगाल का नवाब  बन गया।  उसका प्रभाव और प्रतिष्ठा बढ़  गई।  लेकिन अंग्रेजो की कुटिल चालों से १०  वर्ष मे ही बंगाल पर अंग्रेजों का राज्य हो गया और उसका पूरा परिवार ही नष्ट हो गया।  उसकी नवाब बनने की तृष्णा ने बंगाल पर ही अंग्रेजो का राज्य नहीं स्थापित किया , उन्हें वह  मार्ग दिखा  दिया जिस पर चलकार उन्होंने सारे भारत पर राज्य स्थापित कर लिया तथा  देसी राजाओं से आधीनता स्वीकार करवा ली। 
      भारत में वर्त्तमान में लोगों के लिए धन आवश्यकता पूर्ति  का साधन  न बनकर स्वयं साध्य  बनता जा रहा है। इसलिए अफसर और मंत्री हजारो करोड़ के घपले करके  डकार भी नहीं लेते हैं, सीधे उदरस्थ कर जाते हैं।  सर्वहारा वर्ग का राग अलापने वाले साम्यवादियों के एक राज्य के एक मंत्री ने गद्दे  में २२ लाख रूपये भरवाए और उस पर सोने की तृष्णा पूरी की। वे पूँजीपतियों को क्या दोष देंगे ? भारत सरकार के मंत्रियों ने तो भ्रष्टाचार और गबन के सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं और तोड़ते जा रहे हैं।सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपने रंग में देशवासियों को भी रंग लिया है और चारों और लूट-खसोट ही दिख रही है।  २००८ में कांग्रेस पार्टी ने चुनाव जीतने के लिए किसानों के ७१ हज़ार करोड़ रूपये के ऋण माफ़ कर दिए।  देश में इतनी बड़ी राशि लोगों को अचानक प्राप्त हो गई।  बाज़ार गुलज़ार हो गए , बड़ी कंपनियों ने जम  कर लाभ कमाया। प्रत्यक्ष में समृद्धि हुई। उसके बाद जो मंहगाई बढ़ने लगी उसने सभी को  त्रस्त  कर दिया।  २००८ से २०१३ तक ५ वर्ष अर्थात  ६० माह में  इस बाज़ार ने कितना धन झटक लिया है ? पिछले ५ वर्षों में  मंहगाई के कारण  प्रति परिवार औसत रूपये २ हजार  प्रति माह से अधिक व्यय बढ़ा ही  है।  यदि  प्रति परिवार औसत ४ सदस्य माने जाएँ  तो १२० करोड़ आबादी में औसत ३० करोड़ परिवार होंगे।  इनके द्वारा मंहगाई के कुंड में पिछले ५ वर्षों में कम से कम ३० करोड़*६० माह*२ हजार = ३६ लाख करोड़ रुपये अन्य  व्यय के अतिरिक्त भस्म हो गए।  यदि ७१ हजार करोड़ रूपये देश में भंडार गृह बनाने में व्यय किये गए होते तो प्रति वर्ष देश में जो हजारों करोड़ रूपये का अनाज और फल-सब्जियां बर्बाद होते है न होते।  किसानों को आय भी अधिक होती और मंहगाई न बढ़ती।  कांग्रेस ने तात्कालिक लाभ के लिए जनता का धन लुटा कर जो चाल चली, पिछले चुनाव में वे भले ही जीत गए हों , २०१३ में  राज्यों के  चुनावों में वही उनकी अपनी प्रिय मंहगाई हार का कारण बन गई और २०१४ के राष्ट्रीय  चुनाव में  उनकी हार की पूरी सम्भावना  बनी हुई है।  इस प्रकार बिना किसी अध्ययन- सर्वेक्षण  के ऋण मुक्त करने का प्रभाव यह हुआ है कि किसानॉ ने  बैंकों से ऋण  लेकर वापस करने का काम ही बंद कर दिया। जिससे अनेक क्षेत्रीय बैंक बंद होने की कगार पर पहुँच गए हैं ।  
        देश में अन्य लोगों में भी यही प्रवृत्ति  इन नेताओं ने भर दी हैं।  वेतन पूरा लेना और काम न करना सरकारी कर्मचारी, अधिकारी, मंत्री   अपना जन्मजात  अधिकार उसी प्रकार  मानते हैं जैसे १७८९ की फ़्रांस क्रांति के पूर्व वहाँ के सामंत मानते थे। डा मनमोहन सिंह का यह कैसा अर्थशास्त्र  है, वित्त मंत्री चिदंबरम की यह कैसी वित्त नीति है और मोंटेक सिंह अहलुवालिया की यह कैसी योजना है , यह समझ से परे है।   
       मार्क्स का अर्थशास्त्र  कहता है कि पूंजीपति अपने धन के दम पर  श्रमिकों का शोषण करके लाभ कमाते जाते हैं। इसलिए साम्यवादी देशों में श्रम का बड़ा महत्त्व रहा है।  वहाँ सबको भोजन का अधिकार है परन्तु उन्हें राज्य द्वारा दिया गया कार्य पूरे पारिश्रम से करना होता है।  मुफ्त में खिलाना उनके सिद्धांत के विरुद्ध है। महात्मा गांधी भी श्रम के उपासक थे।  वे स्व्यं श्रम करते थे और सबसे अपेक्षा करते थे कि वे भी श्रम करें।  एक बार वे अपने सचिव आचार्य जे बी कृपलानी के साथ बिहार गए जहां तांगे से यात्रा की।  बाद में उन्होंने कृपलानी जी से हिसाब माँगा।  कृपलानी जी ने बताया कि तांगे वाले को पौने सात रूपये देने थे परन्तु वे १० रूपये का नोट देकर शेष राशि लेना भूल गए।  गांधी जी ने इस पर अप्रसन्नता व्यक्त की और उन्हें जनता धन  बर्बाद करने के लिए एक दिन का उपवास रख कर उसकी क्षतिपूर्ति करनी पड़ी। नोआखाली के दंगा पीड़ितों की सहायता के लिए गांधी जी के पूर्व वहाँ  सुचेता कृपलानी गई थीं।  उन्होंने पीड़ितों के लिए राहत कैम्प खुलवाए।  गांधी जी ने वहाँ पहुँच कर सारी  व्यवस्था देखी। उन्होंने सुचेता जी से पूछा कि कैम्प में रहने वाले लोगों को जो भोजन एवं सुविधाएं दी जा रही है , उसके बदले वे क्या काम कर रहे हैं।  सुचेता जी ने उन्हें कैम्प में उनके द्वार किये गए  कामों की जानकारी दी , तब गांधी जी संतुष्ट हुए। गांधीजी मानते थे कि व्यक्ति  में जब तक आत्म गौरव है , तभी तक वह मनुष्य है।  यदि मुफ्त का खाकर उसकी आत्म शक्ति समाप्त हो गई तो वह   क्या कर सकेगा। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का जन्म गरीबी में हुआ था। डा हेडगेवार अति सामान्य परिवार से थे परन्तु उनमें आत्म बल बहुत अधिक था।  उन्होंने जिन्हें पूर्ण कालिक प्रचारक बनाया , उन्हें सारे व्यय की व्यवस्था जन सहयोग से स्वयं करनी पड़ती  थी।  उसके प्रशिक्षण शिविरों में जो लोग तब आते थे और आज आते हैं, उन्हें आने-जाने और भोजन के व्यय स्वयं वहन करने पड़ते हैं।  उसका सीधा सिद्धांत है जो अपने भोजन की व्यवस्था भी स्वयं नहीं कर सकता वह समाज और देश के लिए क्या सोचेगा, क्या करेगा ? परन्तु आज देश में मार्क्स के अनुयायी कम्युनिस्ट हों , गांधी जी के नाम की माला जपने वाले कांग्रेसी हों , संघ के स्वयं सेवक भाजपाई हों या अन्य कोई हों , बिना हिचक  जनता धन को निज हित में लुटाने में लगे हैं , बिना श्रम और अध्ययन के डिग्रियां बेच और बाँट रहे हैं और लोगों को बिना काम के धन और वस्तुएं बांटने की  प्रतियोगिता कर रहे हैं। क्या ये राजनीतिज्ञ स्वयं  को उन महान विचारकों से  अधिक योग्य और बुद्धिमान नहीं समझ रहे हैं ?क्योंकि वे धनहीन थे और ये धन कुबेर बन गए हैं।   इससे देश , समाज और लोग कहाँ जायेंगे ?
    राजा हो या पूँजी पति या फिर गरीब व्यक्ति , वह किसी भी धर्म या जाति का हो , सदैव यही प्रयास करता है कि उसके बच्चे आत्म निर्भर बनें , अपना हित- अहित समझें। कांग्रेस की  इस से विपरीत मानसिकता  के कारण १९४७ में नेहरू ने गरीबी हटाओ का सपना देखा था,  १९७१ में इंदिरा गांधी गरीबी हटा रही थीं और ४२ वर्ष बाद अब उनके पौत्र राहुल गांधी भी वही गरीबी  हटा रहे हैं जबकि गरीबों की सख्या, कुपोषितों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है।  ये कुटिल राजनीतिज्ञ  सोचते हैं कि यदि लोग आत्म निर्भर और समझदार हो जायेंगे तो उनकी राजनीति  की दुकान बंद हो जायगी  फिर वे किसके राजा और किसके राजकुमार कहलायेंगे ! अमेरिका में उद्यानों और समुद्र तटों पर स्पष्ट निर्देश रहते हैं कि लोग पशु-पक्षियों को खाने का कोई सामान न दें।  प्रकृति ने उन्हें अपना भोजन ढूंढने के लिए सक्षम बनाया है।  यदि वे लोगों पर आश्रित हो जायेंगे तो जिस दिन उद्यान बंद होगा , वे भूखे ही रह जायेंगे क्योंकि लोगों पर आश्रित होने के कारण वे स्वयं भोजन ढूंढना या शिकार पकड़ना भूल चुके  होंगे।  वे अपने पशु-पक्षियों को भी आत्मनिर्भर रखना चाहते हैं और हमारे देश में ऋण लेकर सरकारें लोगों में बाँट रही हैं ताकि वे जिंदगी भर निकम्मे रहे और और उन्हें अपना दाता समझ कर पूजते रहें।                 लोकतंत्र में गांधीजी की अर्थ व्यवस्था अपनाई जानी  चाहिए जिसे उनके अनुयाई नेहरू ने ही अस्वीकार कर दिया था। वर्त्तमान नेता गांधीजी के अर्थ शास्त्र के नाम से ही भयभीत हो जाते हैं। उन्हें भय लगता है तो वर्त्तमान में हजारों करोड़ रूपये भ्रष्टाचार से कमाने के अवसर ही शून्य नहीं होंगे , उन्हें गांधी जी की भांति लंगोटी में आना पड़  सकता है। गांधी जी का मौलिक सिद्धांत था कि ग्रामों में ही रोजगार उपजलब्ध करवाए  जाँय। जो वस्तु  जहाँ उत्पन्न होती है , उससे  सम्बंधित उद्योग वहीं लगने  चाहिए। देश की जनता की कमाई दिल्ली जैसे महानगरों में झोंकने और उसे चमकाने पर  राष्ट्रकवि दिनकर  ने अपनी कविता समर शेष है में कहा है (१९५४):
''सकल देश में हलाहल(१) है , दिल्ली में हाला  है,दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अंधियाला है। 
……… अटका कहाँ स्वराज ?बोल दिल्ली ! तू क्या कहती है ?तू रानी बन गई, वेदना जनता क्यों सहती है ?'' (१) तीव्र विष। 
  आज महा नगरों में अनेक लोग नारकीय जीवन बिता रहे हैं।  वे वहाँ मजदूरी करने आते हैं क्योंकि उनके गाँव और नगरों में रोजगार नहीं हैं।  गांधी जी ने यह कभी नहीं कहा कि उद्योग न लगें।  वे चाहते थे कि पहले लोगों को पेट भरने और दैनिक आवश्यकताओं की  पूर्ती के अवसर मिलें फिर अन्य काम भी किये जांय। यदि ऐसा होता तो देश के सभी हिस्सों में खुशहाली का बंटवारा होता , सिर्फ महानगरों में ही चांदनी नहीं बिखरती।  मुट्ठी भर पूंजी पतियों की हजारों करोड़ की कमाई को देश की  कमाई तो माना जायगा परन्तु उस आधार पर प्रति व्यक्ति औसत आय में वृद्धि दिखाना, देश की जनता के साथ धोखा है, क्रूर मजाक है।                
   देश में नवयुवकों की संख्या अधिक है  परन्तु उनका उपयोग क्या है  ? बी ई, एम बी ए उत्तीर्ण छात्र यदि बेरोजगारी के कारण चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हों और  देश के नेताओं,  अर्थशास्त्रियों को डा मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधार दिख रहे हों और कहा जा रह हो कि सुधार और तेज किये जांय , सरकार  कहे कि कठोर कदम उठाने होंगे , तो इस पूंजीवादी अर्थशास्त्र को भट्टी में झोंक देना चाहिए।  सरकार निकम्मी है और नए रोजगार नहीं उत्पन्न कर पा  रही है, एक सीमा तक स्वीकार किया जा सकता है। परन्तु देश में चलते हुए रोजगारों को नष्ट करने के लिए विदेशियों को आमंत्रित करना, उन्हें करों में भारी छूट  देना तो क्षम्य नहीं है। इसने  चीन के  उत्पादों को सस्ता बिकवाकर पहले अनेक स्वदेशी उद्योग नष्ट करवाए।  अब उन्हें मनमाने दाम पर बेचने की छूट दे दी गई है।  चीन के सामान देश  में धड़ल्ले से बिक रहे हैं और जितने दाम उनपर लिखे होते हैं उनसे दुगुने - तिगुने दाम पर बिक रहे है जिसकी कोई रसीद नहीं दी जाती , न कोई लिखा -पढ़ी होती है।  दूकानदार कहते हैं कि कर चोरी करने के लिए कंपनी से रेट कम लिख कर आता है , अतः लिखे मूल्य पर नहीं मिलेगा।  यह किसी एक शहर में नहीं पूरे देश में हो रहा है  क्योंकि भारत की यह विदेशियों की सरकार स्वयं यह सब करवा रही है।  क्या विदेशियों के साथ देश को लूटने का यह सहयोग यहाँ के सत्तारूढ़ नेता मुफ्त में दे रहे हैं ?यदि डा मनमोहन सिंह कहें , वित्त मंत्री कहें , योजना आयोग के उपाध्यक्ष कहें या फिर सोनिया गांधी - राहुल गांधी कहें कि वे बेचारे हैं , उन्हें तो इसका पता ही नहीं है , तो उन्हें देश की सत्ता संभालने का क्या हक़ है ? यदि वे कहें कि चीन बहुत शक्तिशाली है और वे उसे कुछ नहीं कह सकते, कुछ नहीं कर सकते तो भी उन्हें सत्ता में रहने का अधिकार नहीं है।  विदेशियों को कर मुक्त या बहुत कम कर तथा देशवासियों पर करों का बोझ लादने का काम ये उसी  प्रकार कर रहे हैं  जैसे गद्दार मीरजाफर ने अंग्रेजों के लिए किया था।  उस समय राजा -नवाबों के राज्य अंग्रेजों से नहीं बच सके , देश के लोग, देश के युवा जो इतिहास से कुछ भी सीखने के लिए तैयार नहीं हैं , लोकतंत्र को विदेशियों के चंगुल से कैसे बचा पाएंगे ? अतः लोकतंत्र के अर्थ शास्त्र को अच्छी प्रकार समझना होगा और जनता को समझाना होगा।                           
     आज के अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा संकट भ्रष्टाचार है।  लोग भ्रष्टाचार का अर्थ घूंस खाना समझते हैं और इसी लिए डा मनमोहन सिंह को ईमानदार कहते हैं।  परन्तु ऐसा नहीं है।  इससे जुड़े सभी शब्दों का अर्थ लोगों को समझना चाहिए। भ्रष्टाचार का अर्थ है स्वयं या मित्रों के लाभ के लिए करने योग्य कार्य को न करना  और न करने योग्य कार्य को करना। जैसे किसी कार्यालय में एक व्यक्ति कोई प्रमाण पत्र या अनुमति पत्र लेने जाता है , उसे बिना कारण  के या कोई बहाना बना कर न दिया जाय या अवैध निर्माण की अनुमति दे दी जाय। किसी को लाभ या हानि पहुँचाने के लिए नीतियां  बनाना, योजनाएं बनाना, सीवेज,जल-व्यवस्था, विद्युत् व्यवस्था , केबल डालना आदि की जान बूझ कर या अनजाने में गलत योजनाएं बनाना जिससे जनता -कर से प्राप्त पैसे की बरबादी हो। न्याय में अनावश्यक विलम्ब भी इसी श्रेणी में आएगा। इसी  के भाई -बंधु हैं , घूंस, गबन आदि। किसी कार्य के लिए निर्धरित शुल्क के अतिरिक्त निजी लाभ के लिए धन लेना , गलत योजनाएं बनाने  के लिए धन लेना घूंस है । गबन का अर्थ है कम लागत के शासकीय कार्य  को अधिक राशि के ठेके पर देना और कमीशन खाना , घटिया और सस्ती वस्तु को अधिक दाम पर खरीदना , घटिया काम करवाना, बिना काम किये शासन से धन प्राप्त कर लेना, शासकीय सम्पत्ति को कम मूल्य पर बेचना जैसे स्पेक्ट्रम, खदानें आदि । जिस प्रकार अपने ही घर का धन लूटने के लिए कुछ दुष्ट और मक्कार व्यक्ति अपने मित्रों के साथ मिल कर कोई अपहरण या लूट का षड्यंत्र करते है , गबन वैसा ही जनता -धन लूटने का षड्यंत्र है।   सड़क खोदकर कोई कार्य करने पर  यह नियम रहता है कि सड़क पूर्ववत करके दी जायगी परन्तु भारत में तो ऐसा नहीं होता है ।  सड़कों में गड्ढे छोड़ दिए जाते हैं और बिल पास हो जाते हैं।  यह चोरी है। शासकीय संपत्ति जैसे भूमि, खदान पर अनधिकृत ढंग से अधिकार कर लेना लूट है और जो अधिकारी उसे देख कर भी चुप रहता है वह  लूट में सहभागी है।  यदि उसने इस कार्य के लिए धन भी लिया है तो वह  गबन का भी अपराधी है।  मिलावट करना,  जल-विद्युत् वितरण कार्य में घटिया माल लगाना  शत्रु कार्य हैं क्योंकि इनसे जीवन खतरे में पड़  जाता है, दूसरे शब्दों में जनहत्या का प्रयास है । जो अधिकारी धन लेकर यह  करवाता है वह शत्रु कार्य के साथ घूंस भी ले रहा है। यदि कोई अधिकारी यह कहे कि उसे उक्त  अपराधों का पता ही नहीं चला तो वह  अक्षम है।  उसे सेवा में रहने का कोई अधिकार नहीं है और पूर्व में लिए गए वेतन की राशि भी उससे वापिस ली जानी चाहिए। नगर निगम द्वारा बिना कोई सेवा दिए कर वसूलना और पुलिस द्वारा ठेलेवालों, रिक्शा वालो, ऑटोवालों आदि से जबरन वसूली करना अड़ी  डालकर वसूली करना है। असामाजिक एवं  प्रतिबंधित कार्यों जैसे जुए खिलवाना, ड्रग बिकवाना ,स्मगलिंग करना, वेश्या वृत्ति करना -करवाना , शराब के अवैध अड्डे चलाना और उसमें सहयोग देना, चाहे  वह  धन लेकर हो या अनदेखी करके हो, विद्रोह का कार्य है क्योंकि इससे समाज बर्बादी की ओर चल पड़ता है। परीक्षा में बड़ी राशि लेकर प्रवेश देना या उत्तीर्ण करवाना डानगीरी है जिसका अर्थ है  शासकीय कानूनों  के द्वारा  कोई भी अपराध करना।  भ्रष्टाचार और उक्त अपराधों में सम्बन्धों को इस प्रकार समझना चाहिए कि ये सब भ्रष्टाचार के ऐ सी मॉल में  घूंस, गबन आदि के विभिन्न डिपार्टमेंटल स्टोर हैं जो सारे देश को, जनता को अलग- अलग ढंग से लूट रहे हैं।  उक्त कार्यों की उपेक्षा करके कोई भी अर्थ नीति सफल नहीं हो सकती है।  १३८ = २५०० शब्द 
   आम आदमी  की अर्थव्यवस्था की बात करें तो यह देखा जा सकता है कि व्यक्ति अपने परिवार की आवश्यकताओं पर होने वाले व्यय और आय के  मध्य एक सम्बन्ध स्थापित करता है कि उसे महीने में किस मद में कितन व्यय  करना है, वह किसी अचानक आने वाले व्यय के लिए कुछ बचत भी करता है।  यदि घर में कोई अस्वस्थ हो जाय तो सर्व प्रथम उसके इलाज की व्यवस्था की जाती है , उस पर अतिरिक्त व्यय भी किया जाता है , कर्ज लेकर भी व्यय किया जाता है।  इसी प्रकार जुलाई में बच्चों की पढ़ाई और कापी-किताबों के लिए अतिरिक्त व्यय किया जाता है। यदि व्यवसाय करना हो या उच्च शिक्षा लेनी हो और धन न हो तो बैंक से ऋण भी लिया जाता है जिसे चुकाना होता है।  घर के लिए भी ऋण लिए जाते हैं  ताकि जीवन में अच्छा कारोबार कर सकें और सदैव  किराया न देना पड़े।  बैंक से लिए गए ऋण को चुकाना पड़ता है।  पुत्र भी माता-पिता की वृद्धावस्था में देख-भाल करते हैं। कर्ज के रूप में नहीं , दायित्व के रूप में।  ठीक ऐसी ही व्यवस्था देश  की भी होनी चाहिए। 
    यदि समाज के धन से एक व्यक्ति को विशेष सुविधाएं देकर पढ़ाया जाता है तो उसका भी यह दायित्व होना चाहिए कि वह  सक्षम होने पर समाज को अतिरिक्त सहयोग धन या अन्य सेवा के रूप में दे।यदि बिना किसी दायित्व के दान खाते में अनेक लोगों को दान करते जायेंगे तो देश को उसके लिए उद्योग लगाकर अतिरिक्त धन भी कमाना  होगा या नेता निजी उद्योग लगाकर उनके लिए धन की व्यवस्था करें।  छात्रवृत्तियां बढ़ाते जाना और दूसारी और शिक्षकों की लाखों पद खाली रखना, उन्हें भवन, फर्नीचर,  पुस्तकालय,  जल, शौचालय  आदि आवश्यक सुविधाओं से वंचित रखना, पीढ़ियों को अक्षम बनाने का  राष्ट्रीय अपराध है। 
     अमेरिका क्यों सबसे आगे है ? वह विश्व भर से बुद्धिमान व्यक्तियों को देश में आने के लिए प्रेरित करता है।  जितना धन बहरी व्यक्ति वहाँ जाकर कमाता है , उससे कई गुना अधिक वहाँ की राष्ट्रीय आय में योगदान देता है।भारत में बुद्धि पलायन पर कुछ लेख लखने से तो देश का कोई हित नहीं होने वाला है।  दूसरी ओर चीन ने प्रारम्भ में अपनी मानव-शक्ति का उपयोग करके अस्श्चर्य जनक प्रगति की है।  अतः देश में उपलब्ध धन, मानव-शक्ति एवं  बुद्धि का समुचित प्रयोग करके ही देश को आगे बढ़ाया जा सकता है।  भारत में धन और संसाधनों  की बंदरबांट तो हो रही है परन्तु  देश हित में उसका नियोजन करने की ओर कोई भी नहीं सोच रहा है। इसे शीघ्र क्रियान्वित करना होगा।  मूर्खों को शासन में नौकरी देकर और बुद्धिमानों को दूर भगाकर उन्नति की कल्पना से अधिक मूर्खता क्या हो सकती  है ? लोक निर्माण विभाग द्वारा किये गए निर्माण कार्यों को देखिए, लघु उद्योग निगम के माध्यम से क्रय किये गए सामानों की गुणवत्ता देखिए, सरकारी विद्यालयों के बच्चों का ज्ञान देखिये, सहकारी संस्थाएं देखिए, आप स्वयं कह उठेंगे कि इनमें पदस्थ अधिकारी, मंत्री कितने अक्षम, धूर्त और भ्रष्ट हैं। यदि निजी संसाधनों से संचार सेवाएं चलाने वाले अरबों रूपये का लाभ अर्जित कर रहे हैं और सरकारी भारत सेवा संचार निगम अरबों के घाटे में चल रहा है तो क्या इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता कि सरकार के बाहर रहकर कार्य करने वाला व्यक्ति समूची सरकार से बहुत योग्य है भले ही शक्ति धारण करने के कारण मंत्री और उच्च अधिकारी अपनी हेकड़ी में रहें। 
      देश में अर्थ व्यवस्था तो मिश्रित ही रखनी होगी। निजी उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए परन्तु इसका अर्थ यह कभी नहीं है कि शासकीय उपक्रमों को बेचते चले जांय।  यदि शासकीय उपक्रम घटे में चल रहे अहिं तो उसमें सुधर किये जेन चाहिए निकम्मों को बाहर निकाल कर योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति की जानी चाहिए।  भोजन, आवास, वस्त्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन जैसी आवश्यकताओं के मूल्य सरकार को नियंत्रित करने होंगे।देश को डा मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री और चिदम्बरम जैसे वित्त मंत्री नहीं चाहिए जो कहें कि मंहगाई शीघ्र कम करेंगे और निरंतर मंहगाई बढ़ाते जांय।  प्रदेशॉन में भी  सरकार में थोक के भाव भ्रष्टाचार करने के लिए अनेक सेवाओं का केन्द्रीयकरण कर दिया गया है। जैसे  विद्यालयों में छोटी कक्षाओं की परीक्षाओं के प्रश्नपत्र भी राज्य स्तर पर छपते हैं जबकि उसे विद्यालय स्तर पर होना चाहिए।  पहले भ्रष्टाचार करके अयोग्य शिक्षक नियुक्त करना , फिर स्तर बनाए रखने का बहाना बनाकर एक साथ पर्चे छपवाना लोक व्यवस्था के विपरीत है।  योग्य व्यक्ति रखें , उसे काम करने की स्वतंत्रता दें , अनेक व्यवस्थाएं स्वतः ठीक हो जाएँगी।  
       भ्रष्टाचार रोकने के लिए शासन में कोटेशन या टेंडर से सामान क्रय किये जाते है या विक्रय किये जाते हैं जिनमें अब तो लाखों करोड़ के भ्रष्टाचार होने लगे हैं।  उसके लिए यह बेहतर होगा कि प्राप्त होने वाले मूल्य को सार्वजनिक करने के बाद पुनः विज्ञप्ति दी जाय  और यदि कोई उससे भी अच्छा सामान कम मूल्य पर  देता है या शासकीय सामान अधिक मूल्य पर क्रय करता है तो उसे अवसर दिया जाना चाहिए।  इससे अनेक स्थानों पर अच्छा सामान मिलेगा, अच्छा काम होगा और भ्रष्टाचार कम होगा। 
  सरकार पूंजीपतियों को भी पर्याप्त सुविधाएं दे , सहयोग करे परन्तु ऐसे क़ानून न बनाए कि लोग स्वेच्छा से कोई कारोबार ही न कर सकें।  अमेरिका में न्यूनतम मजदूरी तय है।  वह  इतनी अधिक है कि लोग घरेलू नौकर रखने का साहस ही नहीं कर पाते।  यदि किसी के पास नौकरी नहीं है और वह  कोई कार्य करना चाहता  है तो उसे न्यूनतम स्तर बनाए रखना होता है जिसके कारण  वहाँ छोटी दूकान भी नहीं खोली जा सकती न ही किसी के घर काम मिल सकता है।  जबकि भारत में लाखों लोग छोटी- छोटी दुकाने करके, ठेले- खोमचे लगाकर या घरों में साफ़-सफाई का काम करके जीवन यापन कर सकते  हैं।  इसी प्रकार वहाँ आवागमन के लिए सस्ती सुविधा नहीं है , अतः अपनी कार रखनी पड़ती है , उसके खर्चे उठाने पड़ते हैं।  इसलिए मंदी के दौर में वहाँ अनेक लोग कंगाली और भुखमरी के मार्ग पर चल पड़े थे। भारत में भी खाद्य पदार्थों के लिए एक क़ानून बनाया गया है कि उसका उत्पादन एक निर्धारित स्तर के अनुसार होना चाहिए।  क़ानून लागू हो गया परन्तु अभी अनेक प्रदेशों ने उसे रोक रखा है।  अब ठेलों  पर चाट- पकौड़ी-चाय आदि बेचना अपराध हो गया है न ही बाजार में खुला सामान बेचा जा सकता है जबकि अनेक दुकानदार खुले सामन बेचकर जीविका चला रहे हैं  और कम सामान खरीद कर  दिहाड़ी मजदूर अपना पेट भर रहे हैं।  उस क़ानून का अर्थ है कि बड़े उद्योगपतियों द्वारा बनाए और पैक किये गए सामान को ही बेचा जा सकता है।  सरकार  को ऐसे क़ानून नहीं बनाए चाहिए जो अव्यवहारिक हों।  मिलावट रोकने और अच्छा सामान उपलब्ध कराने के लिए मिलावट खोरों को घूंस लेकर छोड़ना और उद्योगपतियों के लाभ के लिए और स्वयं उनसे धन लेने के लिए जन-विरोधी क़ानून बनाना सामंतवादी शोषण का सुधारवादी मुखौटा है , कठोर कदम है।  लोकतंत्र में ऐसे तत्वों का अस्तित्व बहुत हानिकारक है। लोकतान्त्रिक अर्थशास्त्र में सारे क़ानून लोक हित में और भवष्य को धान में रख कर बनाए जाने  चाहिए। 
 उद्योगों में अनावश्यक रूप से मशीनों का आधुनिकरण न हो , इसके लिए कर्मचारियों को भी सहयोगात्मक रवैया अपनाना  चाहिए। श्रम क़ानून ऐसे हों, उनमें ऐसे मध्यस्थ हों,  जिनसे कर्मचारियों का शोषण न हो और उद्योगपतियों में उद्योगो के प्रति उत्साह बना रहे। कम्युनिस्ट चीन  ने शासन सँभालने के बाद सभी आंदोलन प्रतिबंधित कर दिए और न्यूनतम मजदूरी पर लोगों से काम करवाया। व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण करने के बाद उसने देशी -विदेशी उद्योगपतियों को भी पर्याप्त सुविधाएं दीं जिससे आज वह प्रत्येक क्षेत्र में आगे ज रहा है और विश्व उसका लोहा मान रहा है।  उसके विपरीत यहाँ कम्युनिस्टों ने हड़तालें करवाकर अधिकांश उद्योग बंद करवा दिए।  यदि विश्व में  कम्पूटर-दूरसंचार क्रांति न हुई होती तो देश में कोई उद्योग ही न होते।  लोकतान्त्रिक  शासन को दूरगामी परिणामों को देख-समझ कर नीतियां  और कानून बनाने चाहिए। 

    
         
          



   

लोकतात्रिक शिक्षा


                  
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                                      लोकतात्रिक शिक्षा

                                         कुमार ब्रह्मदत्त
प्राचीन भारत में काशी में राजा ब्रम्ह्दत्त राज्य करते थे . उनका पुत्र था कुमार ब्रम्ह्दत्त . कुमार की प्रारंभिक शिक्षा काशी में हुई . वहां पर उच्च शिक्षा की सुविधा थी परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में तक्षशिला का नाम बहुत प्रसिद्द था . अतः राजा ने विचार किया कि कुमार को वहीँ भेजना चाहिए . उस समय कुमार की आयु १६ वर्ष थी . पिता ने उसे १००० मुद्राएँ देकर तक्षशिला भेज दिया . वहां पहुँच कर कुमार ने आवश्याक जानकारी प्राप्त की और गुरूजी के  मिलने का समय ज्ञात किया और उनके पास जा पहुंचा . आचार्य जी को देखकर उसने जूते उतारे , सामान को किनारे रखा और उनकी वंदना करके हाथ जोड़कर खड़ा हो गया .आचार्य जी ने देखा कि बालक थका हुआ है . उन्होंने उसके रुकने एवं भोजन की व्यवस्था करके विश्राम करने के लिए कहा . भोजन के बाद कुमार ने कुछ देर विश्राम किया फिर उनके सम्मुख उपस्थित हुआ और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया . आचार्य जी ने उससे पूछा तो उसने बताया कि वह काशी से आया है और उनसे विद्या ग्रहण करना चाहता है . उस समय गुरुकुल एवं विश्वविद्यालयों में एक व्यवस्था थी कि विद्यार्थी शुल्क दे और दूसरी थी विद्यार्थी वहीँ काम करे और पढ़े . कुछ निर्धन विद्यार्थी विद्याध्ययन पूर्ण करने के बाद में गुरु दक्षिणा अथवा वांछित शुल्क देने का वचन देकर भी पढ़ते थे . गुरु जी ने उससे पूछा कि क्या वह शुल्क लाया है . उसने कहा, ‘हाँ’ और हजार मुद्राओं की थैली उन्हें समर्पित कर दी . वह उनके साथ ही रह कर विद्याध्ययन करने लगा .                     
   एक दिन कुमार गुरु जी के साथ नदी स्नान के लिए जा रहा था .रास्ते में उसने देखा कि धुले हुए तिल सूख रहे हैं . उसे तिल बहुत अच्छे लगते थे . उसने एक मुट्ठी तिल उठाकर खा लिए . दूसरे दिन पुनः उसने एक मुट्ठी तिल खा लिए . एक वृद्धा ने तिल सुखाने के लिए धूप में रखे थे . उसने पहले दिन कुछ नहीं कहा पर दूसरे दिन उसे यह अच्छा नहीं लगा . जब तीसरे दिन भी उसने मुट्ठी भर तिल लिए और मुंह में डाले, वह बिफर उठी और जोर से चिल्लाने लगी . आचार्य जी साथ में थे . उन्होंने आश्चर्य से उसे देखा और चिल्लाने का कारण  पूछा . उसने कुमार द्वारा तीन दिन से तिल लेने की बात कही . आचार्य जी ने उससे कहा कि वह क्रोध न करे, दुखी न हो, उसे तिलों का मूल्य मिल जायगा . परन्तु वह महिला इससे संतुष्ट नहीं थी . उसने मूल्य लेने से इन्कार कर दिया और कुमार को आचरण सिखाने के लिए कहा . गुरु जी ने उसी के सामने अपने अन्य दो शिष्यों से कहा कि वह कुमार के दोनों हाथ पकड़ लें . फिर गुरूजी ने उसे पीठ पर तीन डंडे मारे  और उसे पुनः वैसा आचरण न करने का  उपदेश दिया . कुमार ब्रह्मदत्त ने पूरे अनुशासन का पालन करते हुए उनसे विद्या प्राप्त की और काशी लौट आया .
                  जीवक
  जीवक राजगृह ( मगध की राजधानी, वर्तमान राजगीर ) की एक गणिका का पुत्र था . उसके जन्म लेने पर उसे मरने के लिए कूड़े के ढेर पर फेंक दिया गया था . सौभाग्य से उस पर सम्राट बिम्बिसार के पुत्र कुमार अभय की दृष्टि पड़ गई .कुमार ने उसके जीवन की रक्षा की तथा अपनी देख रेख में उसके भरण – पोषण का प्रबंध कर दिया . राजगृह में शिक्षा पूर्ण करने के बाद कुमार ने उसे उच्च शिक्षा के लिए तक्षशिला भेज दिया . जीवक ने वहां पर एक विश्व प्रसिद्द आचार्य जी के के साथ रहकर सात वर्ष में चिकित्सा शास्त्र का सफलता पूर्वक अध्ययन किया . वैद्य का प्रमाणपत्र देने के पूर्व आचार्य जी ने उससे कहा, “तुम एक फावड़ा लेकर तक्षशिला में एक योजन ( लगभ १२ किमी ) की दूरी तक चारों ओर जाओ और तुम्हे कोई ऐसी वनस्पति मिले जिसका उपयोग चिकित्सा में न होता हो, उसे उखाड़ कर मेरे पास ले आओ .” आचार्य जी के आदेश पर वह दूर –दूर तक घूम आया परन्तु उसे एक भी ऐसा पौधा नहीं मिला जिसका उपयोग चिकित्सा शास्त्र में न होता हो . उसकी योग्यता से पूर्ण संतुष्ट होकर आचार्य ने उसे वैद्य की उपाधि प्रदान कर दी और स्वतन्त्र रूप से चिकित्सा करने की अनुमति दे दी . आचार्य ने उसे कुछ धन भी दे दिया ताकि वह तक्षशिला से राजगृह तक जा सके .
    साकेत पहुँचने तक जीवक का धन खर्च हो गया . उसे अभी बहुत दूर जाना था . अतः धन की आवश्यकता थी . वह वहीं  साकेत में रुक गया ताकि कुछ धन अर्जित कर ले . उसे ज्ञात हुआ कि एक सेठ की पत्नी बहुत दिनों से सिर के रोग से अस्वस्थ है और वैद्य उसे ठीक नहीं कर पा रहे हैं . जीवक ने उसका इलाज प्रारम्भ किया . उसने घी में कुछ जड़ी- बूटियाँ उबालीं और उसे महिला को नाक से पिला दिया . उसकी चिकित्सा से सेठ की पत्नी नीरोग हो गई . सेठ उससे बहुत प्रसन्न हुआ और उसका बहुत उपकार माना . उसने जीवक को १६००० मुद्राएँ दीं तथा एक रथ , घोड़े और दो सेवक भी दिए . जीवक ने राजगृह लौट कर उसे कुमार अभय को दे दिया क्योंकि उसीने उसका पालन-पोषण किया था और उसकी शिक्षा का प्रबंध किया था . उन दिनों सम्राट बिम्बिसार भगंदर रोग से ग्रस्त थे जो आज भी लाइलाज बीमारी मानी जाती है . जीवक ने उनकी चिकित्सा की और स्वस्थ कर दिया . उसने अनेक असाध्य रोगों को ठीक किया जिससे उसकी ख्याति बहुत दूर तक फ़ैल गई . वाराणसी के एक सेठ ने उसे अपने पुत्र की चिकित्सा के लिए बुलाया जिसकी आंतें उलझ गई थीं . जीवक ने शल्य चिकित्सा द्वारा उसका पेट चीर कर आंतें ठीक कीं और पुनः पेट सिल दिया और चिकित्सा के लिए दवाएं दीं जिससे वह ठीक हो गया . इस सेठ ने भी जीवक को १६००० मुद्राएँ दीं .उज्जैन का राजा उदयोत पीलिया ग्रस्त था . उसने सम्राट बिम्बिसार से अनुरोध किया कुछ दिनों के लिए वे जीवक को उज्जैन भेज दें .औषधियुक्त घी से जीवक ने उन्हें भी स्वस्थ कर दिया . राजा ने उसका बहुत सत्कार किया तथा उसे बहुत से उपहार एवं बहुमूल्य वस्तुएं देकर विदा किया . जीवक ने महात्मा बुद्ध को भी कब्ज रोग से मुक्त किया था . भारतीय चिकित्सा शास्त्र में जीवक का नाम आज लगभग २५०० वर्ष बाद भी बहुत श्रद्धा से लिया जाता है .     
   

लोकतंत्र की विशेषताएं

           
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                                लोकतंत्र की विशेषताएं 

   प्रजातंत्र में राजतंत्र जैसे अनेक दोष होने के बावजूद उसमें अनेक विशेषताएं  भी हैं जिससे यह राजतन्त्र की अपेक्षा बहुत अच्छी  व्यवस्था है।  इसमें ये विशेषताएं होती हैं :
१. जनता के व्यक्तित्व का निर्माण करने वाली शासन प्रणाली :
   फील्ड के अनुसार लोकतंत्र का अंतिम औचित्य इस बात में है कि यह नागरिकों के मन में कुछ विशेष प्रवृत्तियां उत्पन्न करता है। इसमें मन स्वतंत्रता पूर्वक विचार करता है ,व्यक्ति सार्वजानिक कार्यों के बारे में सोचता है , उनमें रूचि लेता है,परस्पर चर्चा करता है, उसमें दूसारों के प्रति सहिष्णुता उत्पन्न होती है तथा समाज के प्रति उत्तरदायित्व उत्पन्न होता है।कार्य करने के स्वतंत्रता के कारण यह व्यक्ति के चरित्र के अनेक गुणों का विकास करता है।    
२. नैतिक विकास में सहायक : अमेरिका के राष्ट्रपति लावेल ने कहा है शासन की उत्कृष्टता की कसौटी शासन व्यवस्था, आर्थिक समृद्धि या न्याय नहीं है ( सामान्य व्यक्ति इन्हें ही आधार मानता है )अपितु वः चरित्र है जजिसे यह अपने नागरिकों में उत्पन्न करता है। अंततोगत्वा व्ही शासन उत्कृष्ट है जो अपनी जनता में नैतिकता की सुदृढ़ भावना, ईमानदारी, उद्योग,आत्मनिर्भरताऔर साहस के गुण पैदा करता है।  वोट देने का अधिकार नागरिकों में विशेष गरिमा उत्पन्न करता है इससे उसमें गौरव और स्वाभिमान जागृत होता है। ( वोट के लिए बड़े से बड़े नेता को भी नागरिकों के सामने जाकर हाथ फ़ैलाने पड़ते हैंजो राजतंत्र में सम्भव नहीं है। ) 
 ३. लोक शिक्षण का सर्वोत्तम साधन :चुनाव के समय मीडिया द्वारा समस्याओं के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला जाता है जिससे  शासन की अनेक बातों का ज्ञान हो जाता है। कुछ चैने जन प्रतिनिधियों द्वारा विगत ५ वर्ष के कार्यकाल में किये गए कामों की जानकारी देते हैं तथा उनसे प्रश्न भी करते हैं , लोगों के विचार और शिकायतें भी उन्हें सुनवाते हैं। इससे जन सामान्य को भी बहुत जानकारी मिलती है तथा उसे यह ज्ञान हो जाता है कि जन प्रतिनिधियों को क्या-क्या काम करने थे , क्या किय़े और क्या नहीं किये।  इस प्रकार लोगों को कम समय एवं संक्षेप में शासन व्यवस्था की बातें समझ में आ जाती हैं। 
४. लोगों में देशभक्ति उत्पन्न करती है : राजतंत्र में लोगों को यह ज्ञात नहीं हो पता है कि राजा का धन कहाँ से आया और कहाँ व्यय हुआ।  वे राजा से कुछ पूछ ही नहीं सकते परन्तु लोकतंत्र में उन्हें अनेक जानकारियां मिलती रहती हैं उसे अपने अधिकार भी समझ में आते हैं वः भी सोचता है कि उसका देश-प्रदेश उन्नति करे।  इस प्रकार लोगों में स्वतः देश प्रेम उत्पन्न होने लगता है।  
५. सत्ता का दुरूपयोग रोकना : मंत्रियों पर संसद का दबाव रहता तथा विपक्षी दल भी सरकार की गलत नीतियों का विरोध करते रहते हैं।  मंत्रियों और जन प्रतिनिधियों को चुनाव के समय पुनः जनता से वोट मांगने जाना होता है इससे सरकार के कार्यों पर अंकुश रहता है। जो मंत्री मनमानी करते हैं जनता उन्हें अगले चुनाव में हरा देती है।  
६. जनता की इच्छा एवं विशेषज्ञता का सुन्दर समन्वय :हाकिंस ने कहा है कि प्रत्येक शासन में वास्तविक शासक विशेषज्ञ ही होते हैं।  बजट में धन कहाँ से आयगा और जाता की आवश्यकताओं के अनुरूप उसे किस प्रकार व्यय किया जाय यह सामान्य व्यक्ति नहीं बता सकता है , कवही बता सकता है जो अर्थ शास्त्र जान्ने के साथ बजट बानना भी जनता हो।  सड़कें बननी हैं तो कितना व्यय होगा और पहले कहाँ पर सड़क बनाना  उपयुक्त होगा यह कोई विशेषज्ञ ही बता सकता है परन्तु वे जनता की भावनाओं और कष्टों को नहीं समझते हैं।  दूसरी और जन प्रतिनिधि जनता की इच्छाओं और आवश्यकताओं को बताते हैं।  सामान्य रूप से उसी के अनुसार योजनाएं बनती हैं। इस प्रकार लोक इच्छाओं और  विशेषज्ञों के ज्ञान  के समन्वय से शासन चलता रहता है।   
७. लोक हित का शासन : इसमें लोगों की इच्छाओं को ध्यान में रख कर योजनाएं बनाई जाती हैं अतः इससे लोगों का हित स्वाभाविक रूप से होता रहता है।  
 ८. राज्य की शक्ति एवं व्यक्ति की स्वतंत्रता का अद्भुत समन्वय : राज्य सत्ता एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता राजशाही में एक दूसरे के विपरीत रहे हैं।  राजा सामंत केवल आदेश देना जानते थे किसी की बात सुनना  नहीं। सामान्य व्यक्ति उन्हें कोई सुझाव देने का विचार भी नहीं कर सकता था। आज लोग स्वतन्त्र रूप से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करते रहते हैं , नई-नई खोजें होती रहती हैं , नए-नए कार्य होते रहते हैं जो राजशाही में सोचे भी नहीं जा सकते थे।  शासन उन नए अविष्कारों का उपयोग अपनी कार्य क्षमता बढ़ाने में करते रहते हैं और विकास नए आयाम स्थापित करता जाता है।  पहले जहां लोग राजाओं के पास तक नहीं जा पते थे , आज मीडिया वाले मंत्रियों से न केवल  कुरेद-कुरेद कर प्रश्न पूछते है अपितु टीवी के चैनलों पर तो ऐंकर उन्हें  डांटते और उनका उपहास भी करते हैं और मंत्री जी स्वयं को धन्य मानते  हैं कि उन्हें टीवी पर बुलाया गया है।  
 ९. विकास के तीव्र गति : लोक तंत्र में शासन तंत्र  के अतिरिक्त अनेक लोग अलग-अलग क्षेत्रों में स्वतंत्रता पूर्वक कार्य करते रहते हैं। अतः नए- नए कार्य के क्षेत्र विकसित हो रहे हैं जिनसे लोग धनोपार्जन कर रहे हैं। विकास हो रहा है और उनका जीवन स्तर उठ रहा है। जहां पर तानाशाही है वे देश पिछड़े हुए हैं क्योंकि तनाशाह लोगों का व्यक्तित्व इतना नहीं उठने देते कि वे उनके सामने सर उठा कर चलें।  
१०. समझौते की भावना पर आधारित शासन : लोकतंत्र में कार्य परस्पर विचार-विमर्श से किये जाते हैं जो एक प्रकार से उन लोगों के मध्य  समझौते जैसा होता है।  इससे लोगों की गरिमा एवं प्रतिष्ठा बनी रहती है और उन्हें संतुष्टि मिलती है।  आज किसी मजदूर से भी उसकी इच्छा के विरुद्ध कार्य नहीं लिया जा सकता है।  वः भी कार्य के समझौते के अनुसार कार्य करता है।  
११. क्रांति की सम्भवना कम होना : क्रांति का मुख्य कारण  होता है सामान्य जनता का शासन से इतना त्रस्त  हो जाना कि उसे स्वयं मरने अथवा  शासक को मारने में से एक को चुनना हो तो वह  क्रांति में सम्मिलित हो जाता है। लोकतंत्र में लोगों के शासन से दुखी हो जाने पर वे अगले चुनाव में सरकार बदल देते हैं । अतः खूनी क्रांति की सम्भावना नहीं रहती है।  
   उक्त विशेषताएं एवं गुण लोकतंत्र के हैं।  प्रजातंत्र में उक्त गुणों से बहुत विचलन पाया जाता है।  यदि उनमे पर्याप्त सुधार कर लिए जाँय तो लोकतंत्र के सभी लाभ प्राप्त होंगे। 
















चुनाव सुधार :(२) सीमाएं

                                             चुनाव सुधार :(२) सीमाएं
चुने जाने वाले प्रतिनिधियों एवं चुने गए जन प्रतिनिधियों  के व्यवहार की कुछ सीमाएं भी निश्चित होनी चाहिए –
१.     स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक किसी भी व्यक्ति  के राजनीतिक जीवन की अधिकतम सीमा ४० वर्ष तक तथा चुनाव लड़ने की सीमा ७० वर्ष होनी चाहिए . इससे ७५ वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति राजनीति से अवकाश प्राप्त कर लेंगे और युवा पीढ़ी को  अवसर प्राप्त होंगे . वे सलाहकार हो सकते हैं .
२.     प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सदन का अध्यक्ष, महापौर एवं किसी एक सदन में मंत्री की अधिकतम अवधि १० वर्ष या दो चुनाव काल तक होनी चाहिए .
३.     किसी राजनीतिक दल में जिला, राज्य एवं राष्ट्र के स्तर पर अध्यक्ष, मंत्री एवं कोषाध्यक्ष के पद पर भी एक व्यक्ति का कार्य काल अधिकतम १० वर्ष होना चाहिए .
४.     हाई कमान नहीं , पार्टी के संविधान के अनुसार किसी भी व्यक्ति को अपने दल में विभिन्न पदों पर चुनाव लड़ने का अधिकार होना चाहिए . केवल जिला कार्यकारिणी सदस्यों तक वरिष्ठ नेताओं द्वारा मनोनयन भी हो सकता है .
५.     राजनीतिक दलों के आय-व्यय में पूर्ण पारदर्शिता होनी चाहिए . कितना चंदा किस स्रोत से प्राप्त किया और कहाँ पर कितना व्यय किया . यदि दल इसका लेखा-जोखा नहीं देते हैं तो यह मान लेना चाहिए कि वह धन या तो भ्रष्टाचार से अर्जित किया गया है , प्रतिबंधित व्यवसायों से आया है या हवाला द्वारा विदेशों से आया है . आयकर विभाग को उनके विरुद्ध कार्यवाही करनी चाहिए तथा ऐसे व्यय करने वाले नेताओं को चुनाव से बाहर किया जाना चाहिए .
६.     सभी राजनीतिक दलों को अपना घोषणापत्र चुनाव की घोषणा के ७ दिनों के अन्दर जारी कर देना चाहिए . विलम्ब करने वालों को पार्टी चुनाव चिन्ह नहीं देना चाहिए .
७.     मतदाताओं को लुभाने वाली घोषणाओं के साथ उन्हें सरकार की आय के स्रोत भी बताने होंगे . जनता धन लुटाकर वोट बटोरने की छूट नहीं दी जानी चाहिए . इससे विकास के लिए धन नहीं बाख पाता है .
८.     धर्मिक उन्माद एवं हिंसा फ़ैलाने वाले वक्तव्यों के लिए सज़ा के प्रावधान हों . वह उम्मीदवार हो तो उसे चुनाव से बाहर कर दिया जाय . ऐसे वक्तव्य मीडिया में प्रतिबंधित होने चाहिए . धर्म, जाति, वर्ग आदि के नाम पर या धन- वस्तुएं  बांटकर  वोट मांगने वालों को भी तत्काल जेल में बंद कर देना चाहिए तथा चुनाव से बाहर कर देना चाहिए .
९.     प्रधान मंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री आदि सभी पदाधिकारी चुनाव प्रचार के समय विधिवत अवकाश पर रहने चाहिए तथा उनके अवकाश की एक सीमा निश्चित होनी चाहिए जैसे शासकीय कर्मचारियों के लिए होती है . उससे अधिक अवकाश  होने पर उनके भी वेतन में कटौती की जानी चाहिए तथा समस्त यात्रा व्यय उनके चुनाव व्यय में जोड़ना चाहिए .
१०.                        वर्तमान में चुनाव आयोग द्वारा लागू सीमाएं एवं प्रतिबन्ध उचित हैं . चुनाव आयोग को अधिक अधिकार देने चाहिए ताकि वह तत्काल कार्यवाही कर सके तथा प्रकरण न्यायलय में जाने पर उसकी सुनवाई निरंतर की जानी चाहिए जिसमें तथ्यों के साथ अच्छी व्यवस्था बनाए रखने का उद्देश्य भी न्यायलय को अपने सामने रख कर निर्णय देना चाहिए .
  उक्त व्यवस्थाएं करने पर सामंतों की तानाशाही समाप्त होगी, युवाओं और धरातली कार्यकर्ताओं को अवसर मिलेंगे जिससे लोग देश के प्रति जागरूक होंगे, भ्रष्टाचार कम होता जायगा और प्रगति होगी .

चुनाव सुधार (1): स्वतन्त्र मतदान

                            चुनाव सुधार (1): स्वतन्त्र मतदान 
लोकतंत्र वह व्यवस्था है जो  नागरिकों की सामान्य इच्छा (. इसमें इस्लामिक देशों में लोगों की इस्लाम के अनुसार शासन चलाने की इच्छा और कम्युनिस्ट या अन्य तानाशाहों द्वारा जबरन थोपी गई सामान्य इच्छा सम्मिलित नहीं हैं ) के अनुसार जनता द्वारा  स्थापित , संचालित एवं नियंत्रित होती है . धर्म एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अनिवार्य तत्व है . लोक तंत्र में सबसे पहला काम शासन व्यवस्था स्थापित करना है . कार्यपालिका के अधिकारीयों –कर्मचारियों की नियुक्ति तो विभिन्न लोक सेवा आयोगों के माध्यम से होती है परन्तु कार्यपालिका प्रमुख अर्थात राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री या कोई अन्य पदाधिकारी का निर्वाचन लोगों द्वारा होता है या इन चुने हुए सदस्यों द्वरा होता है . जितने भी पदों पर निर्वाचन होता है वहां मतदान करने तथा चुनाव लड़ने की स्वतंत्रता होनी चाहिए .
   निर्वाचन का प्रथम पद उमीदवारों का चयन है . अधिकांश स्थितियों में यह कार्य राजनीतिक दल के प्रमुख सामन्त , सुप्रीमो या हाई कमान कहे जाने वाले लोग या लोगों द्वारा होता है . भारत जैसे अनेक देशों में चुनाव लड़ने का टिकट वंशवाद, निकट सम्बन्ध, जाति, धर्म, धन ( घूंस, सामंत को धन देना ), बाहु-बल या खास वफादार चमचों को ही दिया जाता है . समस्याओं को समझने की योग्यता कोई मापदंड नहीं होता है . परिणाम स्वरूप अपने दल में तो सामंत की मनमानी तानाशाही चलती ही है, वह अपनी पार्टी के चुने हुए सदस्यों अर्थात उन सदस्यों की संख्या के आधार पर देश की राजनीति में भी अपने हिस्से की मांग करता है और देश को लूटता रहता है  जिसे सामान्य भाषा में जन साधारण भ्रष्टाचार कहते हैं . शेष सारी समस्याएं इसी कारण  बढ़ती जाती हैं . यदि चुने गए सदस्य योग्य होंगे तो काम करेंगे अन्यथा सदन में हो-हल्ला और उत्पात करेंगे जैसा वर्तमान में होता है . इसलिए निर्वाचन में ये सुधार करने होंगे –
१.     सदन में चुने जाने वाले सदस्यों का चयन दल के सक्रिय सदस्यों के द्वारा होना चाहिए (न कि उसके सामंत या हाई कमान द्वारा) जैसा कि अमेरिका में होता है . इसलिए वहां के चुने गए प्रतिनिधि व्यक्ति, समाज एवं देश की समस्याओं को समझते हैं और उनके समाधान निकालने में तत्पर रहते हैं .
२.     किसी व्यक्ति को दो पदों पर एक साथ चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं दिया जाना चाहिए . यदि इसे नहीं रोका जा सकता तो दो स्थानों से चुना गया व्यक्ति जिस निर्वाचन क्षेत्र से त्यागपत्र देता है , वहां पर द्वितीय स्थान पर रहने वाले उम्मीदवार को , वह जो भी हो उस रिक्त स्थान का प्रतिनिधि बना देना चाहिए . इसी प्रकार कोई विधायक रहते हुए सांसद का चुनाव लड़ता है या सांसद रहते हुए विधायक का , उसका पद रिक्त होते ही पूर्व चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे व्यक्ति को उस क्षेत्र का प्रतिनिधि बना देना चाहिए .
३.     किसी अस्सी वर्ष से ऊपर आयु के अथवा अस्वस्थ रहने वाले व्यक्ति को चुना जाता है और बीमारी या आकस्मिक रूप से उसका निधन हो जाता है तो भी दूसरे स्थान पर रहने वाले व्यक्ति को सदस्य चुन लेना चाहिए . यहाँ यह देखना न्यायलय का कार्य होगा कि कहीं उसका मृत्यु किसी षड्यंत्र के द्वारा तो नहीं हुई है .
४.     यथा संभव चुनाव एक साथ होने चाहिए . म. प्र. के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बुदनी और विदिशा से चुनाव जीते हैं . वे एक सीट छोड़ेंगे . उस पर अभी संसद के चुनाव के साथ चुनाव करवाया जाना चाहिए था . इससे जनता धन की सामन्ती बर्बादी कम होगी .
५.     चुनाव के पूर्व किसी व्यक्ति को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री घोषित करना संविधान के विरुद्ध है क्योंकि उसमें लिखा है कि लोकसभा या विधानसभा में बहुमत प्राप्त नेता प्रधान मंत्री या मुख्य मंत्री होगा . नाम घोषित होने पर  वह अपनी पसंद के लोगों को ही टिकट देगा और जनता को उनके चमचों को चुनना पड़ेगा . इससे चुनाव के बाद उसकी तानाशाही होना स्वाभाविक है . यूपीए की नेता सोनिया गाँधी ने लोकसभा के बाहर से लाकर डा. मनमोहन सिंह को प्रधान मंत्री बनाया , यह प्रत्यक्ष सामंती तानाशाही थी .
६.     सदन के नेता चुनने में या मंत्रिमंडल बचाने के लिए मतदान के समय व्हिप जारी करना लोकतंत्र का क्रूर मजाक है . दल बदल रोकने के नाम पर लोकतंत्र का गला घोंटा गया और न्यायलय चुप रहे . जो लोग इसके द्वारा सदस्यों की गद्दारी रोकने की बात करते हैं , वे ऐसे सिद्धान्हीन, मक्कारों और दुष्टों को घूंस लेकर टिकट देने के स्थान पर योग्यता के आधार पर टिकट देंगे तो ऐसी स्थितियां नहीं पैदा होंगी .
७.     इसी प्रकार राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति या सदन के अध्यक्ष पद के चुनाव में भी व्हिप जारी करना  लोकतंत्र पर कलंक है . यह उन लाखों लोगों के प्रतिनिधित्व पर डाका है जिनके प्रतिनिधियों को जबरन वोट देने, न देने या बहिष्कार करने का अपने सामंत का आदेश जबरन मानना पड़ता है . हमारे देश के अंधे कानून में एक व्यक्ति को मतदान देने से रोकने वाले के लिए तो सज़ा का प्रावधान है परन्तु सामंतों द्वारा थोक के भाव से वोट लूटने या वोट डालने से रोकने के लिए कोई कानून नहीं है क्योंकि न्यायालय इन सामंतों को राजा तुल्य मानते हैं और उनके मनमानी करने का अधिकार को स्वीकार करते हैं .
८.     राज्य सभा का सदस्य दूसरे राज्य से लाकर नहीं थोपा जाना चाहिए और न ही किसी लुटे-पिटे नेता  को बनाया जाना चाहिए . इसमें उद्योग, व्यवसाय, कृषि, शिक्षा , कला, साहित्य, फिल्म, खेल, सुरक्षा, प्रशासन, विभिन्न सेवाओं जैसे डाक्टर, वकील, चार्टर्ड एकाउंटेंट आदि विभिन्न क्षेत्रों  के योग्य लोगों को चुना जाना चाहिए ताकि वे देश की प्रगति का मार्ग निर्धारित कर सकें .   
लोकतंत्र के लिए प्रत्येक स्तर पर मतदान करने की स्वतंत्रता सुनिश्चित होनी चाहिए. यदि दलों के तानाशाह यह कार्य नहीं करते हैं तो न्यायालयों का दायित्व है कि वे प्रत्येक स्तर पर लोकतंत्र विरोधी कानूनों को समाप्त करें और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा मतदान के मौलिक अधिकार को पुनर्स्थापित करें .       

रविवार, 6 अप्रैल 2014

मनुर्भव का सिद्धांत

  
                                              
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           मनुर्भव का सिद्धांत 

ऋग्वेद का सूक्त है : ' मनुर्भव ' अर्थात तू मनुष्य बन।  बचपन में जब कोई गलती हो जाती थी जिससे असभ्यता या बुद्धि हीनता का आभास होता हो तो डांट कर  समझाइश दी जाती थी कि जानवर मत बनो, इंसान बनो।  साधु -संत , ज्ञानी , बुद्धिमान या देवता बनने  की बात कभी नहीं कही गई।  अब समझ आता है कि मनुष्य बनना ही विश्व की सबसे बड़ी आवश्यकता आदिकाल से रही है और सृष्टि के अंत तक रहेगी।  हिन्दू धर्म में मनुष्य योनि का सर्वाधिक महत्त्व है क्योंकि लाखों योनियों अर्थात जीव-जंतुओं में केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसे कर्म करने का अधिकार है और वह  कर सकता है क्योंकि उसके पास ज्ञान अर्जित करने के लिए बुद्धि है, वाणी है , विचारों को प्रेषित करने की कला है, योजना बनाने और सहयोग देने-लेने की क्षमता है, स्मरण शक्ति है, धन-संपत्ति है , सृजन और विकास करने की प्रवृत्ति है तथा  कर्म द्वारा अपना और दूसरों का भाग्य बनाने की शक्ति है। अन्य जीवों में ये गुण नहीं होते।  उनके कार्य की सीमाएं बहुत छोटी होती हैं , अतः वे भाग्य पर आश्रित होते हैं। वे न तो कष्टों का निवारण कर सकते है और न ही  इच्छानुसार सुख या आनंद प्राप्त कर  सकते हैं।  इसलिए मनुष्य होना ही सबसे बड़ी घटना है। मानुष्य की शक्ल होने से कोई मनुष्य नहीं हो जाता , मनुष्य संस्कारों से बनता है , सामाजिकता से बनता है, धर्म और नैतिकता से बनता है। 
     पाशविक प्रवृत्ति सभी प्राणियों का मूल गुण धर्म है।  उदर-पूर्ती, वात्सल्य, वंशवृद्धि,निद्रा, विश्राम, परस्पर लड़ना-झगड़ना, सुरक्षा आदि इसके विभिन्न स्वरूप हैं।  इसके मुख्य भाव हैं ,भूख-प्यास,  सुख-दुःख की अनुभूति, सुरक्षा, काम, वात्सल्य-प्रेम, आलस्य, ढुलमुल, कायरता, लालच, क्रोध, स्वार्थ-सिद्धि, भय, शोक, क्रूरता, चालाकी, मक्कारी, चापलूसी, शारीरिक- मानसिक अक्षमता, अज्ञान तथा दूसरों की आज्ञाओं एवं आदेशों का पालन करना।  
 मनुष्य में उक्त गुण तो होंगे ही, उनपर नियंत्रण करने एवं इच्छानुसार परिवर्तित करने की क्षमता भी होती है।  मनुष्य भविष्य का योजनाकार तथा तदनुरूप उसमें प्रवृत्त होने वाला प्राणी है।  वसुधैव कुटुम्बकम अर्थात जियो और जीने दो उसकी भावना है।  ज्ञान- विज्ञान, विवेक, सत्य, न्याय, त्याग, करुणा, क्षमा, साहस तथा चिंतन उसके प्रमुख गुण हैं।परहित उसका धर्म है।अहंकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह उसके दुर्गुण हैं।  
   परपीड़ा में आनंद लेना  मूल आसुरी प्रवृत्ति है।  अहंकार, ईर्ष्या-द्वेष, घृणा, क्रोध, लोभ,  झूठ बोलना, संस्कृति पर प्रहार करना,  भय-आतंक फैलाना,  विध्वंस करना  तथा मायावी रूप धारण करना उनके प्रमुख गुण हैं।  
     अपनी पाशविक प्रवृत्तियों तथा  दुर्गुणों के कारण मनुष्य सुखी एवं आनंदित जीवन जीते हुए देखे जा सकते  हैं परन्तु एक सीमा के बाद उनका विस्तार होने पर वे आसुरी कार्य करने लगते हैं और समाज को कष्ट होने लगता हैं।  समाज में ऐसे लोगों की संख्या भी बहुत अधिक है तथा बढ़ती जा रही है जिससे सामाजिक विद्रूपताएं उत्पन्न हो रही हैं। धर्म पालन करना प्रत्येक व्यक्ति का निजी अधिकार है।  उसका प्रचार करना भी अनुचित नहीं कहा जा सकता परन्तु दूसरे  धर्मों को निम्न दृष्टि से देखना , उनसे घृणा करना, उनको सताना, अधिकारों से वंचित करना, उनकी धन-सम्पत्ति लूटना, उन्हें स्व धर्म का पालन न करने देना, उनकी हत्याएं करना क्रमशः बढ़ते आसुरी व्यवहार को दर्शाता है।एक राजा बड़ा राजा बनना चाहता है।  स्वाभाविक है वह दूसरे राज्य पर आक्रमण करेगा।  युद्ध में लोग भी मरेंगे।  यह स्वाभाविक ऐतिहासिक प्रक्रिया है।  परन्तु विजयी होने के बाद , पराजित लोगों  के धर्म को नष्ट करना , संस्कृति पर प्रहार करना,  नागरिकों को मारना- लूटना,  आगजनी और कत्ले आम करना क्रूर राक्षसी कार्य हैं। चुनाव लड़ना ,  जीतने के प्रयास करना मंत्री बनने  के लिए परिश्रम करना स्वाभाविक है परन्तु मंत्री बनकर घूंस खाना, योग्य व्यक्तियों के स्थान पर दुष्टों की नियुक्ति करना , उसमें धन खाने के षड्यंत्र रचना जिससे उनके लाभ के साथ  ही शेष व्यवस्था नष्ट हो जाए और आने वाली पीढ़ियां घोर कष्ट उठाएं, प्रबल राक्षसी कार्य हैं जो वे माया द्वारा अपने सुन्दर रूप धर कर सत्ता में बैठ कर करते हैं।  देश के व्यापर चौपट करना , विदेशी व्यापार बढ़ाने के लिए धन लेना , देश का धन विदेशों में जमा करना आसुरी प्रवृत्तियों के विभिन्न रूप हैं।  शिक्षा एवं स्वास्थ्य  व्यवस्था नष्ट करना जिसे भारत में आज सभी नेता जोर- शोर से कर रहे ,हैं महा मायावी असुरों  के कारनामे हैं क्योंकि इनसे आने वाली पीढ़ियां अनेक कष्ट पाती रहेंगी।  भारत के प्रधान मंत्री और म. प्र.  के मुख्य मंत्री द्वारा योजनाबद्ध तरीके से भोपाल गैस कांड के आरोपी को सुरक्षा देकर अमेरिका भिजवाना उसी आसुरी कार्य का प्रत्यक्ष हिस्सा है जिसमें आज तक लाखों लोग कष्ट पा रहे हैं।  उनके वंशज उन्हें पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए भी तैयार नहीं हैं और उसके बाद भी अपनी मायावी चालों से सत्ता हथियाते रहे हैं।  ये उन लोगों से अनेक गुना क्रूर है जो पाकेट मारी, मारपीट जैसी घटनाओं से किसी को कष्ट देते हैं। बलात्कार और हत्याएं करने वाले राक्षसो को भी सभी मानवीय सुविधाएं मिलती रहेंगी तो आसुरी अधर्म बढ़ना ही है।असुरों पर शोर मचाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।  इसलिए पशु कर्म, मानवीय भूलों और आसुरी कार्यों को अच्छी प्रकार समझना होगा , तदनुरूप न्याय करना होगा तभी सामाजिक समरसता बनेगी और स्थिर रहेगी जो लोकतंत्र की प्रथम  आवश्यकता है।  
                                                          धर्म और नैतिकता  
 पशु जो भी हिंसक-अहिंसक कार्य करते हैं उनकी सीमा उनकी उदर पूर्ती तथा सुरक्षा होती है।  शेर चीते शिकार तभी करते हैं  जब उन्हें भूख लगती है और बिना भूख के तब हमला करते हैं जब उन्हें अपनी सुरक्षा का भय होता है। मनुष्य का कर्म क्षेत्र सम्पूर्ण सृष्टि और मानवता है।  असुरों  का साम्राज्य वह जाल  है जिसका ताना-बाना  बुनकर वे शिकार फंसाते हैं और फिर उसे कष्ट देकर आनन्द की अनुभूति करते हैं।  धर्म एक पूजा की विधि मात्र नहीं है। ये वे विचार हैं जो व्यक्ति को मानवता की सीमा में रहने की प्रेरणा देते हैं। जो शिक्षा धर्म के नाम पर दूसरों के विरुद्ध घृणा और हिंसा फ़ैलाने या करने के लिए दुस्साहस उत्पन्न करती है , वह आसुरी और राक्षसी धर्म है। ऋषि पुत्र होते हुए भी राक्षसराज रावण  और दैत्य राज हिरण्य कश्यप ने अपने साम्राज्य में भगवान् की पूजा करने पर प्रतिबन्ध लगा रखा था. उन्होंने स्वयं को भगवान् घोषित कर दिया था और अपनी ही पूजा के लिए जनता पर अत्याचार करते थे। जो कोई उनके आदेश का पालन नहीं करता था उसे उनके सैनिक  कष्ट देकर मार डालते थे और खा भी जाते थे।वे राक्षस  और दैत्य थे , इसलिए नहीं बुरे थे अपितु वे बहुत बुरे थे , दूसरों को निजि  धर्म का पालन नहीं  करने देते थे। इसलिए  उनके कारण राक्षस और दैत्य नाम बदनाम हुए और बुराई का प्रतीक बन गए।  रावण के भाई विभीषण धार्मिक थे , उसके भाई कुम्भकरण और पुत्र मेघनाद पर भी ऐसे कोई आरोप नहीं हैं।  हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद, उनके पुत्र विरोचन, उनके पुत्र राजा बलि आदरणीय रहे हैं।  बलि की दानवीरता की बराबरी विश्व साहित्य की किसी कथा में भी नहीं आई है।  वे भी दैत्य थे।  सदियों तक ईसाइयों और मुस्लिमों ने भी यही किया और अनेक स्थानों परकुछ लोग  आज भी कर रहे हैं।  ये आज भी  मानवीय सीमा के उस पार के निवासी हैं। धर्म वह शिक्षा है जो व्यक्ति को मनुष्य बनाती  है और नैतिकता वह व्यवहार है जो मनुष्य को मानवीय कार्य करने की प्रेरणा देता है।  अतः लोकतंत्र के लिए धर्म एवं नैतिकता अपरिहार्य हैं। कड़ी  दंड व्यवस्था  अपराधों पर नियंत्रण तो कर सकती है परन्तु व्यक्ति में  सृजनात्मक कार्य करने की  भावना नहीं उत्पन्न कर सकती है।  वह दूसरों को कष्ट न दे परन्तु मन से तो घृणा कर सकता है , उससे ईर्ष्या-द्वेष तो रख सकता है। वह  स्वयं अलग रहे , इससे दूसरे व्यक्ति को क्या हानि हो सकती है ? परन्तु उनमें परस्पर सहयोग से समाज को जो लाभ मिलना चाहिए , वह तो नहीं मिलेगा।  नैतिकता ही इस कार्य को कर सकती है परस्पर भ्रातृत्व भाव उत्पन्न कर सकती है , उसमें  कर्तव्य  पालन  के लिए उत्साह भर सकती है , उसे व्यवहारिक मनुष्य बना सकती है , लोकतंत्र को साकार एवं सुदृढ़ बना सकती है।  इसलिए नैतिकता परम आवश्यक है। 
    भारत में सबसे ज्वलंत उदाहरण भ्रष्टाचार और बलात्कार के हैं।  महिला हिंसा एवं यौन शोषण के विरुद्ध सरकार ने कठोर क़ानून बनाए हैं परन्तु महिलाओं से दुर्व्यवहार के प्रकरण घटने के स्थान पर बढ़ते ही जा रहे हैं। इस पर अनेक लोग कहते हैं कि पुरुषों को अपने विचार बदलने होंगे।  पर कोई यह नहीं बताता कि यह बदलाव कैसे आयगा।  जब नैतिकता की बात की जाती है तो आधुनिक महिलाएं - पुरुष सभी भड़क उठते  हैं।  धर्म को दकियानूसी का  पर्याय माना  जाने लगा है।  अब एक ही तथ्य सामने रह जाता है कि घटनाएं होंगी और क़ानून अपना काम करेगा।  क्या इससे भय मुक्त समाज बन पायेगा  जो लोकतंत्र की आवश्यक शर्तों में से एक है ? इसी प्रकार भ्रष्टाचार रोकने के लिए भी क़ानून हैं पर भ्रष्टाचार अपने इतने रूप बदल रहा है कि उसे समझना ही कठिन है फिर रोकेंगे कैसे ? भोपाल में मेडिकल कालेजों में प्रवेश और अनेक नौकरियों में भर्ती के लिए घूंस के प्रकरणों की बाढ़ आ गई है।  जो पकड़ में आये हैं उन्हें तो निरस्त किया जा सकता है परन्तु हज़ारों ऐसे भी लोग होंगे जिनके नाम सामने नहीं आयेंगे।  मंत्री -सचिव शोध करके ऐसे अधिकरी ढूढ़ते हैं जो भ्रष्टाचार में सिद्ध हस्त हों।  उनकी नियुक्तियां मलाई दार पदों पर की जाती हैं ताकि वे मंत्री एवं अधिकारीयों को कुबेर रत्न बना सकें।  अपने वेतन से तो उनकी प्यास भी नहीं बुझ पाती  है।  नैतिकता के बिना इस प्रकार के अपराध और पाप नहीं रोके जा सकते हैं कानूनों से तो ये दिनदूनी रात चौगुनी गति से बढ़ रहे हैं।  सबसे बड़ी बात यह है कि ये अपराध उन राक्षसों द्वारा किये जा रहे हैं जिन्हें सुरक्षा और न्याय का दायित्व दिया गया है।  अब तो छेड़छाड़ में भारत के उच्चतम न्यायालय के जज भी नाम कमा रहे हैं।  क़ानून क्या कर लेगा ? 
   इतिहास इसका साक्षी है कि अनैतिकता पर पलने-बढ़ने वाले राज्य और राजा कालांतर में बुरी तरह नष्ट हो गए। रावण के कार्यों ने सोने की लंका भस्म करवा दी।  महाभारत में कौरवों के अनैतिक कार्यों से उनका राज्य नष्ट हो गया।  उक्त दोनों युद्धों में आततायियों के वंश भी नष्ट हो गए।  मुसोलिनी और हिटलर के धर्म एवं जातीय  विद्वेषपूर्ण कार्यों तथा अहंकार से द्वितीय विश्व युद्ध हुआ जिसमें उन्नति करता हुआ उनका देश बुरी तरह पराजित हुआ।  वे तो मरे ही, राष्ट्र की जान-मॉल की भारी क्षति हुई।
अब्राहम लिंकन ने दास प्रथा समाप्त करवाने के लिए अपने नैतिक बल से  गृह युद्ध का सामना किया और उस कलंक को सदा के लिए समाप्त कर दिया।  व्यक्ति की गरिमा स्थापित की गई जिससे आज वहाँ बड़ा से बड़ा व्यक्ति भी अपने अधिकांश कार्य स्वयं ही कर लेता है जबकि गरीब और विकासशील देशों में माध्यम वर्ग का व्यक्ति भी अपने काम करने में संकोच करता है।  उसे नौकर चाहिए।  विकसित देशों की उन्नति का रहस्य भी यही नैतिकता है कि वे अपना काम बड़ी ईमानदारी से करते हैं।  इसलिए वहाँ लोकतंत्र सफलता पूर्वक चल रहा है जबकि पाकिस्तान जैसे देश में या तो लोकतंत्र होता ही नहीं है या महज दिखावा होता है क्योंकि वहाँ धर्म के नाम पर पहले दूसरे धर्म वालों के विरुद्ध फिर स्वार्थ और लालच के कारण अपनों के ही विरुद्ध शोषण, लूट एवं हत्याएं की जाती हैं।  पाकिस्तान में पहले हिंदुओं को लूटा- मारा गया।  फिर पश्चिमी पाक ने पूर्वी पाक के अपने मुस्लिम धर्मवालों को भी को अपना शिकार बनाया। सैनिक अधिकारीयों ने वहाँ लूट, हत्या , बलात्कार जैसे सभी अमानवीय कार्यों का खुला तांडव किया परिणाम स्वरूप उसके टुकड़े हो गए और बंगला देश बन गया।  उसी अनैतिकता के कारण  आज उसकी अपनी भूमि ही युद्ध क्षेत्र में बदलती जा रही है जहाँ बच्चियो को पढ़ने से रोकने के लिए गोली से मारा जा रहा है ।  
        सोलहवीं सदी में ईसाई धर्म के पाखंड के विरुद्ध आवाज़ उठाते हुए मकियावेली ने कहा था कि उन राजाओं एवं गणतंत्रों को जो स्वयं को भ्रष्टाचार से मुक्त रखना चाहते हैं,  सबसे अधिक धार्मिक कार्यों की पवित्रता की रक्षा करनी चाहिए क्योंकि धर्म के अपमान से बढ़कर किसी देशके विनाश का कोई लक्षण नहीं होता है।  दार्शनिक कांट ने कहा था " मनुष्य में नैतिक भावना स्वतन्त्र इच्छा की  सत्ता है।  यदि व्यक्ति में यह न होती तो उसमें कर्तव्य की भावना भी न होती।  व्यक्ति को कर्तव्यों का बोध बुद्धि या मस्तिष्क द्वारा नहीं अपितु ह्रदय या अंतः करण में निहित नैतिक भावना से होता है।  भारत में हिंदुओं ने धर्म के नाम पर  कभी किसी को नहीं सताया गया।  ऋषि वाक्य है सभी सुखी हों, सभी नीरोग हों , सभी अच्छा देखें, किसीको लेशमात्र भी दुःख न हो।  परन्तु भारत में भी शूद्रों के नाम पर समाज के एक बहुत बड़े भाग को अछूत मानते हुए समाज से पृथक रखा।  कालांतर में भारत के पतन का यह भी एक प्रमुख कारण था। इसलिए गांधी जी ने धर्म और नैतिकता पर बहुत जोर दिया था और उसकी शाक्ति भी विश्व को दिखाई थी जिसे आज भी सब स्वीकार करते हैं।   
धर्म शब्द धृ धातु से बना है जिसका अर्थ है जीवन को धारण करना और उसे कल्याणपथ पर अगर्सर करना।  इसी प्रकार नीति काअर्थ है साथ ले चलना जो वृत्ति मनुष्य को असत्य से सत्य,कुमार्ग से सन्मार्ग,अज्ञान सज्ञान, और मृत्य से जीवन के और ले जाती है , उसे ही नीति कहते हैं।  न्याय मार्ग पर चलना ही नीति हैं।  यहाँ पर यह नहीं कहा गया है कि पूजा किसकी और कैसे करनी है।  धर्म और नैतिकता का सीधा अर्थ वः पथ जिस पर चल कर व्यक्ति एवं समाज सुखी हो तथा सब परस्पर  भ्रातृ भाव रखते हुए समृद्धि प्राप्त करें।  २२०० शब्द