सोमवार, 31 मार्च 2014

लोकतंत्र के तत्व


                                 
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                              लोकतंत्र के तत्व 

                         
 लोकतंत्र वह शासन पद्धति है जो देश की जनता द्वारा नागरिकों की सामान्य इच्छा के अनुरूप स्थापित, संचालित एवं नियंत्रित होती है . किसी भी देश में रहने वाले लोगों की अपनी-अपनी इच्छाएँ तो होती ही हैं परन्तु अनेक इच्छाएँ ऐसी भी होती हैं जो सबमें सामान्य होती हैं . जैसे जीवन की आधारभूत आवश्यकताएं जैसे मकान, वस्त्र, खाद्य वस्तुएं, जल, शिक्षा, धर्म, चिकित्सा सुविधा, रोजगार, उद्योग-व्यवसाय, बिजली, सड़क, परिवहन-व्यवस्था, निजी सुरक्षा, विदेशी आक्रमण से सुरक्षा, नगरों की साफ़-सफाई, व्यक्तित्व विकास की स्वतंत्रता आदि . इन सामान्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए शासन व्यवस्था का सम्पूर्ण दायित्व जब देश के नागरिक सँभालते हैं तो इसे लोकतंत्र कहते हैं . मुस्लिम देशों में प्रायः मुस्लिम लोगों की सामान्य इच्छा रहती है कि शासन इस्लाम में निहित प्रावधानों के अनुसार ही चलाया जाना चाहिये . ऐसे शासन में अन्य धर्मावलम्बियों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है . ऐसा शासन बहु संख्यकों की सामान्य इच्छा के अनुसार चलाए जाने पर भी लोकतंत्र नहीं कहा जायेगा . जिन देशों में भिन्न राजनीतिक विचारधारा को स्वीकार नहीं किया जाता है जैसे साम्यवादी देश, वहां भले ही सभी लोग मतदान करते हों, लोकतंत्र नहीं कहलायेगा .
   शासन बल और शक्ति का खेल है . शक्तिशाली व्यक्ति देश के धन एवं पदों पर अधिकार करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं यदि नागरिकों की सम्पूर्ण शक्ति मिलकर भी किसी एक बाहुबली या शक्तिशाली व्यक्ति को शासन से पृथक नहीं रख सकती है तो इसका अर्थ होगा लोकतंत्र निजी तंत्र से दुर्बल है . व्यवस्था भ्रष्ट हो जायगी तथा धीरे-धीरे सामंतवाद और तानाशाही में परिवर्तित होने लगेगी .
  लोकतंत्र की सफलता के लिए निम्नलिखित शर्ते आवश्यक एवं अनिवार्य हैं :    
१.    देश  की संप्रभुता का जनता में सामूहिक रूप से निहित होना क्योंकि लोकतंत्र में सामूहिक रूप से जनता देश की राजा होती है, स्वामी होती है .
२.    नागरिकों का स्वयं को देश के कोष, संपत्तियों तथा संपदाओं का ट्रस्टी समझना तथा इनकी देखभाल एवं संवृद्धि के लिए तत्पर रहना . जिस प्रकार व्यक्ति निजी संपत्ति की देखभाल एवं संवृद्धि के लिए प्रयत्नशील रहता है , उसे उसी प्रकार देश की संपत्ति के लिए भी करना चाहिए . व्यक्ति स्वयं के लिए  सस्ता, सुन्दर, टिकाऊ सामान क्रय करता है . यदि कोई कर्मचारी या अधिकारी देश या राज्य के लिए घटिया और मंहगा सामान क्रय करता है तो यह इस शर्त का उल्लंघन होगा .
३.    नागरिकों द्वारा सभी कार्य राष्ट्र हित में समर्पित भाव से करना . शासकीय नौकरी अनेक लोग करते हैं परन्तु उनके भाव में भिन्नता होती है . एक शिक्षक पढ़ाता है . वह जीविका अर्जित करने के लिए पढ़ाता है और इसकी चिंता नहीं करता है कि छात्र को कितना समझ आया . दूसरा इसके लिए तत्पर रहता है कि छात्र अच्छी प्रकार विषय को समझ ले . दूसरा व्यक्ति राष्ट्र के प्रति समर्पित है जबकि दोनों सामान पाठ्यक्रम पढ़ा रहे हैं और सामान वेतन ले रहे हैं . जज वाद का निपटारा शीघ्र कर देता है ताकि न्याय का शासन बना रहे तो वह राष्ट्र के लिए समर्पित है . जो गलत निर्णय देते है या सिर्फ तारीखें ही बढ़ाते रहते हैं वे लोगों को निरंतर कष्ट देते रहते और व्यवस्था को असामाजिक तत्वों के हवाले करते जाते हैं जिसमें शक्तिशाली व्यक्ति को मनमानी लूट और अपराध करने का प्रोत्साहन मिलता है . इससे शासन का प्रमुख कार्य, न्याय-व्यवस्था ही नष्ट होती जाती है .  
     हिटलर, मुसोलिनी जैसे तानाशाहों ने भी अपने देश के लोगों को समर्पण भाव से कार्य करने के लिए प्रेरित किया और बलपूर्वक भी उसके लिए बाध्य किया . परिणाम स्वरूप वहां पहले देश ने बहुत उन्नति की परन्तु फिर उन तानाशाहों के कारण वे द्वितीय विश्व युद्ध में फंस गए और उन्हें बहुत क्षति उठानी पड़ी . लोकतंत्र में व्यक्ति किसी के दबाव में नहीं स्व प्रेरणा  से देश के लिए कार्य करता है . देश के जितने प्रतिशत लोग समर्पित भाव से देश के लिए काम करते हैं, देश में लोकतंत्र की सीमा उतने प्रतिशत ही होती है . इसलिए ब्रिटेन और जापान में रजा के होते हुए भी लोकतांत्रिक व्यवस्था है क्योंकि वहां अधिकांश लोग अपने कम एवं देश के प्रति समर्पित हैं .
४.    देश के बाधक तत्वों को नियंत्रित करना अर्थात सक्षम, सुदृढ़ एवं सक्रिय न्यायपालिका होना .सक्षम का अर्थ है किसी भी स्तर के अपराधी को न्याय के सम्मुख लाने की क्षमता होना . सचिव या मंत्री भ्रष्टचार करता है . उन पर वाद चलने के लिए न्यायलय को किसी मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए . सुदृढ़ का अभिप्राय है भय-लोभ रहित विद्वान् जजों का होना जो बड़े से बड़े व्यक्ति को भी दण्डित कर सकें . सक्रिय का अर्थ है देश में विधि विरुद्ध कार्य की जानकारी मिलते ही स्वयं संज्ञान लेकर अपराधी को सजा देना . भारत में भ्रष्टाचार और गबन करने वाले वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सतत रूप से उच्च पड़ प्राप्त करते जाते हैं एवं मंत्री वर्षों तक अपने पदों पर जमें रहते है . गरीब और असहाय व्यक्ति की भांति न्यायव्यवस्था  मूक दर्शक बनी रहती है . यदि व्यवस्थापिका अथवा कार्यपालिका का पदाधिकारी भ्रष्टा-  चार करता है तो उन्हीं से यह आशा करना कि वे अपने साथी या अधिकारी को सजा दिलवाने के लिए कोर्ट लायेंगे, हास्यास्पद है . सीबीआई से यह आशा करना कि वह सत्तारूढ़ मंत्री या प्रधानमंत्री के विरुद्ध प्रकरण प्रस्तुत करे जो उसका निर्माता, पालक और  भाग्य विधाता है, कहाँ तक संभव होगा . इसीलिए १९८६ में हुए बोफोर्स कांड में ६४ करोड़  रूपये कमीशन खोरी की जाँच में सीबीआई ने २५० करोड़ व्यय करके लगभग २५ वर्ष मुकदमा चलाकर प्रकरण बंद कर दिया कि उसमें कोई अपराधी नहीं है . करोड़ों रुपयों का गोलमाल एवं बड़े आपराध करने वाले अपराधियों को कुछ हजार रुपयों का अर्थ दंड देना भी भारतीय न्यायव्यवस्था की बहुत बड़ी कमजोरी है .
५.    अन्य लोगों को भय अथवा क्षति न पहुंचाने की सीमा तक नागरिकों को स्वतंत्रता तथा समानता का अधिकार सुनिश्चित करना ताकि वे विधि सम्मत ढंग से कार्य करते हुए  अपने व्यक्तित्व का समुचित विकास कर सकें . कुछ बच्चों को आधुनिक शिक्षण संस्थाओं में मंहगी और अच्छी शिक्षा उपलब्ध है और अनेक ग्रामीण बच्चों को घटिया शासकीय विद्यालयों में पढ़ना पड़ता है जहाँ न व्यवस्थाएं होती हैं न शिक्षक और न कोई प्रेरणा . बड़े होकर वे किसी प्रतियोगिता में कैसे सफलता प्राप्त करेंगे ? यहाँ पर नौकरी में समानता का अधिकार बेईमानी हो जाता है . लोकतंत्र के मार्ग में ऐसी असमानताएं बहुत बड़ी बाधाएं हैं .म. प्र. में मेडिकल कालेजों का फर्जीवाड़ा सामने आ रहा है जहां प्रवेश परीक्षा में सफलता ही नहीं प्रथम स्थान प्राप्त करने के लिए एक अभिभावक ने ७५ लाख रूपये दिए . धन योग्यता से जीत गया . लोकतंत्र की सफलता के लिए इनकी निगरानी और नियंत्रण बहुत आवश्यक हैं . जांच एजेंसी ने कुछ भ्रष्टाचारियों को तो पकड़ा है परन्तु उन घाघ प्रशासकों और नेताओं का नाम भी नहीं लिया गया जिन्होंने चुन-चुन कर ऐसे भ्रष्ट अधिकारी अत्यंत महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किये थे और वे इनसे कितना लाभ कमा रहे थे .  १२०० शब्द 
६ . शक्ति पृथक्कारण : इस प्रकार भारत की संसदीय व्यवस्था में व्यवस्थापिका वही क़ानून बनाती है जिसे प्रधानमंत्री चाहता है और कहता है . यहाँ पर  दल बदल विरोधी क़ानून की आड़ में प्रधानमंत्री राजीवगांधी के कार्यकाल में ऐसा क़ानून पारित किया गया कि अब कोई भी सांसद या विधायक अपने दल के नेता के आदेशानुसार ही किसी क़ानून के पक्ष या विपक्ष में मत दे सकता है , वह  मतभिन्नता व्यक्त ही नहीं कर सकता।  जैसे अभी संसद में सांप्रदायिक हिंसा विरोधी क़ानून बनाया जाना है।  इसमें हिंसा के लिए बहुसंख्यकों को ही  दोषी माना  गया है . प्रधानमंत्री के कांग्रेस दल का  कोई भी सांसद , वह किसी भी धर्म का हो,  इस बिल से सहमत हो या न हो , इसका विरोध नहीं कर सकता और उसे संसद में  इस के पक्ष में अनिवार्य रूप से मतदान करना ही होगा तथा जनता में भी इसको सही ठहराना होगा . सभी दलों के नेता इसके लिए व्हिप जारी कर देते हैं।  इसका सीधा अर्थ हुआ कि देश की व्यवस्थापिका स्वतन्त्र न होकर  पूरी तरह कार्यपालिका के प्रमुख के अधीन है . जजों को वही निर्णय देने होते हैं जो संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार हों , उससे न्याय हो या अन्याय . दहेज़ के विरुद्ध  और भरण-पोषण के लिए बनाए कानूनों का भारी दुरूपयोग हो रहा है , जज भी समझते और जानते हैं परन्तु कार्यवाही तो उसी के अनुसार करनी होती है . इसके अतिरिक्त उच्चेवं सर्वोच्च न्यायालयों के अवकाश प्राप्त जजों को कार्यपालिका के प्रमुख अर्थात प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री विभिन्न आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्य भी बनाते रहते है . अतः वे भी इन बड़े नेताओं के विरुद्ध कठोर कार्यवाही करने से बचते हैं . इस प्रकार प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं कुछ हद तक न्यायालय की शक्तियां केंद्रित हो जाती हैं . यदि प्रधानमंत्री सर्वोच्च अदालत का आदेश मानने से इंकार कर दें तो न्यायालयों के पास उसका कोई उपचार नहीं है . लोकतंत्र की अध्यक्षीय प्रणाली में इसकि सम्भावना अपेक्षाकृत कम होती है .
       दूसरी समस्या राजनीतिक दलों के सामंतों की है।  भारत में राजनीतिक दल का प्रमुख ही बहुमत मिलने पर मुख्यमंत्री या प्रधान मंत्री बनता है . चुनावों में वही अपने दल के लिए उम्मीदवार तय करता है और चुनाव की टिकट  प्रायः धन लेकर बेची जाती है .  इससे दल के सभी सदस्य अपने दल प्रमुख या सामंत के पूरी तरह अधीन होते हैं  . परिणाम सवरूप उनका राजनीतिक दल और उसकी सम्पत्तियां उनकी निजी संपत्ति हो जाती हैं  और उसके अधिकार उसकी पत्नी एवं बच्चों को स्थानांतरित होते जाते हैं  . भारत का प्रजातंत्र इसीलिए पारिवारिक सामंतवाद में परिवर्तित होता गया है।  भारत के प्रजातंत्र में ये सामंत अपने परिवार को अधिकार देने का बड़ी निर्लज्जता से समर्थन करते हैं . वे कहते हैं कि डाक्टर का लड़का डाक्टर बनता है , उद्योगपति का लड़का उद्योगपति बनता है , अभिनेता का लड़का अभिनेता बनता है तो कोई आपत्ति नहीं करता है . इसलिए नेता का लड़का नेता बनता है तो क्या आपत्ति है ? यह उसका अधिकार है  .  ये सामंत उक्त उदाहरण देकर जनता को मूर्ख बनाते हैं क्योंकि वे यह बात छुपा जाते हैं कि डाक्टर,  उदयमी या अभिनेता का लड़का यदि असफल हुआ तो यह उनकी निजी क्षति होगी जबकि नेता का लड़का जितना दुष्ट होगा देश का उतना ही शोषण करेगा , भ्रष्टाचार करेगा और जनता को मुसीबत में डालेगा। ये बड़े नेता  अपने परिवार के सदस्यों को वहीँ से टिकट देते है जहां उनके समर्थक अधिक होते हैं ताकि वे जीत जाएँ।  इससे लोगों से जुड़े और उनकी समस्याओं को जानने वाले लोग पीछे रह जाते हैं तथा लोकतंत्र  सामंतवाद और तानाशाही में बदलता चला जाता है जिसमें न लोगों की इच्छाओं का महत्त्व होता है और न विचारों की स्वतंत्रता होती है . 
 इसलिए राजनीतिक ददलों के वे व्यक्ति जो मंत्री या उसके समकक्ष  उच्च पद प्राप्त कर लेते हैं, अपने राजनीतिक दल में किसी पद पर नहीं होने चाहिए  . व्यक्ति के पास सरकार से  या संगठन में कोई एक पद होना चाहिए  . एक ही व्यक्ति में विभिन्न की शक्ति केंद्रित होने पर तानाशाही होने लगती है  .
७  .  देश एवं राज्य के उच्च पदों जैसे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री , लोक सभाध्यक्ष, विधानसभाध्यक्ष, मुख्यमंत्री आदि एवं राजनीतिक संगठन के प्रमुख पदों पर किसी एक व्यक्ति का कार्यकाल ८ या १० वर्ष से अधिक नहीं होना चाहिए  . क्योंकि एक ही पद व्यक्ति के जमे रहने से वह  तानाशाही की ओर  प्रवृत्त  होने लगता है।  यह लोकतंत्र पर आघात है। 
८  . पार्टी के पदाधिकारियों तथा चुनाव के समय उम्मीदवार का चयन उस दल के सदस्यों द्वारा सर्व सम्मति या मतदान द्वारा योग्यता के आधार पर किया जाना चाहिए न कि हाई कमान द्वारा, जैसा  वर्त्तमान में भारत में हो रहा है  .  जब इनका चयन हाई कमान द्वारा होता है तो लोग पार्टी के मुखिया की चापलूसी करके  एवं धन देकर  इन्हें प्राप्त करते हैं जिससे योगयता पीछे रह जाती है अयोग्यता विभिन्न रूप धारण करके व्यवस्था को नष्ट कर देती है  . भारत की  अव्यवस्थाएं इन्हीं कारणों  से बढ़ती जा रही हैं  . 
९ . प्रत्येक स्तर पर मतदान करने की स्वतंत्रता एवं  निष्पक्षता होना  . भारत का निर्वाचन आयोग जनता द्वारा  मतदान में तो मतदान करने की यथासम्भव निष्पक्षता, स्वतंत्रता एवं गोपनीयता बनाने का प्रयास करता है परन्तु सामंतों के सामने दुबक जाता है  .राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभाध्यक्ष के चुनाव के समय या किसी बिल केलिए  सांसदों, विधायकों को अपने पक्ष में  व्हिप जारी करने का अर्थ है दूसरे के वोटों  पर कब्ज़ा करना और ये  वोट उनके  निजी वोट न होकर उस जनता के  होते  हैं  जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं  . यह लोकतंत्र नहीं तानाशाही  है  .  इस आपराधिक कृत्य के लिए समुचित दंड का प्रावधान होना चाहिए  . यदि सामंत सोचते हैं कि उनके बेईमान, भ्रष्ट और अपराधी सदस्य घूँस लेकर अन्य के पक्ष में वोट दे देंगे तो वे स्वयं  चरित्रवान बनें और नैतिकता रखने वाले लोगों को ही दल का सदस्य बनाएं, नैतिक लोगों को ही टिकट दें और नैतिकता पूर्ण कार्य करें  .  अपराधी लोगों को जन प्रतिनिधि बनाना और फिर तानाशाही के लिए व्हिप जारी करना लोकतंत्र पर सीधा प्रहार है  . 
 १०   . चुनाव पूर्व राजनीतिक दलों को अपने घोषणा पत्र  में यह स्पष्ट करना  कि आय कहाँ से प्राप्त करेंगे , कितनी प्राप्त करेंगे और कहाँ, कितना व्यय करेंगे . भारत में इन दिनों मुफ्त के मॉल बाँटने की घातक परम्पराएं प्रारम्भ हो गई हैं .  जिससे प्रत्येक  दल अधिक से अधिक सामान बाँटने की घोषणा कर रहे हैं जबकि कोष रिक्त हैं . दान देना  अच्छी बात है परन्तु बिना आय के लोग कितना व्यय बढ़ा सकते हैं ? यदि सत्ता हथियाने के लिए बिना आय के ऋण लेकर व्यय किये जायंगे   तो विकास कार्य अवरुद्ध हो जायगे  . देश में बेरोजगारी , मंहगाई बढ़ती जाएगी तथा मंदी का विस्तार होगा . इससे लोकतंत्र तानाशाही में परिवर्तित होने लगेगा क्योंकि धनाभाव में चुनी हुई सरकार कार्य कर ही नहीं पायेगी  . फासीवाद और नाजीवाद का उदय इन्ही कारणों से हुआ था .  
११ . सक्षम विपक्ष का होना .  विपक्ष ऐसा होना चाहिए जो गुण-दोष के आधार पर सत्ता पक्ष के कार्यों  का समर्थन अथवा विरोध करे  . उसके सुझाव राष्ट्रहित में होने चाहिए, निजी स्वार्थ के लिए नहीं। 

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