मंगलवार, 14 जून 2011

राज्यों के आवश्यक तत्व

राज्य के मुख्य एवं आवश्यक तत्व


श्री अटल बिहारी बाजपेई के कार्य काल में भारत - पाक सीमा पर दस माह तक दोनों देशों की फौजें आमने -सामने डटी रहीं . मीडिया ऐसे समाचार देता था की बस युद्ध होने ही वाला है . बिलासपुर ,छत्तीसगढ़ से मेरे मित्र प्रो खान ने एक दिन फ़ोन पर मुझसे पूछा कि युद्ध की क्या सम्भावना है .उसका भतीजा वायु सेना में अधिकारी है और उस समय उसकी पोस्टिंग सीमा पर ही थी . मैंने तत्काल उत्तर दिया ,''शून्य''. उसने आश्चर्य से पूछा ,''कैसे ?'' मैंने उसे समझाया,'' पाकिस्तान के महान मित्र अमेरिका के वायु यान पाकिस्तान के हवाई अड्डों पर खड़े हैं जो अफगानिस्तान के युद्ध के समय आये थे . भारत अमेरिका के हवाई जहाजों पर हमले करने का जोखिम नहीं उठा सकता है .१९७१ के युद्ध में भारत ने रूस के साथ युद्ध संधि कर ली थी की यदि हमारा किसी देश से युद्ध हुआ और शत्रु की ओर से कोई देश युद्ध में कूदेगा तो रूस उस पर आक्रमण कर देगा . उस समय अमेरिका ने बहुत हाथ -पैर मारे ,हिंद महासागर में अपना परमाणु -पोत भी ले आया था , परन्तु कुछ नहीं कर पाया . संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के विरुद्ध उनके प्रस्तावों को रूस ने वीटो से ख़ारिज कर दिया था. " उसे मेरी बात से संतोष हुआ और कुछ समय बाद दोनों देशों कि सेनाएं शांति पूर्वक वापस लौट गईं. आज की सारी समस्याएं राजनीतिशास्त्र के प्रारम्भिक सिद्धांतों को न समझने के कारण ही उत्पन्न हो रही हैं. राजनीति के भारतीय सिद्धांत के अनुसार राज्य का एक तत्व 'मित्र ' भी है . पाकिस्तान इसे समझता है ,इसलिए उसने अमेरिका और चीन जैसे दो शक्तिशाली मित्र बना रखे हैं , जबकि दुनिया में भारत का कोई भी पक्का मित्र नहीं है . हमें उस कमजोरी का खामिआजा आए दिन उठाना पड़ रहा है . मुझे उन लोगों की बुद्धिहीनता पर तरस आता है जो अमेरिका के भारत और पाकिस्तान के प्रति किये गए गए व्यवहारों की तुलना करते हैं तथा आलोचना भी करते हैं और ऊपर से कहते हैं कि अमेरिका गलत कर रहा है ! आप जैसा व्यवहार अपने प्रिय मित्र के साथ करते हैं क्या वैसा ही अन्य सब लोगों के साथ भी करते हैं ?
पाश्चात्य राजनीतिशास्त्री गार्नर एवं गैटल ने राज्य के चार तत्व निरूपित किये हैं : १. मनुष्यों का समुदाय (जनता ) , २. एक प्रदेश ,जिसमें वे स्थाई रूप से रहते हों ( भूभाग ) , ३ .एक राजनीतिक संगठन (अर्थात सरकार ) ,जिसके द्वारा लोगों की इच्छा अभिव्यक्त हो सके तथा उसे कार्य रूप में परिणित भी किया जा सके तथा ४. आंतरिक संप्रभुता और बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्रता .राजनीतिशास्त्र में देश को ही राज्य कहा जाता है . अतः राज्य के ४ अंग हुए :जनता , भूभाग या प्रदेश , सरकार और संप्रभुता .स्वतंत्रता के पूर्व भारत संप्रभु नहीं था , यहाँ के सारे निर्णय इंग्लैंड में लिए जाते थे अतः भारत एक राज्य नहीं था . स्वतंत्रता के बाद भारत और पाकिस्तान दो राज्य हो गए . जब बंगलादेश बना तो वह तीसरा राज्य हो गया . राज्य की इस अवधारणा के अनुसार राजनीतिशास्त्री को राज्य की स्थिरता या विस्तार से कोई लेना-देना नहीं है , उसका काम केवल उक्त चार तत्व गिनना है . उनके पूरे होते ही नया राज्य बन जाता है और वे उसका पृथक अध्ययन करने लगते हैं .रूस के २४ टुकड़े हो गए तो वे २४ राज्यों का अध्ययन करने लगेंगे . देश क्यों टूटा , ये चार मुख्य तत्व इसकी व्याख्या नहीं कर सकते हैं .
प्राचीन भारतीय राजनीतिशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार देश या राज्य को मनुष्य के शरीर के तुल्य मानते हुए उसके सात तत्व कहे गए हैं :१ राजा (मस्तिष्क) ,२. अमात्य अर्थात मंत्रिपरिषद् (आँखे) , ३.जनपद (भूभाग या प्रदेश तथा लोग ) (पैर) ,४.दुर्ग (हाथ) ,५.कोष (मुंह) ,६. बल या सेना (मन) ,तथा ७. मित्र (कान). देश के अंग भी शरीर के अंगों की भांति जीवंत माने गए है . ये कोई निर्जीव तत्व नहीं हैं . इसलिए एक भी अंग शिथिल होने पर देश भी शरीर की भांति रोगी होने लगता है .यदि आप इन अंगों को भली भांति समझ लेते हैं तो आपको वर्तमान अनेक समस्याओं के कारण और उनके निवारण के मार्ग स्वतः मिल जायेंगे .पाश्चात्य सिद्धांत से तुलना करने पर जनपद दो तत्वों -- भूभाग तथा जनता को निरूपित करता है , राजा एवं अमात्य सरकार के तुल्य हैं और किसी को राजा तभी माना जाता था जब वह स्वतन्त्र होता था अर्थात राजा संप्रभु होता था . उसमें बाद के चार तत्वों के तुल्य कोई विचार नहीं रखा गया है .परन्तु ये सभी आवश्यक तत्व हैं जैसा आपने भारत - पाक के संबंधों के बारे में प्रारम्भ में ही देख लिया . कुवैत का उदाहरण भी इन तत्वों के महत्त्व की पुष्टि करता है. कुवैत के पास बहुत धन (कोष) है , साथ ही उसने अमेरिका को अपना अच्छा मित्र भी बना रखा है . इराक ने कुवैत पर कब्ज़ा कर लिया था परन्तु अमेरिका से मित्रता तथा अच्छा कोष होने के कारण ही वह आज स्वतन्त्र देश है अन्यथा उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता और इनके अभाव के कारण इराक स्वयं गर्त में चला गया .
भारतीय राजनीतिक चिंतन का विषद वर्णन शुक्र नीतिसार , महाभारत , कौटिल्य के अर्थशास्त्र आदि ग्रंथों में किया गया है . उन्होंने उक्त प्रत्येक अंग की विशेषताओं की भी व्याख्या की है . राज्य का प्रथा अंग राजा है . राजा राज्य का स्वामी तथा दण्ड का धरनकर्ता होता था. राजा नीतिशास्त्र के अनुसार कार्य करने वाला , सत्यप्रिय, बुद्धिमान ,पवित्र तथा लोगों की भलाई करने वाला होना चाहिए . राजा राज्य के तुल्य या उससे बड़ा नहीं हो सकता . जैसे फ़्रांस का राज लुई xiv कहता था ,''मैं ही राज्य हूँ ''. भारत में आपातकाल के समय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की स्तुति करते हुए कहा था ,''indira is india & india is indira '' अर्थात '' इंदिरा ही भारत है और भारत ही इंदिरा है ''
जिसका अर्थ था कि यदि इंदिरा नहीं तो भारत भी नहीं . इस प्रकार के चापलूस जनता के बारे में सपने में भी नहीं सोच सकते . राजा को निश्चित मर्यादाओं तथा नियंत्रण में रहकर ही शासन करना होता था. वह भी दण्ड के नियंत्रण रहता था . दण्ड से अभिप्राय उस मर्यादा से है जो मनुष्य में अव्यवस्था के निवारण और अर्थ के सरक्षण के लिए स्थापित कि गई है .समाज में कर्तव्य- अकर्तव्य , गम्य-अगम्य ,धर्म -अधर्म कि जो मर्यादा है , जिसके द्वारा मनुष्यों कि स्वेच्छाचारिता नियंत्रित होती है , उसी को दण्ड कहते हैं. जनसाधारण कि तरह राजा, उसके मंत्री एवं समस्त अधिकारी भी उसी दण्ड के अधीन होते थे .दण्ड को राज्य कि रीढ़ मन जाता था .चाणक्य ने कहा है ,''यथा राजा तथा प्रजा '' अतः सबसे पहले राजा एवं मंत्रियों को मर्यादा का पालन करना होगा तभी लोग उसका अनुसरण करेंगे . जो राजा दण्ड कि मर्यादा का पालन न करे , उसे पदच्युत कर देना चाहिए . गार्नर ने भी कहा है कि सरकार को सीमाओं में रहकर लोगों कि इच्छाओं के अनुरूप कार्य करने चाहिए .पश्चिम एशिया के मुस्लिम तानाशाहों ने इस्लाम धर्म के अनुसार लोगो कि इच्छानुसार शासन तो किया परन्तु लोकहितों की उपेक्षा की , धर्म के अलावा भी उनकी कुछ इच्छाएँ और आवश्यकताएं हैं , उनपर कोई ध्यान नहीं दिया , परिणाम स्वरूप लोग संघर्ष के लिए बाध्य हो गए . उन देशों में अराजकता फ़ैल गई है .जो लोग चुपचाप अपना कम करने में व्यस्त थे , वे भी जिंदगी - मौत के बीच में फंस गए है और ये तानाशाह लोगों के गुस्से की कब बलि चढ़ जायेंगे , अभी कुछ नहीं कहा जा सकता . यदि ये शासक मर्यादाओं में रहकर कार्य कर रहे होते तो ऐसी स्थिति ही न उत्पन्न होती .
कौटिल्य अर्थशास्त्र में अमात्यों का वर्णन विस्तार से किया गया है . जिन्हें मंत्री नियुक्त किया जाना है उनमे उत्कृष्ट प्रज्ञा ,बुद्धि , स्मृति एवं बल होना चाहिए .वे अपने क्षेत्रों में निपुण , दूरदर्शी ,देश ,काल और अवसरों का अच्छी प्रकार प्रयोग करने में समर्थ,सम्मान और रहस्य को कायम रखते हुए परिहास करने की योग्यता से परिपूर्ण, आवश्यकतानुसार मधुर तथा कठोर संभाषण में सक्षम, लज्जायुक्त, व्यसनमुक्त, काम,क्रोध ,लोभ, जिद्द, चपलता तथा जल्द बाजी से रहित ,आत्मसंयमी तथा नीतिशास्त्र का पालन करने वाले हों . राजा उन्ही से पूछ कर कार्य करता है ,अतः राज्य की सम्पूर्ण व्यवस्था तथा विकास मंत्रियों पर ही निर्भर करता है . उनके गुणों को अच्छी प्रकार परख कर ही उनकी नियुक्ति की जानी चाहिए. जहाँ पर मंत्री उक्त गुणों से रहित मिलेंगे देश अराजकता की ओर बढ़ता जायगा .
राज्य के तीसरे तत्व जनपद के अंतर्गत राज्य के लोग तथा उसकी भौगोलिक सीमाओं से से घिरा भू भाग आते हैं .राज्य के भू भाग का विस्तार इतना होनाचाहिए की वह जनता का पालन करने में समर्थ हो . विपत्ति के समय विदेशी भी उसका आश्रय ले सकें . उसमें शत्रुओं से रक्षा करने के सब साधन हों ,उसकी जलवायु उत्तम तथा प्रदूषण रहित हो .उसमें खेत, चराहगाह ,जंगल, सिंचाई के लिए नहरें , कुँए आदि हों , खदानें हों थल तथा जल मार्ग हों ( उस समय वायु मार्ग नहीं थे ).जनता के नाम पर लोगों की भीड़ या संख्या ही पर्याप्त नहीं है .किसानों तथा कारीगरों में क्रियाशीलता ,लोगों में बुद्धि का होना (शिक्षित होना ), राज्य के प्रति प्रेम एवं भक्ति , और उनके आचरण में पवित्रता होनी चाहिए .
दुर्ग के नाम पर यद्यपि आज प्राचीन काल जैसे किले नहीं होते हैं , परन्तु सीमा पर बंकर एवं चौकियां बनाकर शत्रु की सतत रूप से निगरानी की जानी चाहिए छठे तत्व सेना से तात्पर्य सैनिकों की शारीरिक, मानसिक क्षमताओं के साथ-साथ आधुनिक युद्ध तकनीकों से भी है .शक्ति शाली सेना एवं चुस्त पुलिस से ही बाह्य एवं आंतरिक शांति स्थापित तथा स्थिर रह सकती है .
राज्य का पांचवां तत्व 'कोष' है . धन से ही सब कार्य होते हैं .अतः कोष का संवर्धन यत्न पूर्वक करना चाहिए .राज्य के कोष को इतना अधिक होना चाहिए की विदेशी आक्रमण , दुर्भिक्ष, भूकंप , बाढ़ , तूफ़ान ,महामारियों आदि के समय भी काम न पड़े . प्रशासन द्वारा विधि सम्मत ढंग से अर्थात जैसे भोंरा बिना क्षति पहुंचाए फूलों से रस गृहण करता है , उसी प्रकार लोगों से कर गृहण करे . लोगों द्वारा कर स्वेच्छा से दिया जाना चाहिए . राज्य का सातवाँ तत्व 'मित्र ' भी बहुत महत्त्व पूर्ण है जैसा पूर्व में कहा जा चुका है .
राज्य के तत्वों के सम्बन्ध में पाश्चात्य सिद्धांत के आधार पर निर्जीव राज्य का अध्ययन कर सकते हैं परन्तु भारतीय सप्तांग सिद्धांत के आधार पर उनकी व्यवस्था एवं स्थिरता की व्याख्या भी की जा सकती है . जैसे जनपद के अंतर्गत भूभाग तत्व का एक गुण 'उत्तम जलवायु 'कहा गया है . आज प्रदूषण तथा पर्यावरण का महत्त्व समझ में आ रहा है .प्रदूषण के कारण लोगों , जानवरों , वनस्पतियों का स्वास्थ्य कैसे अच्छा रह सकता है ? उत्तम जलवायु का विचार न करने के कारण दिल्ली में पहले अनेक उद्योगों को लगने दिया गया , बाद में उन्हें तत्काल बंद करने के आदेश दिए गए . वह मंदी का समय था ,उन्हें धन की कमी , विद्युत् संकट ,विदेशी सस्ते माल की चुनौती के कारण दूर स्थानों में पुनः लगाना आसान नहीं था .परिणाम स्वरूप हजारों लोग बेरोजगार हो गए या अर्थ संकट में फंस गए . जनपद के दूसरे अंग जनता का मुख्य गुण राज्य प्रेम एवं पवित्रता कहा गया है . जिनके घर उजाड़ गए हों उनसे किस देश प्रेम की आशा करेंगे ? पहले अधिकारी घूंस खाकर मकान बनवाते हैं , फिर अवैध करार दिए जाते है , उनके मकान तोड़े जाते हैं , लोगों को बेदखल किया जाता है . ये किससे प्रेम रखेंगे ? गंगा नदी में प्रदूषण होने दिया गया . अब सात हजार करोड़ रुपये लगाकर उसकी सफाई करने की योजना बनाई गई है जबकि पूर्व में भी अरबों रूपये व्यय किये जा चुके हैं . क्या देश ने पूर्व में इससे इतनी अधिक कमाई कर ली है किसात हजार करोड़ रूपये कि उधारी और उस पर ब्याज का भुगतान किया जा सके ? यदि प्रारंभ से ही उत्तम जलवायु और लोगों में राष्ट्र प्रेम का ध्यान रखा गया होता तो ये हालात पैदा न होते . मंत्रियों के नीति विरुद्ध आचरण एवं योग्यता के कारण देश में ऐसे हालात पैदा हो गए हैं जनता शासन को शत्रुवत मान ने लगी है और स्वेच्छा से कोई कर देने के लिए तैयार नहीं है . जनता में इस प्रकार धीरे- धीरे शासन के प्रति रोष बढ़ते जाने से बड़े प्रदेशों का विघटन होने लगता है , लोग बागी होने लगते हैं जिससे आने वाले समय में देश के विघटन कि स्थित भी उत्पन्न हो जाती है अथवा लोग विदेशी शत्रुओं से मिलकर भी राष्ट्र संकट उत्पन्न कर सकते हैं .
राज्य की भारतीय अवधारणा में दुर्ग एवं सेना दो पृथक तत्व रखे गए हैं . इसका अभिप्राय है कि देश कि रक्षा के लिए शक्तिशाली सेना के साथ दुर्ग या व्यूह रचना भी अच्छी होनी चाहिए .भारत के पास भारी-भरकम सैन्य शक्ति होने के बावजूद पाकिस्तानी सैनिकों ने कारगिल पर कब्ज़ा करलिया और इन्हें पता ही नहीं चला . बाद में घुस पैठिओं को निकलने के लिए भारत के सैकड़ों सैनिक शहीद हुए तथा अरबों रूपये युद्ध में व्यय हो गए , तनाव अलग से बना रहा . अतः सीमा पर मजबूत चौकसी होनी चाहिए .आज विश्व के देशों में जो भ्रष्टाचार , आतंकवाद जैसी समस्याएँ बढती जा रही हैं . सप्तांग राज्य के प्रथम दो तत्वों , राजा और मंत्रियों के वांछित गुणों कि तुलना वर्तमान सरकारों के मंत्रियों से करके देखे ,उनके कारण स्वतः स्पष्ट होने लगेंगे .


शनिवार, 11 जून 2011

कानूनों के दूरगामी प्रभाव

शत्रुता भुनाने के लिए क़ानून बनाना अनुचित

भारत में क़ानून बनाने वालों कि स्थिति दयनीय है . कानून सरकार बनाए या न्यायालयों के निर्णय हों , उनका उद्देश्य एक वर्ग को लाभ पहुँचाने के लिए दूसरे पक्ष को दण्डित करना होता है . अभी एटा ,उ.प्र. की एक अदालत ने आनर किलिंग में तीन लोगों को मारने के लिए १० लोगों को फांसी कि सजा सुनाई गई है . बड़े- बड़े दंगों और आतंकी हत्याओं के प्रकरण में भी इतने लोगों को फांसी कि सजा नहीं हो पाती है . लड़की को किसी प्रकार पटा लो और शादी कर लो , अब उनके माँ - बाप , रिश्तेदार क्या कर लेंगे ? यदि लड़की न माने तो उसको तेजाब से जलाने से लेकर हत्या के प्रयास करो या उनका एस एम् एस बनाकर प्रसारित कर दो . यदि युवकों को पता हो कि घरवालों कि सहमति के बिना विवाह नहीं होगा तो वे इतना आगे बढ़ेंगे ही नहीं . एक आशिक छात्र द्वारा भोपाल में लड़की से बदला लेने के लिए जिस प्रकार उसे और उसकी दो सहेलियों को सरे आम फ़िल्मी ढंग से कार से कुचला गया , न कुचला जाता. असामाजिक लोगों की मांग कि आनर किलिंग के लिए फांसी दो और अदालत का निर्णय ,युवकों को लाभ पहुँचाने के लिए तथा उनके माता- पिता तथा रिश्तेदारों को दण्डित करने का एक उदाहरण मात्र है . यह एक सामाजिक समस्या है .क़ानून के साथ ही ऐसी सामाजिक चेतना भी उत्पन्न की जानी चाहिए कि युवकों को ध्यान रहे कि उनके घरवालों कि सहमति के बिना विवाह मान्य नहीं होगा और अभिभावकों को समझ में आ जाए कि बच्चों की जायज मांग का आदर करना चाहिए तो समाज में वीभत्स घटनाएं रुक सकती हैं .
अनिवार्य एवं निःशुल्क बाल शिक्षा के लिए क़ानून बनाया गया है . उसकी कंडिकाओं का मुख्य उद्देश्य बाल शिक्षा न होकर प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों की व्यवस्था को चौपट करना प्रतीत होता है . कुछ निजी स्कूलों में पढ़ाई अच्छी होती है , उनका नाम है, प्रतिष्ठा है . उन्हें दंड देना इसलिए जरूरी हो गया है उनके नाम के सामने सरकारी स्कूलों को कोई पूछ नहीं रहा है .
नव वधूओं को दहेज़ के लोभी परेशान न करें ,इसके लिए जो क़ानून बनाया गया है उसका दुरूपयोग आधुनिक लड़कियां पति,सास,ससुर ,नन्द , जेठ ,देवर जैसे सम्बंधियो को जेल भिजवाने या ब्लैकमेल करने में धड़ल्ले से कर रही हैं . कोर्ट समझ भी जाते हैं परन्तु क़ानून किसी को बुद्धि का प्रयोग करने की अनुमति नहीं देता है.
अनुसूचित जातियों को उच्च वर्ण की यातनाओं से बचाने के लिए जो क़ानून बना है उसका भी भरपूर दुरूपयोग किया जाता है . किसी सेवा में यदि उनका उच्चाधिकारी उनके विरुद्ध कोई अनुशासन हीनता के कारण कार्यवाही करना चाहता है तो वे इस नियम का आश्रय लेकर उस अधिकारी को धमकाने या फंसाने में भी नहीं चूकते हैं . इस क़ानून के विरुद्ध उस अधिकारी को कोई सहायता नहीं कर सकता है वह अधिकारी भले ही कितना अच्छा हो .महिलाओं के विरुद्ध पुरुष अधिकारिओं द्वारा कार्यवाही करने पर भी ऐसे हालात उत्पन्न होने की सम्भावना बनी रहती है . इससे शासकीय विभागों की हालत खस्ता होती जा रही है .अनुशासन के अभाव में कामचोरी और भ्रष्टाचार सर्वत्र फैलता जा रहा है .परिणाम स्वरूप सरकार अपने विभागों को सुधारने के कठिन कार्य के स्थान पर उनका निजीकरण करती जा रही है . आने वाले समय में कलेक्टर ,कमिश्नर ,सचिव , मंत्री, मुख्य मंत्री , यहाँ तक कि प्रधानमंत्री और न्यायाधीश भी ठेके पर दिए जाने लगें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए . हमें भूलना नहीं चाहिए कि ईस्ट इंडिया कंपनी ऐसे ही ठेकों पर देशी रियासतों के राजा-नवाबों को नियुक्त करती थी और जब उनसे मन भर जाता था तो उसे बेदखल करके उनकी रियासत को कंपनी की संपत्ति बना लेते थे .१८५७ का संघर्ष उसी का परिणाम था . आज पुनः देश छोटा होता जा रहा है और लोग बड़े होते जा रहे हैं .इसलिए वे मनमाने ढंग से कार्य कर रहे हैं , उसे कोई भ्रष्टाचार कहे , नाकारा कहे , भूख हड़ताल करे या अपना सिर धुने ,बड़े आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ता है .
आज कुछ लोग कालाधन रखने वालों तथा भ्रष्टाचारिओं को फांसी देने या आजीवन कारावास देने एवं उनकी सारी संपत्ति जब्त करने की बात कर रहे हैं . आज जब यह सिद्ध हो रहा है कि जज भी भ्रष्ट हैं , पुलिस पर तो पहले से ही किसी को विश्वास नहीं है , तो पकड़े या पकडवाए गए लोगों को सजा कौन और कितने दिनों में दिलवा पायेगा जबकि आज देश कि अदालतों में ढाई करोड़ से अधिक प्रकरण लंबित हैं . इसलिए किसी भी क़ानून को बनवाने या बनाने में यह विचार सर्वोपरि रहनी चाहिए कि उससे न्याय एवं व्यवस्था स्थापित हो , उसका दुरूपयोग करने कि सम्भावना न हों तथा लोगों में परस्पर भ्रातृत्व भाव एवं एकता बनी रहे .

बुधवार, 8 जून 2011

अपने डेथ- वारंट पर हस्ताक्षर कौन करेगा !

अपने डेथ- वारंट पर हस्ताक्षर कौन करेगा !
मेरा प्रश्न अजीब लग सकता है परन्तु इसका उत्तर ढूंढना ही होगा . आजकल आन्दोलनों का बाजार गर्म है . बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलनों से देश आंदोलित हो रहा है . अन्ना जी चाहते हैं ऐसा लोकपाल बिल जो भ्रष्टाचार करने पर पटवारी से लेकर कैबिनेट सचिव तक और पंच से लेकर प्रधानमंत्री तथा उच्चतम न्यायालयों के जजों को फांसी पर लटका सके अथवा आजीवन कारावास की सजा दे सके . यदि गणितीय प्रमेय के आधार पर व्याख्या करें , तो यह मांग इसलिए उठाई गई है कि नीचे से ऊपर तक सब भ्रष्टाचार में लिप्त हैं .सारे सांसद भी लिप्त हैं , मंत्री भी लिप्त हैं . मान लिया सचमुच में सारे मंत्री लिप्त हैं . यदि ये बिल पास करवाएंगे तो सबसे पहले फंदे में लटकने का सौभाग्य भी इन्हीं को मिल सकता है . यदि ये अपना प्रायश्चित करने के लिए लटकने को तैयार भी हो जाएँ तो क्या बाकी मंत्री भी तैयार हो जायेंगे ? और अनेक भ्रष्टाचारी सांसद जिन्हें इस बिल को पास करना है, भी अपने डेथ -वारंट को स्वीकार कर लेंगे ? सभी कहेंगे कि यह शत प्रतिशत असंभव है . तो फिर अन्ना हजारे के लोकपाल बिल का क्या होगा ! यदि वे समझते हैं कि वे पटाकर , बहलाकर , फुसलाकर , धमकाकर मंत्रियों से अपनी बात मनवा लेंगे और वे इसमें सफल भी हो गए तो
क्या लोकपाल का जन्म हो जायगा !उसको जन्म देने वाले सांसद पहले ही भ्रूण हत्या कर देंगे और अभी जो कूद- कूद कर उनका समर्थन कर रहें हैं सबसे पहले इसके विरोध में खड़े हो जायेंगे .
बाबा रामदेव काले धन , विदेशों में जमा अवैध धन और भ्रष्टाचार के लिए आमरण अनशन पर हैं . जो कानून बनाने वाले हैं और जो बनवाने वाले हैं , उन्ही का पैसा विदेशों में जमा है . वे उसे राष्ट्रीय संपत्ति मानते , तो धन विदेशों में ही क्यों ले जाते ? पता नहीं किस -किस के हिस्से का धन बड़ी मेहनत से लूट कर उन्होंने अकूत संपत्ति बनाई होगी . वे कानून बना कर या बनने दे कर कंगाल होना चाहेंगे या फांसी पर लटकना चाहेंगे ? समाज में खोमचे वालों तथा परचून वालों से लेकर महान व्यवसायी, उद्योगपति तक नंबर दो का पैसा कमाने और उसे सहेज कर रखने में व्यस्त हैं . इसलिए ऐसी मांग रखना जो कभी पूरी ही न हो सके और उसके लिए आमरण अनशन करना सर्वथा आधारहीन एवं अनुचित है . जैसे किसी डाकू से सामना हो जाये , वह हमला कर देता है, किसी चोर को भागने का मौका न दें तो वह हमला कर देता है , किसी गुंडे- लुटेरे को लूटने से मना करें तो वह हमला कर देता है , किसी डान के क्षेत्र में कोई दूसरा वसूली करने लगे तो वह जान लेवा हो जाता है , वैसे ही बाबा के तम्बू में आधी रात में सोते हुए लोगों पर पुलिसिया लूट संपन्न हुई . बाबा को इसे भली भांति समझना चाहिए और ऐसी मांग नहीं करनी चाहिए जो संभव न हो या उन लोगों से नहीं करनी चाहिए जो इसके लिए सक्षम न हों . बाबा जी के विचार उत्तम हैं , राष्ट्र हित के प्रयास भी प्रशंसनीय हैं , परन्तु उनके क्रियान्वयन का ढंग सही नहीं है . मेरी बात समक्ष रख कर बाबा जी और अन्ना हजारे लोगों से पूँछें कि उसमें कितने प्रतिशत गलत है . यदि सभी लोग इसे सत्य माने तो वे उतना ही दबाव बनाएं जितना सामने वाला सह सके तथा व्यावहारिक रूप से कोई क़ानून बन सके . गांधीजी ने भी आन्दोलन किये परन्तु कभी ऐसी जिद नहीं की . वे अंग्रेजों को थोड़ा - थोड़ा कर के मनाते गए .गाँधी जी क्रमिक परिवर्तन की दिशा में बढ़ते गए . सन १९४२ के 'भारत छोड़ो ' आन्दोलन में भी उन्होंने सहजता का परिचय दिया . उसके ५ वर्ष बाद देश आजाद हुआ . राष्ट्रीय आंदोलनों में उन्होंने कभी अहम् को नहीं आने दिया . असफलता के पश्चात वे पुनः चिंतन करते और नवीन पथ खोजकर आगे बढ़ते गए . क्या बाबा रामदेव और अन्ना हजारे ऐसा नहीं कर सकते ? यदि उनके ये आन्दोलन उनकी जिद्द के कारण बिना किसी परिणाम के समाप्त हो गए तो इससे समाज की अपूरणीय क्षति होगी और आर्थिक अपराध सीना तान कर होने लगेंगे .
प्रो ए. डी. खत्री , चिन्तक, पत्रकार ,भोपाल



गुरुवार, 26 मई 2011

सेमेस्टर व्यवस्था में सुधार

सेमेस्टर व्यवस्था में सुधार
तीन वर्षों तक म.प्र. के युवाओं का भविष्य चौपट करने के बाद सरकार को लग रहा है की सेमेस्टर व्यवस्था में सुधार करना चाहिए . अप्रेल २००८ में बरकतुल्लाह विश्विद्यालय में सेमस्टर व्यवस्था पर चर्चा करने के लिए प्राचार्यों की बैठक की गई थी . उसमें मैं भी सम्मिलित था . मैंने कहा की जिस प्रकार ढेर सारे पेपर रख कर सेमेस्टर शुरू किये जा रहें हैं, इसमें तो साल भर परीक्षाएं होती रहेंगी , पढाई कब होगी ? मैंने कहा की विश्वविद्यालय छोटी -छोटी पी.जी. डी. सी.ए. जैसी परीक्षाओं के परीक्षा फल समय से नहीं दे सकता है तो इतने सारे परीक्षा परिणाम समय से कैसे देगा ? म. प्र. के उच्च शिक्षा आयुक्त आशीष उपाध्याय तथा प्रमुख सचिव श्रीमती स्नेहलता श्रीवास्तव , जो इस योजना को लागू करवाने के लिए कटिबद्ध थे , ने कुलसचिव से जब इसके बारे में पूछा कि कितने समय में परीक्षा करवा लेंगे तो उन्होंने कहा कि एक महीने में .सब देख रहें हैं कि प्रदेश के लाखों छात्रों का एक साल बर्बाद हो गया है . सरकार को चाहिए की छात्रों को न्यूनतम १००००रुपये प्रतिमाह के हिसाब से बर्बाद किये गए समय के लिए क्षतिपूर्ति करे क्योंकि यह सारा खेल शासन ने जानबूझ कर खेला है . अभी तक पांचवें सेमेस्टर के परीक्षा फल आये नहीं हैं , छात्रों ने विधिवत रूपसे छठवें सेमेस्टर में प्रवेश भी नहीं लिया है उनकी पढ़ाई कब होगी? बिना समुचित पढ़ाई के छठवें सेमेस्टर की परीक्षाओं की घोषणा भी कर दी गई है और यह भी तय है की सरकारी योजना के तहत अधिकांश छात्र बिना पढ़े अच्छे अंकों से पास भी हो जायेंगे परन्तु वर्तमान समस्या तो स्नातकोत्तर कक्षाओं में प्रवेश की है । विश्विद्यालय जिन्होंने छात्रों को सरकार के आदेश पर चक्रव्यूह में फंसाया है ,नवीन सत्र में प्रवेश तिथियों की घोषणाएं ऐसे कर रहे हैं जैसे उन्हें परीक्षा होने ,न होने या छात्रों के उपलब्ध न होने से उन्हें कोई वास्ता ही नहीं है । आश्चर्य की बात तो यह है प्रदेश के महामहिम राज्यपाल को विश्विद्यालयों का कुलाधिपति बने रहने का शौक तो है , परन्तु छात्रों की समस्याओं से उन्हें कोई मतलब नहीं है । उनका कार्य केवल विश्विद्यालयों में सजे -सजाए मंच पर विराज मान होकर उनके कार्यक्रम को गौरव प्रदान करना है । यदि वे प्रदेश की उच्च शिक्षा के प्रति अपना थोड़ा सा भी दायित्व समझते हैं तो वे वर्ष बर्बाद करने के लिए सम्बंधित अधिकारियों को छात्रों की क्षति पूर्ति का आदेश दें तथा विश्विद्यालय के कुलपतियों एवं महाविद्यालयों के प्राचार्यों को को क्लर्कों के चंगुल से मुक्त करें।
म.प्र. में शिक्षा का नियंत्रण क्लर्कों के हाथों में है . पाठ्यक्रम तैयार करवाने के लिए विभिन्न विश्विद्यालयों के प्राध्यापकों को भोपाल बुलाकर एक कमरे में बैठा कर उसी दिन काम पूरा करने के आदेश दिए जाते हैं जैसे वे टाईपिस्ट हों .न विचार न विमर्श . कम से कम इतना तो सोचना चाहिए की निर्धारित पाठ्यक्रम व्यावहारिक है या नहीं .अभी भी यदि प्रश्न पत्र कम करने के लिए वर्तमान में लागू दो प्रश्न पत्रों को एक किया जायगा तो पेपर बनाने में असुविधा आएगी . जहाँ तक कापी जांचने की बात है तो विश्विद्यालय उर्दू के शिक्षक से फिजिक्स , मैथ्स की कापी भी जंचवा लेगा .क्योंकि पढ़ कर कापी जांचने का समय अब नहीं रहा . जो शिक्षक बिना कापी खोले ऊपर नंबर भर देते हैं , विश्विद्यालय में उन्हें पसंद किया जाता है . परन्तु प्रश्नपत्र बनाने के लिए विषय का कुछ तो ज्ञान होना चाहिए . विज्ञान विषयों के साथ यह समस्या अधिक होती है . अतः पाठ्यक्रम इस प्रकार निर्धारित किये जाएं की परीक्षक पेपर आसानी से बना सकें . उदहारण के लिए आधार पाठ्यक्रम में तीन भाग होते हैं - १. सामान्य अध्ययन , २. हिंदी भाषा ३. अंग्रेजी भाषा . एक प्राध्यापक इस पेपर को कैसे बनाएगा ? पूर्व में इसके लिए तीन अलग-अलग पेपर दिए जाते थे . तीन पेपर देना और छात्रों से तीन अलग- अलग कापियां लेना असुविधाजनक होता है .इसमें यह सम्भावना बनी रहती है की हिंदी के बण्डल में कुछ कापियां अंग्रेजी या सामान्य ज्ञान की हो और इनके बण्डल में हिंदी की हों तो मूल्यांकन के समय प्राध्यापक यह कभी नहीं बताते और समझ आये या न आये कापी जाँच कर उसी विषय जैसे हिंदी में ही वे नंबर चढ़ा देते हैं .अतः इस बात का ध्यान रखना होगा की सेमेस्टर में एक विषय का पाठ्यक्रम एक ही पेपर में समाहित हो तथा एक विषय का एक सेमेस्टर में एक पेपर ही रखा जाय .वार्षिक परीक्षाएं प्रथक से न रखी जाएँ . जिन छात्रों को ए टी के टी देनी हो , उन्हें भी नए पाठ्यक्रम के पेपर ही दें ताकि किसी भी कक्षा में प्रश्न पत्रों की संख्या कम से कम रहे और समय पर परीक्षा परिणाम आ सकें . पूर्व में परीक्षा शुल्क के नाम पर छात्रों से भारी शुल्क वसूल किये गए हैं . अब पेपर कम होने से उनकी परीक्षा शुल्क भी कम की जानी चाहिए. छात्रों को लूटने और बर्बाद करने की नीति समाप्त की जाय और उनसे अपने बच्चों जैसा व्यव्हार किया जाय. पढने-पढ़ाने कि सुविधाएं दी जाएँ.
दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले वर्ष से सेमेस्टर सिस्टम की कवायद चल रही है . वहां व्यवस्था क्लर्कों के हाथ में न होकर प्राध्यापकों के हाथों में है . उन्होंने पर्याप्त सुविधाएँ तथा स्टाफ दिए बिना इसे लागू करने में असमर्थता व्यक्त की है . वहां आनर्स पाठ्य क्रम में प्रत्येक सेमेस्टर में ४ प्रश्न पत्र रखे गए हैं , म.प्र. जैसे ९ नहीं रखे गए . आतंरिक मूल्यांकन भी केवल एक होगा . वे इस बात का पूरा ध्यान रख रहें हैं की म. प्र. जैसे वहां पढाई चौपट न हो तथा परीक्षाफल विलम्ब से न आयें . वहां प्राध्यापक पाठ्य क्रम निर्धारित करने के लिए परस्पर चर्चा करते हैं क्योंकि वहां उन्हें आदेश देने के लिए कोई क्लर्क या कमिश्नर सोच भी नहीं सकता .
म.प्र.के उच्च शिक्षा विभाग में एक नए आयुक्त आये । कुछ कालेजों का दौरा कर आये । जो प्राचार्य , प्राध्यापक या कर्मचारी नहीं आये , उन्हें निलंबित करदिया या वेतन वृद्धि रोक दीं । चलो मान लिया यह तो अच्छा काम किया । परन्तु क्या उन्हें महाविद्यालयों कोई कमियां नजर नहीं आईं ? क्या वे स्टाफ की कमी को भी शीघ्र पूरा करेंगे ? क्या वे लैब, आफिस , भवन , फर्नीचर , पुस्तकालय की कमियों को भी पूरा करेंगे या अपने पूर्वगामी आयुक्तों की तरह आतंक का साम्राज्य फैला कर राज्य सड़क परिवहन निगम के समान उच्च शिक्षा व्यवस्था को भी और चौपट कर जायेंगे ? सत्र २००७-०८ तक झंडे से झंडे तक (१५ अगस्त से २६ जनवरी तक )कुछ पढ़ाई तो होती थी , अधिकांश परीक्षाएं समय पर होती थीं और परीक्षा फल भी लगभग समय पर आ जाते थे । अब अधिकांश जगह पढ़ाई तो है ही नहीं , परीक्षाएं जब मर्जी होती है करवा ली जाती हैं और परीक्षा परिणाम से तो किसी को कुछ लेना देना है ही नहीं ,इसलिए छात्रों का वर्ष ख़राब हो गया है । इसलिए उच्च शिक्षा के नए आयुक्त तथा प्रमुख सचिव यदि व्यवस्था सुधारने का संकल्प लेकर कार्य करेंगे , तोछात्रों का बहुत उपकार होगा ।







बुधवार, 18 मई 2011

कांग्रेस नीति

कानून के मछंदर

कर-नाटक भेजी रपट, गवर्नर तीरंदाज,
येदुरप्पा को हटा दें ,राष्ट्रपति महाराज .
राष्ट्रपति महाराज बनाएं ऐसे गवर्नर ,
राजनीति में तेज , कानून के महा मछंदर.
सोनियाजी खुश रहें ,ऐसे कुछ काम हैं करते,
प्रजातंत्र का गला , घोंटने में नहीं डरते .
राजनीति
राहुल गाँधी सीख रहे , राजनीति-कानून,
झूठ को सच साबित करें, गढ़ते ऐसे मजबून.
गढ़ते ऐसे मजबून,उपलों को चिता बताते,
मारे गए अनेक , हैं दुनिया को समझाते .
यह युवराज बनेगा , कल को जिसका नेता,
धुनेगा अपना शीश , जीवन में रहेगा रोता .
डा.ए.डी.खत्री , भोपाल

बाबा रामदेव का अनशन

बाबा रामदेव आमरण अनशन न करें

बाबा रामदेव ४ जून से दिल्ली में आमरण अनशन करने की घोषणा कर चुके हैं . मेरा आग्रह है की ऐसा करना उनके लिए व्यक्तिगत रूपसे तो क्षतिकारक होगा ही , समाज और देश के लिए विपरीत प्रभाव उत्पन्न करने वाला होगा . कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने भी उन्हें ऐसी ही सलाह दी है .उनकी सलाह या विचार वही होते हैं जो सोनिया जी तय करती हैं . संभव है बाबा उनकी बात की उपेक्षा कर दें और अनशन शुरू कर दें , परन्तु यहाँ पर उनको भी एक अच्छे कार्य का श्रेय देने में भलाई ही है .
बाबा रामदेव अन्न्हाजारे जी के उपवास के धोखे में न रहें . संयोग और भाग्य से अन्ना हजारे जी ने ऐसे वक्त उपवास रखा था जब ५ राज्यों में चुनाव हो रहे थे . भ्रष्टाचार के आरोपों का कांग्रेस सामना कर ही रही थी कि उनके उपवास से कांग्रेस पर प्रहार और तेज हो गए . मीडिया को भी कांग्रेस को हराने का वज्र मिल गया और उसने जम कर प्रहार करने शुरू कर दिए. उस समय मीडिया के सामने भ्रष्टाचार नहीं ,कांग्रेस की हार मुख्य मुद्दा था . कांग्रेस के सामने अन्नाहजरे की मांगें पूरी करने के अतिररिक्त कोई रास्ता ही शेष नहीं था . सोनिया जी की राजनीतिक बुद्धि बहुत तीव्र है . वे इंदिरा गाँधी से भी अधिक विचार शक्ति रखती हैं . इसलिए विदेशी होने के हो-हल्ले के बावजूद देश की सवा अरब आबादी को उन्हें देश का नेता स्वीकार करना पड़ा . उनकी यह बुद्धि उनके स्वयं की विचार शक्ति से है अथवा देशी-विदेशी योग्य सलाहकारों के कारण , यह महत्त्व पूर्ण नहीं है . महत्वपूर्ण है उनका सही समय पर सही निर्णय लेना. भारत का इतिहास साक्षी है की पूर्व में भारतीय राजाओं के समयानुकूल निर्णय न लेने के कारण ही देश गुलाम होता गया. सोनिया जी ने जब देखा की उपवास के कारण प्रतिदिन कांग्रेस का वोट बैंक तीव्रता से गिरता जा रहा है तो उन्होंने सब बातों में हाँ-हाँ कह दी . यदि उपवास जारी रहता तो कांग्रेस को भारी हानि उठानी पड़ती. अन्ना हजारे को साथ लेने से कांग्रेस को कुछ सीटें भी मिल गईं क्योंकि उससे जनता में यह सन्देश गया कि कांग्रेस भ्रष्टाचार के विरुद्ध है . इससे कांग्रेस के परम्परागत वोट बच गए . दूसरी ओर कांग्रेस अन्ना हजारे को कुछ दे तो रही नहीं थी . सिर्फ लोकपाल के लिए कानून बनाने में गति लाने का वायदा करना था . यदि उनकी सलाह पर मंत्रिमंडल उन्हीं का मसौदा स्वीकार कर ले तो भी कानून तो लोक सभा और राज्य सभा द्वारा पास किया जाना है . यदि सांसद कानून के प्रावधानों पर को बदलने के लिए कहेंगे तो उसे कौन रोकेगा ? जो लोग लोकपाल को सुप्रीम कोर्ट से भी शक्तिशाली बनाने कि बात करते हैं ,उन्हें संविधान का कोई ज्ञान नहीं है . सुप्रीम कोर्ट यदि ऐसे एक भी कानून को स्वीकार कर लेता है तो आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट का नाम और काम दोनों समाप्त हो जायेंगे . जब सुप्रीम कोर्ट के जज स्वयं ही लोकपाल के सामने खड़े रहेंगे तो वे काहे के सुप्रीम कहलायेंगे ? वर्तमान परिस्तिथियों में यह संभव नहीं लगता है .इसलिए सोनियाजी ने हाँ कर दी.
इंदिराजी को हटाने के लिए जब जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा देकर आन्दोलन प्रारंभ किया था , उनकी मांग मानना तो दूर, आपातकाल लगाकर जयप्रकाश नारायण के साथ समूचे विपक्ष को ही जेलों में ठूंस दिया गया था . जब जप्रकाश जी की हालत बहुत ख़राब हो रही थी तो चुपचाप उनके अंतिम संस्कार की तैयारी भी कर ली गयी थी .आपात कल के बाद उस समय तो कांग्रेस हार गयी थी , परन्तु शीघ्र ही पुनः उसे सत्ता में बैठा दिया गया . और तो और उस समय विपक्ष के जिन नेताओं को जेल में यातनाएं दी गयी थी , उनमें से अनेक नेता भी कांग्रेस के भारवाहक हो गए . लोग सब कुछ जल्दी ही भूल जाते हैं , सोनिया जी को सब याद है . इसलिए उन्होंने ऐन चुनाव के समय मुसीबत को सफलता पूर्वक टाल दिया. यह कार्य पक्ष-विपक्ष का कोई अन्य नेता सोच भी नहीं सकता था .
परन्तु बाबा रामदेव की मांग पूरी करना संभव नहीं है . जिस जानकारी को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को भी देने से इनकार कर दिया , बाबा को वह जानकारी कैसे दे देंगे ? सबसे बड़ा बहाना तो प्रकरण का न्यायालय के विचाराधीन होना है . बाबा की मांग ही असंवैधानिक कही जायगी .जब नाम ही पता नहीं चलेंगे तो विदेशों में जमा धन को लाने का काम बाबा कैसे पूरा करवाएंगे . यदि बाबा जिद पर अड़े रहे और हड़ताल पर बैठ ही गए तो वह और उनके साथी भूख से अस्वस्थ तो होंगे ही , सरकार उन्हें जेल भेज देगी और जबरन अनशन तुडवा देगी . इससे बाबा की प्रतिष्ठा को भारी धक्का लगेगा और भ्रष्टाचार के विरुद्ध एकजुट हो रहे लोगों का मनोबल गिर जायगा . बाबा तम्बू तानें , भयंकर गर्मी के दिन हैं , खूब खा-पीकर ३ से ७ दिनों का विरोध प्रदर्शन करें , सरकार और न्यायालय पर सामाजिक दबाव बनाएं कि सरकार कम से कम कोर्ट में चोरों के नाम बताए . यदि बाबा इसमें असफल रहेंगे तो भी कांग्रेसी सरकार की प्रतिष्ठा दांव पर रहेगी और यह उनकी सफलता होगी . बाबा अपनी घोषणा को झूठी प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाएं .स्वर्णिम म. प्र. के चतुर सुजान मुख्य मंत्री श्री शिव राज सिंह चौहान को जब उन्हीं कि पार्टी के लोगों ने घेरकर किसानों के वास्ते आमरण अनशन के लिए पटा लिया था तो उन्होंने ने भी अपने कार्य कर्ताओं को खुश करने के लिए करोड़ों रूपये खर्च करके आलीशान तम्बू तनवा दिया और बड़ी श्रद्धा से पार्टी अध्यक्ष प्रभात झा का आशीर्वाद लिया , तिलक करवाया , तम्बू में प्रवेश किया और तत्काल बाहर निकल आये जैसे हनुमानजी सुरसा के पेट का भ्रमण करके निकल आये थे . यदि वे उपवास प्रारंभ कर देते तो उन्हें कोई अधिकारी या कार्यकर्त्ता जबरन जेल लेजाकर राशन- पानी देने का विचार ही न कर पाता और उनकी कुर्सी क्या जीवन का संकट उत्पन्न हो जाता . आज उनका मान-सम्मान पहले से भी अधिक है .अतः बाबा रामदेव आमरण अनशन जैसे अव्यवहारिक विचारों को त्याग कर लोक शक्ति का संगठन एवं संवर्धन करते रहें तो देश का अधिक भला होगा .
डा. ए. डी. खत्री

मंगलवार, 17 मई 2011

अनिवार्य एवं निःशुल्क बाल शिक्षा

अनिवार्य एवं नि :शुल्क बाल शिक्षा
स्कूल व्यवस्था नष्ट न करें

अनिवार्य एवं नि :शुल्क बाल शिक्षा का अधिनियम इतनी विसंगतियों से युक्त है. अधिनियम में प्रवेश , व्यवस्था , प्रबंधन , शिक्षक , पाठ्यक्रम आदि सभी अवधारणाएँ अस्पष्ट हैं .प्रदेशों के शिक्षा अधिकारी और नेता उनकी मनमाने ढंग से व्याख्या कर रहे हैं.म.प्र. में २५% की दर से १०००० स्थान नि:शुल्क शिक्षा के लिए निर्धारित हुए . इन पर लाटरी के द्वारा प्रवेश दिया गया . ५००० सीटें रिक्त रह गईं . इन्हें भरने के लिए प्रवेश तिथि १६ जून तक बढ़ा दी गई है . प्रदेश में हजारों शिक्षकों , प्राध्यापकों ,चिकित्सकों , इंजीनियरों , पुस्त्काल्याधाक्षों , क्रीडा अधिकारिओं ,लिपिकों आदि के पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं . सरकार को उनकी कोई चिंता नहीं है क्योंकि किसी भी कार्य को अच्छी प्रकार करने की उसकी कभी मंशा ही नहीं रही है . निजी विद्यालयों पर दबाव डाला जा रहा है .यह दबाव उन शिक्षा अधिकारियो के माध्यम से डाला जा रहा है जो प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था बर्बाद कर चुके हैं . कुछ विद्यालय अपवाद हो सकते हैं परन्तु अधिकांश विद्यालयों की हालत और प्रतिष्ठा इतनी है कि मजदूरी एवं घरों में झाड़ू -पोंछा लगाकर गुजारा करने वाले लोग भी उधर झांकना तक पसंद नहीं करते हैं . यदि सरकारी स्कूल अच्छे होते तो निजी स्कूलों का अभिभावकों पर दबाव न होता .शिक्षा के नए अधिनियम के मानदंडों पर १०% सरकारी स्कूल भी खरे नहीं उतरेंगे , परन्तु इन नियमों के माध्यम से निजी स्कूलों का जम कर शोषण और भ्रष्टाचार करने से इनकार नहीं किया जा सकता है.
आज सरकारी एवं निजी स्कूलों अथवा महाविद्यालयों में परिवार , समाज, देश जैसी कोई अवधारणा शेष नहीं रह गई है . एक ही विचार बचा है कि क्या करें, कैसे पढ़ें कि अधिकतम धन कमाया जा सके . कुछ निजी विद्यालय इस उद्देश्य कि पूर्ति भी कर रहे हैं . इसलिए अभिभावक अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े . अब सरकारें उन्हें भी नष्ट करने पर तुल गई हैं . निजी विद्यालय प्रवेश दे रहे हैं ,इस आशा से कि सरकार उन गरीब बच्चों की फ़ीस देगी . सरकार फीस देगी या नहीं देगी , देगी तो कितनी देगी और कितनी घूंस लेकर देगी यह तो बाद में पता चलेगा . वर्तमान समस्या तो उन गरीब बच्चों की है जिन्हें जैसे भी हो अच्छे विद्यालयों में प्रवेश मिल गया है . प्रथम समस्या उनकी पुस्तकों - कापिओं ,स्टेशनरी ,ड्रेस तथा आवागमन कि सुविधा देने की है . यदि अभिभावक ये व्यवस्थाएं करने में सक्षम होंगे तो वे गरीब कैसे माने जाएँगे ?.उस स्थिति में उनका गरीबी का राशन कार्ड भी छीन लिया जायगा .गरीब के नाम पर दिया गया प्रवेश भी रद्द किया जा सकता है . अतः अभिभावक ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे. जब ये प्रदेश सरकारें पहली से बारहवी तक के छात्रों को मुफ्त में ड्रेस , किताबें , सायकिले , भोजन , चप्पलें आदि दे सकती है , तो इन गरीब, थोड़े से बच्चों के लिए कंजूसी क्यों करना चाहती हैं ? यह उनका दायित्व है और उन्हें ही पूरा करना होगा . जिन बच्चों के प्रवेश विलम्ब से होंगे , उनका पिछड़ा हुआ कोर्स पूरा करवाने का दायित्व भी इन कल्याणकारी सरकारों का है , उनके अफसरों का है जो बड़ी लगन से उनकी अच्छी शिक्षा के लिए जुटे हुए हैं . यदि ऐसा नहीं किया गया तो गरीब बच्चों और उनके अभिभावकों में तनाव उत्पन्न हो जायगा जो बहुत घातक होगा . यदि सरकारों का सारा श्रम इन बच्चों का बोझ निजी विद्यालयों पर डालने का है , तो अपनी आर्थिक क्षति पूर्ति तो वे अन्य बच्चों के अभिभावकों से जबरन कर लेंगे . पर पढ़ाई का क्या होगा ? कक्षा में शिक्षक क्या एक चौथाई बच्चों की उपेक्षा करते हुए शेष बच्चों को पढाएंगे या अच्छे बच्चों की उपेक्षा करके , जो ढेर सारी फीस दे रहे हैं , कमजोर बच्चों के पीछे पड़े रहेंगे और अपना सिर धुनेंगे. यदि सरकार इन बच्चों के साथ भी सरकारी बच्चों जैसा व्यव्हार करेगी , वे बिना ड्रेस के आयेंगे ,तो प्रबंधन उनका क्या कर लेगा ? जो नहीं पढ़ पाएंगे ,होम वर्क नहीं कर पाएंगे , शिक्षक बेचारे उनका क्या कर लेंगे ? जो टेस्ट में फेल हो जाएंगे या टेस्ट देंगे ही नहीं अथवा परीक्षा ही नहीं देंगे , उन्हें किस नियम के तहत अगली कक्षा में जाने से रोका जा सकेगा . सरकारी नौकर तो झूठे रिकार्ड बनाने में माहिर हैं , क्या इन निजी विद्यालयों के शिक्षकों एवं प्रबंधन को भी उसी रास्ते पर धकेला जायेगा जिस पर सरकारी स्कूल चल रहे हैं ? क्या इसे देख कर ऐसा नहीं लगता कि देश में शिक्षा के जो थोड़े से केंद्र बचे हैं ,ये सरकारें उन्हें भी नेस्त -नाबूत करके छोड़ेंगी .
डा. ए. डी.खत्री