शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

लोकतान्त्रिक समाज


                    
​​
          लोकतान्त्रिक समाज 
      लोकतान्त्रिक समाज वह  समाज है जो लोगों की सामान्य इच्छा से स्वतः स्फूर्त चलता है। प्रत्येक व्यक्ति के विचार एवं  आवश्यकताएं भिन्न होती हैं।  व्यक्ति की भाषा, वाणी, खान-पान,  पहनावा, चाल-ढाल, कार्य और कार्य करने के ढंग भिन्न-भिन्न हो सकते हैं परन्तु ऐसी अनेक आवश्यकताएं है जो लोगों में समान हो सकती है जैसे सुरक्षा व्यवस्था, आवास व्यवस्था, खाद्य पदार्थों की उपलब्धता, जल, विद्युत्, शिक्षा, सड़कें, वाहन, स्वास्थ्य  सेवाएं, उद्योग, व्यवसाय, धन-संपत्ति, ईँधन,  क्षेत्र की साफ-सफाई,  सीवेज आदि।  इनको सुचारू रूप से दो प्रकार से चलाया जा सकता है।  एक, कोई व्यक्ति निजी स्तर पर ये व्यवस्थाएं करे और लोग उसके लिए भुगतान करें   और दूसरी, लोग मिलजुल कर ऐसी व्यवस्था बनाएं कि उनकी देखरेख में ये सुविधाएं मिलती रहें। पहली व्यवस्था में पैसे देकर काम कराना है , कोई सिरदर्द नहीं है।इस में यह भय बना रहेगा कि सेवा प्रदाता अवसर देखकर भाव बढ़ा दे।  जैसे खाद्य सामग्री के भाव बहुत बढ़ा दे तो लोग क्या खायेंगे ? और यदि सुरक्षा देने वाला भाव बढ़ा दे और व्यक्ति उतना धन न दे सके तो उसका जीवन कैसे चलेगा ? इसे आदिम व्यवस्था के तुल्य समझा जा सकता है जहां मत्स्य न्याय था, शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर का शोषण कर लेता था।  वेदव्यास जी ने कहा है कि मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो मनुष्य को दास बनाकर  उसका शोषण करता  है।  इससे बचने का दूसरा रास्ता है सब मिलजुल कर व्यवस्था बनाएं।  आदिम काल की ऐसी व्यवस्था ने राज्य और शासन व्यवस्था को जन्म दिया जब सभी लोग मिलकर मनु के पास गए और उनसे  सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए अनुरोध किया।  लोगों ने इसके बदले उन्हें अपनी आय का एक भाग देने का वचन दिया।  उस समय की शासन व्यवस्था का उद्देश्य न्याय स्थापित करना था ताकि लोग भय रहित होकर निजी कार्य स्वतंत्रता पूर्वक कर सकें। प्रारम्भ में राजा  का कार्य प्रजा का पालन करना था परन्तु धीरे - धेरे उसमें परिवर्तन होते गए और राजा राज्य को अपनी निजी संपत्ति मानने लग गए।  दार्शनिकों ने इसके लिए प्रतिवाद किये और क्रमशः प्रजातंत्र की स्थापन होती गई जो आज विश्व के अनेक देशों में विद्यमान है। इसमें लोग राजा का चुनाव करते हैं।  इस व्यवस्था में यह मान्यता स्थापित हुई कि राज्य के सम्पूर्ण प्राकृतिक सम्पदा जनता की है जो कि पहले राजा और उसके वंशजों की होती थी।  इस व्यवस्था में यह दोष उत्पन्न हो गया कि जिन्हें राज्याधिकार मिले उन्होंने संसाधनों का उपयोग निजी लाभ के लिए करना शुरू कर दिया।  आज विश्व के अधिकांश देश भ्रष्टाचार की चपेट में हैं।  इस व्यवस्था में कुछ लोग लाभ उठा रहे हैं तो अनेक लोग शोषण और अव्यवस्था का शिकार हो रहे हैं।  इस व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए कैसी सामाजिक व्यवस्था बनाई जाए, यह आज की सबसे बड़ी समस्या है । कानूनऔर  मशीनीकरण से यह आभास तो होता है कि कुछ सुधार हो रहा है परन्तु फिर देखने में आता  है कि  भ्रष्टाचार अपनी सीमाएं पार करके अनंत में बढता जा रहा है।  लोगों को राहत राशि या छात्रों को छात्रवृत्तियां  बाँटने में  बाबू-अफसर घूंस खाते हैं।  उन्हें रोकने के लिए राशि नेट से सीधे उनके खाते में जमा की जाने लगी।  भ्रष्टाचार रुक गया।  मेडिकल कालेजों में प्रवेश और विभिन्न नौकरियां दिलवाने में लाखों रुपये खाए  जाने लगे। केंद्रीय मंत्री तो हजारो करोड़ के नए- नए घपले करने लगे।  न्यायालयों में मुकदमों का अम्बार लगा दिया ताकि लोगों को न्याय न दिया जाए।  अन्ना हजारे ने वर्षों तक आंदोलन करके लोकपाल बिल बनवा दिया।  उससे कितना लाभ मिलेगा अभी कहना कठिन है क्योंकि उसमें बैठेंगे तो इसी भ्रष्ट  व्यवस्था के लोग। यह वैसा ही कार्य कहा जा सकता है जैसे गम्भीर रोगी को तीर-तुक्के से नई  दवा दे दी जाए तो घरवालों और मरीज़ को लगने लगता है कि  अब इससे ठीक हो जायेंगे।  
          भारत में सबसे बड़ी सामाजिक समस्या है स्वार्थ, काम में मक्कारी करना और व्यवस्था के विरुद्ध काम छोड़कर आंदोलन करना।  यहाँ के सांसद और विधायक जिन्हें इस देश को चलाने का दायित्व दिया गया है , काम न करने, काम न करने देने में सबसे आगे हैं और ये सब कार्य वे पूरे वेतन-भत्ते लेकर करते हैं। राज नेता अपनी पूरी सामर्थ्य से समाज को धर्म, जाति , वर्ग, क्षेत्रीयता, भाषा आदि के आधार पर खंडित करते जा रहें हैं।   डा मनमोहन सिंह ने व्यवस्था में यह सुधार किया है कि धीरे- धीरे सारी  व्यवस्था  प्राइवेट स्तर पर दे दी जाय। इससे निचले स्तर पर भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी दोनों समाप्त हो जायेंगे।  सिर्फ बड़े महा भ्रष्ट अधिकारी  और मंत्री जो ठेके देंगे , शेष बचेंगे।  इस प्रथा के लिए उनकी भूरि- भूरि प्रशंसा की जाती है कि उन्होंने द्देश को नई दिशा दी है।निजी स्तर पर  कतिपय सामाजिक संगठन अच्छे कार्य कर रहे हैं परन्तु इस व्यवस्था ने एन जी ओ का जाल बिछा दिया है जो शासकीय धन अर्थात जनता द्वारा कर के रूप में दिए गए धन को अपने-अपने स्तर पर पचाने में लगे हैं।  हमारे  समाज के सामने आज ये समस्याएं हैं जिन्हें दूर करना है : 
      १. भ्रष्टाचार दूर करना  २. लोगों से मक्कारी और स्वार्थ भावना समाप्त करना  ३. लोगों की भावनाओं और आवश्यकताओं को समझना  ४. उनके अनुसार शासन व्यवस्था स्थापित करना ५. राष्ट्र में सामाजिक समरसता उत्पन करना,  ६. व्यक्तित्व विकसित करने की  की स्वतंत्रता और गरिमा स्थापित करना  और लोगों को रचनात्मक कार्यों में लगाना। 
     यहाँ यह तथ्य ध्यान रखना होगा कि समाज में अनेक लोग ऋणात्मक कार्य करते रहते हैं।  उन्हें रोकने का उपदेश देने से कोई लाभ नहीं होगा।  समाज में ऐसी व्यवस्था बन जानी चाहिए कि लोग स्वप्रेरणा से सकारात्मक कार्य करने में  रूचि लें।  जैसे माँ अपने बेटे या बेटी से टीवी बंद करके पढ़ने के लिए कहती है तो कुछ प्रकरणों में बच्चों ने आत्महत्या तक कर ली।  ऐसे बच्चे समझाने से नहीं समझेंगे।  वातावरण ऐसा हो कि वे  अनावश्यक रूप से टीवी देखे ही नहीं।  
   भारतीय समाज विज्ञान की उपेक्षा एवं विरोध करना  आधुनिक तथा कथित बुद्धिजीवियों का फैशन हो गया है।  सारी  योजनाएं पवित्र विचारधार के विरुद्ध बनाई जाती हैं ताकि सामस्याएं बढ़ें।   रूसो, हॉब और लॉक के समझौता सिद्धांत के चर्चा होती है और अंत में कह दिया जाता है कि यह कपोल कल्पित अवधारणा है जिसका अब कोई महत्व नहीं है। परन्तु भारतीय समझौता सिद्धांत की कहीं चर्चा तक नहीं की जाती जो जीवंत है और सामजिकता का आधार है।  हिन्दू धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि व्यक्ति जन्म से शूद्र होता है परन्तु संस्कारों से द्विज बनता है।  संस्कार देने का कार्य विद्याध्ययन से प्रारम्भ होता है।  विद्याध्ययन के पूर्व बालक का यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है।  जनेऊ के तीन धागे बालक के गले में दाल दिए जाते हैं।  ये तीन धागे उस समझौते के बंधन है जिसमें उसे कहा जाता है कि तुम्हारे ऊपर तीन ऋण चढ़ रहे है जिन्हें चुकाने पर तुन्हें मोक्ष प्राप्त होगा।  ये तीन ऋण हैं : 
१. पितृऋण : माता - पिता ने उसे जन्म दिया है।  उसका भी कर्तव्य है सृष्टि के विकास में योगदान दे।  इसके साथ ही वह माता-पिता का आज्ञाकारी हो तथा  वृद्धावस्था में उनकी समुचित देखभाल एवं सेवा करे। 
२. ऋषि ऋण : बालक जीवन में अनेक लोगों से एवं प्रकृति से ज्ञान अर्जित करेगा।  उसका दायित्व है कि वह  अपने ज्ञान को समाज में बांटे तथा उसका विस्तार करे जिससे सामाज का कल्याण हो।
३. देवऋण :  व्यक्ति अपने जीवन में अनेक लोगों , पेड़-पौधों से, जीवजन्तुओं से तथा प्रकृति से इस शरीर के विकास के लिए वस्तुएं तथा ज्ञान अर्जित करता है।  उसका दायित्व है है कि वः भी अपने जीवन में जितना हो सके, जो कुछ हो सके,  समाज के लिए दे। 
       इससे स्पष्ट है  कि हमारे ऋषियों ने एक अच्छे समाज के विकास के लिए अनौपचारिक समझौता  किया था।  यदि बच्चे को बचपन से ये बातें हृदयस्थ करवा दी जाएँ तो वे मत-पिता गुरु की आज्ञाओं और वचनों का जीवन में प्रसन्नता पूर्वक पालन करेंगे तथा वृद्धावस्था में उनका भरण-पोषण ही नहीं, दिल से उनकी सेवा भी करेंगे। परन्तु हमारी सर्कार इन डाकिया नूसी बैटन में विश्वास नहीं करती है।  इसके स्थान पर माता-पिता गुरु द्वारा बच्चों को डांटनेऔर पीटने के विरुद्ध दंडात्मक क़ानून बनाती है और वृद्धावस्था में कानून बनाकर सोचती है कि अब बच्चे माता-पिता का भरण-पोषण करने लगेंगे। 
     गुरु जब शिष्य को पढ़ाते थे तो अच्छे समाज की कल्पना उनके मस्तिष्क में होती थी।  आज या तो गुरु नियुक्त ही नहीं होते और शिक्षक के नाम पर धर्म, जाती, घूंस आदि के आधार पर नियुक्तिया कार दी जाती है जिनका उद्देश्य अपना पेट भरना तथा कहीं से भी।, कैसे भी धन अर्जित करना होता है।  समाज से उन्हें क्या सरोकार होगा ? ये अपराध वृद्धि करने वाले समाज का नहीं तो किसका निर्माण करेंगे ? उस समय छात्र भिक्षा मांग कर आश्रम में लेट थे और लोग उन्हें दान देकर प्रसन्नता का अनुभव करते थे।  आज सरकार प्रत्येक वास्तु पर शिक्षा उपकार लगा रही है, दुनिया भर से कर्जे बटोर रही है और शिक्षा का व्यवसाय कर रही है और करवा रही है।  फिर भ्रष्टाचार रोकने के लिए क़ानून और लोकपाल बनाती है।  इन सबसे क्या हित होगा ?
   आज व्यक्ति कमाता है तो उसकी भूख और बढ़ती जाती है।  इसीलिये भारत के मंत्री कुछ भी बेचने के लिए तत्पर रहते है बस उन्हें हज़ारो-लाखों करोड़ रूपये मिलने चाहिए।  देव ऋण उन्हें किसी ने बताया ही नहीं।  
      अपने समझौता सिद्धांत में रूसो कहता है कि मनुष्य स्वतन्त्र जन्म लेता है परन्तु है  जीवन भर बेड़ियों में जकड़ा रहता है जो अत्यंत कष्ट प्रद है।  भारतीय मनीषी कहते हैं कि व्यक्ति जन्म से ही ऋणी है।  मनुष्य जन्म के लिए वह  ईश्वार का ऋणी है , जन्म के लिए वह माता-पिता का ऋणी है।  विद्या प्राप्त करने में वह गुरुओं , ऋषियो और ज्ञानियों का ऋणी है और जीवन यापन के लिए देवताओं और सृष्टि का ऋणी है।  परन्तु  स्वतंत्र होना  अर्थात मोक्ष प्राप्त करना उसका जन्म सिद्ध अधिकार है।  वह  यथाशक्ति उक्त ऋणों को चुकाता जाय, वह स्वतन्त्र हो जायगा, उसे मोक्ष मिल जायेगा।  गुरु नानक देव जी कहते है कि मोक्ष दुनिया से भागने में नहीं उसमें रहकर सेवा कारने  से प्राप्त होगी।  वही ईश्वर की सच्ची उपासना है।  
 कम्युनिस्ट धर्म के नाम से ही घृणा करते हैं  और भारत के  सैकुलर वादी लोग हिन्दूधर्म को साम्प्रदायिकता का  दूसरा नाम समझते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य उस व्यवस्था को बनाना है जिसमे विदेशी, भौतिक वादी , पूंजीवादी और भ्रष्ट लोगों का हित हो।  काग्रेस सरकार के नेता यह बड़े गर्व से कहते हैं कि उन्होंने  भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए , गरीबों की भलाई के लिए अनेक क़ानून बनाए हैं परन्तु वे यह नहीं बताते कि इन कानूनों से देश में भ्रष्टाचार और अपराध क्यों बढ़ते जा रहे हैं।  वर्त्तमान में देश की सभी पार्टियां , वे प्रत्यक्ष कुछ भी कहती हों , इसी ढर्रे पर चल रही हैं।  जिनसे सामजिक अव्यवस्थाएं बढ़नी ही हैं।
      निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का क़ानून केंद्र सरकार  ने बनाया जिसमें निजी स्कूलों को कक्षा ८ तक २५% गरीब एवं दलित-पिछड़ा वर्ग के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देना अनिवार्य किया गया  है परन्तु मुस्लिम और ईसाई वोट प्राप्त करने के लिए उसने यह प्रावधान कर दिया कि स्कूल यदि मुस्लिम या ईसाई व्यक्ति ने खोला है तो उसे किसी को निःशुल्क नहीं पढ़ाना है , सबसे धन कमाना  है।  केवल हिंदुओं की यह उत्तरदायित्व है कि वे सभी धर्म, जाति  के गरीब बच्चों को निःशुल्क पढ़ाएं।  यह लोकतान्त्रिक समाज के सिद्धांतों के विरुद्ध है क्योंकि कानून बनाकर कांग्रेस सरकार ने समाज के एक बड़े वर्ग को सामाजिक दायित्व से दूर कर दिया। संसद में किसी भी दल ने इस कंडिका का विरोध नहीं किया। 
      डा ए डी खत्री (१) ने लोकतान्त्रिक समाज का बेंजीन मॉडल दिया है। जिसके अनुसार समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने हित के लिए कार्य करना चाहिए परन्तु उसे अपनी शक्ति या आय या कार्य का एक उचित हिस्सा समाज को भी अर्पित करना चाहिए तभी उसे यह समाज अपना समाज लगेगा और वः इसके हित के लिए कार्य करेगा , जो विरोध में कार्य करते हैं उन्हें रोकेगा और अन्य लोगों को भी समाज सेवा के लिए प्रेरित करेगा।  जिसके पास धन है , वह धन का अंश दे , जिसके पास विद्या है , वह विद्या दान करे और जो ताथा कथित गरीब हैं वे श्रम दान करें।  सरकार ग्राम विकास के लिए सड़के बनवाती है।  उसका सारा व्यय जनता से प्राप्त कर से पूरा किया जाता  है।  ग्रामीण व्यक्ति जिसे उस सड़क का सीधा लाभ मिलेगा , प्रतिदिन एक-दो घंटे श्रमदान करना चाहिए।  इसे एक तो काम की गुणवत्ता बनी रहेगी और धन बचेगा तो उनकी अन्य आवश्यकताओं के काम अ जायगा।  सरकार लाखों रूपये के फ़्लैट गरीबों को बाँट रही है।  उन्हें बनाने में हितग्राहियों को श्रमदान करना चाहिए।  इस प्रकार जब सभी लोग समझें कि यह देश उनका है इसके प्रति उनके भी कुछ दायित्व हैं तभी वे देश की विभिन्न व्यवस्थाओं में रूचि लेंगे,सहयोग करेंगे , अच्छे- बुरे का भेद समझेंगे जिससे कार्यों की गुणवत्ता बढ़ेगी और भ्रष्टाचार कम होगा।  
   डा खत्री(२) ने दूसरा सिद्धांत सामाजिक दबाव का दिया है।  अभी देश में समूह दबाव काम कर रहे हैं।  जिनका संगठन शाक्तिशाली होता है वे आंदोलन करके  शासन और कंपनी मालिकों से अपनी मांगें मनवा लेते हैं।  जिनका संगठन नहीं होता या कमजोर होता है , उनकी आवश्यक मांगें भी नहीं सुनी जाती हैं।  जैसे पुलिस का व्यक्ति कितने दबाव में काम करता है , उसे क्या-क्या परेशानियां हो रही हैं ,यह  देखने वाला कोई नहीं है कि उसका कितना शोषण हो रहा है।  वह कष्ट सहता है और अवसर मिलने पर अवैध कमाई करके समाज से बदला लेता रहता है।  इसे कौन सुधारेगा। इसी प्रकार कार्यालयों में काम का बोझ बढ़ता जा रहा है और कर्मचारियों - अधिकारीयों की संख्या निरंतर घटती जा रही है जिससे कार्यरत कर्मचारी बहुत दबाव में रहते हैं।  सरकार नियुक्तियां इसलिए नहीं करती कि उसके मंत्रियों को भ्रष्टाचार करने के लिए धन कम पड़  जायेगा।  ऐसी स्थिति को  कौन सुधारेगा ? अतः ऐसी लोकशक्ति होनी चाहिए जो स्वतः सबको देखती रहे और यथा सम्भव उनमें सुधार करते रहें।  यदि लोगों को यह विशवास हो जाए कि उनकी शारीरिक, आर्थिक या अन्य समस्या आने पर समाज उसके साथ है तो भ्रष्टाचार , संपत्ति जमा करने का लोभ  लूटमार, आंदोलन सब समाप्त हो जायेंगे।  आंदोलन विदेशी सरकार के विरुद्ध तो समझ आते थे परन्तु अपनी सरकार  के विरुद्ध भी आंदोलन हों,  काम में बाधाएँ  डाली जांय, कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता।  यह इसलिए हो रहा है कि बिना शक्ति के कोई बात सुनने तक के लिए तैयार नहीं  होता है।  लोक शक्ति का निर्माण युवा विद्यार्थी शक्ति से होगा और उसी से लोकतंत्र वास्तविक अर्थों में साकार होगा (३)।  सब शोषण रहित और समान होंगे तथा असामाजिक तत्वों के स्थान पर परहित करने वाले मनुष्यों  का साम्राज्य होगा। 
 
           
       

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें