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बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

क्या होगा हड़तालों से

                                 क्या होगा हड़तालों से 
दिनांक 20 एवम 21 फरवरी को देश व्यापी हड़ताल हो रही है . अनेक स्थानों पर जीवन अस्त -व्यस्त हो गया है . ट्रेन रोकने से अनेक यात्री बीच में फंस जाते हैं . यातायात के साधन बंद होने से समाज स्थिर हो जाता है . जिसे अस्पताल जाना हो , या उसी दिन परीक्षा हो ,जहां जाना आवश्यक हो तो वह व्यक्ति क्या करे ? अपना दुखड़ा किससे  कहे , कौन उसकी मदद करेगा ?कर्मचारी अधिकारी तो हड़ताल करके , अपनी ताकत दिखाकर कुछ वेतन बढ़वा लेंगे , परन्तु आटो चालकों को इससे क्या लाभ होगा , पता नहीं है . यह निश्चित है की सरकार  उनको कोई धन लाभ नहीं देगी, और यदि उनकी आय बढती है अर्थात किराया बढ़ता है , तो यह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन्ही के हितो के विपरीत होगा , जिनके साथ मिलकर वे हड़ताल कर रहे  हैं .
       हड़ताल मुख्यतः कमुनिस्ट दल करवा रहे हैं . इनसे पूछो की क्या  किसी कमुनिस्ट देश में हड़ताल हो सकती है ?30 वर्षों तक ये बंगाल पर कब्ज़ा जमाए रहे . प्रदेश पर कर्जे का बोझ लाद दिया और उसे सबसे पीछे धकेल दिया . श्रमिक संघ के नाम पर ये सरकारी और निजी संस्थानों में हड़तालें करवाकर सारी  व्यवस्थाएं  नष्ट करते गए . यदि पहले के कर्मचारी अच्छी प्रकार काम करते , तो आज भी कर्मचारियों पर भरोसा किया जाता . परन्तु आये दिन हडतालों के कारण  , काम में बाधाओं के कारण ही  कार्यालयों का मशीनीकरण और निजीकरण  होता गया .अब तो नियुक्तियों में  योग्यता का मापदंड ही समाप्त कर दिया गया है . अतः यदि कार्यालय में कोई अच्छा कर्मचारी होता है , तो सारा  बोझ उसी पर डाल दिया जाता है . चपरासी से मंत्री तक सभी अपना पेट और स्वार्थ देख रहे हैं देश की चिंता किसी को नहीं है . हड़तालें कोई परिवर्तन नहीं ला सकती हैं . इनसे किसी नेता  की निजी हानि तो हो नहीं रही है , अतः हड़ताल एक दिन चले या अधिक  किसी कोई फर्क नहीं पड़ता है . 
     देश में  एफ़ डी  आई लाने  पर व्यवसायी हड़ताल कर रहे थे . मैंने उनसे कहा की जब उद्योग बंद हो रहे थे, उनके कर्मचारी बेरोजगार हो रहे थे , आपने कभी आवाज नहीं उठाई क्योंकि आपको सामान बेचकर लाभ कमाने से मतलब है , तब आपने क्यों नहीं सोचा की आज विदेशी माल देशी माल को  विस्थापित कर रहा है , कल विदेशी व्यापारी आपको भी किनारे करेंगे . पर जैसे पहले कहा है की प्रत्येक व्यक्ति अपना और सिर्फ अपना ही हित साधने में लगा हुआ है . इस व्यवस्था में आज एक का तो कल दूसरे का और फिर धीरे- धीरे सबका हाल बुरा होने वाला है जैसा टोकरे मे बंधे  हुए मुर्गों का होता है .
     जहां तक सरकार की बात है तो क़ानून की मनमानी व्याख्या करने और उसे तोड़ने का सार्वभौमिक अधिकार उसी को है . पहले उचित बातों  को न सुनना  , समस्याओं की अनदेखी करते जाना ,   हड़तालें करवाना  और फिर डरकर बलशाली के सामने झुक जाना , कमजोर को धक्का दे देना , उसकी आदत बन गई है , सीधी  सी बात है की यदि किसी का हक़ बनता है तो उसे पहले ही दे दो , और नहीं बनता तो बाद में भी मत दो , दूसरी व्यवस्था करो तो हड़ताल की नौबत ही क्यों आएगी / इन नेताओं ने अंग्रेजों से एक ही बात तो सीखी है कि 'फूट डालो और राज्य करो ' . इसी सिद्धान्त  के अनुसार अधिकाँश  विभागों में एक जैसे कामों  के लिए अलग - अलग पदनामों से कर्मचारी रखकर  उन्हें छोटे -बड़े वर्गों में बाँट दिया है ताकि  वे आपस में मिल न पाएं और सरकार के लोग मनमानी करते  रहें   जब तक वे कुर्सी पर काबिज हैं  . इसीलिए न्यायालयों में कर्मचारियों  और सरकरों के मध्य लाखों मुक़दमे लंबित हैं . जब तक देश में सबको अपना समझने वाली सरकार नहीं बनती , देश में सुव्यवस्था की आशा करना व्यर्थ है .




गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

चिड़ीमार अर्थ शास्त्री

                                          चिड़ीमार    अर्थ शास्त्री 
यह शब्द कुछ अटपटा सा लग सकता है . मैं आपसे ही पूछता हूँ  उनके लिए बेस्ट शब्द क्या हो सकता है ? हमारे देश में बहुत पहले  लोग धार्मिक हुआ करते थे जिन्हें अब सांप्रदायिक कहा जाता है . उस समय एक कहावत प्रचलित थी , ' एक पंथ , दो काज .' प्रायः दो काज में दोनों कामों का अर्थ अच्छे काम के सन्दर्भ में होता था . जब अंग्रेज आये तो बात वीरता के साथ चालाकी की होने लगी और उन्होंने कहावत प्रयोग की ,' टु किल टू  बर्ड्स विथ वन  स्टोन ',अर्थात एक पत्थर फेंक कर दो चिड़िया मारना . वे मांसाहारी होते थे इसलिए चिड़िया मारना उन्हें बहुत अच्छा लगता था . फिर वे लोगों को भी चिड़िया समझते थे . आज के अर्थ शास्त्री अंग्रेजीदां हैं . उन्हें हिंदी से तो नफरत है . इसलिए वे भी चिड़िया मार  मुहावरे को बहुत पसंद करते हैं . जब आज के सुधार कार्यक्रमों को देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि वे तो एक साथ कई चिड़िया मार रहे हैं  . 
            पहला पत्थर मारा ,गैस के दाम बढ़ा दिए . कंपनी वाले खुश .जो  खुश होता है वह ईश्वर के नाम पर , नेता के नाम पर , धंधे- पानी के नाम पर कुछ तो प्रसाद चढ़ाएगा  ही . गैस मंहगी  होगी तो लोग माइक्रो वेव ओवेन खरीदेंगे , उनका व्यवसाय चमकेगा वे भी प्रसाद बाँटेंगे . गैस न मिली तो खाना किस पर बनायेंगे ? इससे पिजा -बर्गर का व्यवसाय बढेगा . लोग पिजा बर्गर खायेंगे , बीमार पड़ेंगे , डाक्टरों , अस्पतालों , दवाई बनाने वालों  की चाँदी होगी  . इसीलिए पहले  से ही अस्पताल को उद्योग का दर्जा दे दिया गया है जिससे यह उद्योग चरखे जैसा न चलकर आधुनिक आटोमेटिक फैक्टरी  सरीखा दौड़ेगा ,फिर इसका विस्तार चाय नाश्ता पंहुचाने वालों से लेकर  बिल्डर , लोहा -सीमेंट,  मिस्त्री - मजदूर और न जाने कहाँ - कहाँ तक फैलेगा . इस तरह एक ही वार से कितनी चिड़िया मार गिराईं , आप गिन भी नहीं सकते हैं . और यदि बात डीज़ल के दाम की करें तो वह तो खतरनाक एटम बम की श्रंखला अभिक्रिया सरीखा है , डीजल का नाम लेकर लोग रोते जांयगे और चालाकी से दूसरों को लूटते जांएगे . चिड़ी मार अर्थ शास्त्रियों , तुम्हारा बलिहारी हूँ .