मंगलवार, 13 अगस्त 2013

पटना साहिब एवं बैजनाथ धाम

हमने यह यात्रा मार्च के अंत में की थी . हम भोपाल से इटारसी और वहां से पटना पहुंचे . पटना जंक्शन पर सामने ही पटना साहिब जाने वाली ट्रेन खड़ी थी .  हम दूसरी तरफ से उस ट्रेन में चढ़ गए और २० मिनट में पटना साहिब स्टेशन पहुँच गए . वहां रिक्शे से हम  पटना साहिब गुरुद्वारे गए . हम वहां पहली बार गए थे . कोई जानकारी नहीं थी . रिक्शे वाले ने हमें उनके काउंटर तक पहुंचा दिया जहाँ हमने गुरुद्वारे में ही एक वी आई पी कमरा ले लिया . किराया है २०० रुपये . अच्छे , खुले, बड़े  कमरे  हैं .  
      पटना साहिब सिखों के ५ बड़े तीर्थ स्थानों में से एक है . वहां सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ था . प्राचीन गुरुद्वारा है परन्तु शहर उससे भी बहुत प्राचीन है . अतः उसमें अपेक्षा कृत कम स्थान है और घनी आबादी में है , सड़कें संकरी हैं . नहा- धोकर हमने दरबार साहिब में दर्शन किये , प्रसाद ग्रहण किया . उसके बाद हमने लंगर छका . गुरुद्वारे में हमने म्यूजियम देखा . उसमें सिख इतिहास को चित्रों एवं उनके नीचे लिखी टिप्पणी द्वारा बहुत सहज तरीके से जीवंत किया गया है . उसे देखकर सिख धर्म की कुर्बानियों ,सेवा भाव तथा जन कल्याणकारी कार्यों को अच्छी प्रकार समझा जा सकता है . दरबार साहिब में हमने गुरु गोबिंद सिंह जी के अस्त्र- शस्त्रों के भी दर्शन किये .
       दूसरे दिन हम गुरुद्वारे की बसों से निकटवर्ती चार प्रमुख अन्य गुरुद्वारों में भी गए . प्रत्येक गुरुद्वारे का अलग इतिहास है . उसे जानकर सिख गुरुओं के महान कार्यों को समझा जा सकता है . बस यात्रा लगभग ४ घंटे की थी . बस में बैठे हुए हमने पटना शहर भी देख लिया जो अन्यथा संभव नहीं था . हम प्रातः गुरुद्वारे से नाश्ता करके निकले थे , लौट के आये तो लंगर का प्रसाद लिया और वहां से स्टेशन के लिए प्रस्थान किया .

                          बैजनाथ धाम

   पटना साहिब स्टेशन से हम ट्रेन द्वारा जसीडीह के लिए चल पड़े . बैजनाथ धाम स्टेशन से कितना दूर है , रात्रि में वहां जाने के लिए कोई  वाहन वहां मिलेगा या नहीं , रात्रि में रास्ते में लूट- पाट  तो नहीं होती है, जैसे अनेक प्रश्न दिमाग में दौड़ रहे थे . ट्रेन में हमारे सहयात्री रवि भूषण तथा उनका परिवार था . उन्होंने हमें आश्वस्त किया कि वहां बहुत साधन मिलेंगे और कोई चिंता की बात नहीं है .रात्रि ९ बजे जब हम जसीडीह स्टेशन पर उतर कर बाहर आये तो वहां बहुत चहल-पहल थी .बाहर अनेक ऑटो रिक्शा और शेयर ऑटो रिक्शा खड़े थे . वे देवघर के लिए आवाजें लगा रहे थे . बैजनाथ धाम जिला देवघर का मुख्यालय है . वहां  देवघर रेलवे स्टेशन भी है जहाँ से प्रातः ६ बजे से रात्रि १०  बजे तक लोकल ट्रेन कई चक्कर लगाती है .वहां का केन्द्रीय स्थान लाईट टावर है जो स्टेशन से ३-४ सौ मीटर दूर होगा . वहीँ पास में बस स्टैंड भी है .  रवि भूषण उसी क्षेत्र में एक कंपनी में अधिकारी हैं . उन्हें लेने गाड़ी आई तो उन्होंने हमें भी बैठा लिया और रास्ते में बैजनाथ धाम में होटलों के मध्य लाईट टावर चौक में उतार दिया .
  वहां  आस – पास के होटल या तो भरे हुए थे या  मंहगे थे . हमने एक रिक्शे वाले से कहा तो वह हमें थोड़ी दूरी पर एक होटल में ले गया . हमारे कमरे में प्रवेश करते ही एक बुजुर्ग पंडा आ गया . वह हमें दूसरे दिन मंदिर दर्शन कराने ले जाना चाहता था . पंडों के नाम से ही पसीने छूटने लगते हैं कि पता नहीं क्या गुल खिलाएंगे . हमने उससे कहा कि हम स्वयं दर्शन कर लेंगे , उसकी आवश्यकता  नहीं है . वह चला गया . प्रातः हम तैयार हुए कि वह सामने आ गया और बोला कि वह हमें दर्शन करवाएगा . हमारे मना करने पर भी वह हमारे साथ मंदिर तक चलता गया . मंदिर एक-डेढ़  किलोमीटर दूर होगा. लाईट टावर से एक किमी होगा . चौक के आगे सकरी सड़क है . रिक्शा एवं ऑटो वहां तक आते-जाते रहते हैं . वहां के मावे एवं पेड़ों का स्वाद अच्छा है . हमें दूरी का अंदाज नहीं था .हमें लगा कि मंदिर पास में ही होगा अतः हम पैदल चलते गए . पंडा साथ चल ही रहा था .रास्ते में और पण्डे भी मिले परन्तु एक पण्डे को साथ देखकर वे कुछ नहीं बोले . यदि वह साथ न होता तो दूसरा पंडा पकड़ लेता अर्थात बिना पण्डे के मंदिर में प्रवेश असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है . 
    मंदिर परिसर में  प्रवेश करते ही वह सक्रिय हो गया .यहाँ जूते- चप्पल उतारो , यहाँ से फूल लो , यहाँ से गंगा जल लो . जब हमने गंगा जल के दाम पूछे तो विक्रेता ने बताया २५ रूपये में करीब १०० मिली और वह भी साफ़ नहीं था . मैंने पण्डे से कहा कि हम इसे नहीं लेंगे , जल से अभिषेक करेंगे . पण्डे ने कहा कि जल से अभिषेक नहीं कर सकते तो हमने कहा कि हम बिना अभिषेक के ही दर्शन कर लेंगे . पंडा हमें किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था . खत्री जी ने उससे कहा कि हम उसे २१ रुपये दक्षिणा देंगे , वह तैयार हो गया . उसने हमें तत्काल एक युवा पण्डे के हवाले कर दिया .
   प्रातः ९-१० बजे  के मध्य का समय था . उस दिन कोई ज्यादा भीड़ नहीं थी . १०० लोग भी नहीं थे . वहां पंक्ति बनाने के लिए रेलिंग नहीं है . धक्का- मुक्की ही एक सहारा है . उस युवा पण्डे ने खत्री जी से कहा कि अपनी दोनों बाहें सामने करे , मुझे कहा कि मैं उसकी ओर मुंह करके दोनों बाँहों के बीच में खड़ी हो जाऊं . फिर उसने भी अपने हाथ लम्बे करके खत्रीजी कि बाँहों को पकड़ लिया और खत्री जी ने उसकी बाहों को . कुल मिलाकर ऐसा दृश्य बना जैसे खत्रीजी गाड़ी हों , मैं सवार और पंडा उसे खींचने वाला . हम देश में सभी ज्योतिलिंगों के दर्शन कर चुके हैं . यह नया तरीका हमने बैजनाथ धाम में देखा . वह हमें घसीट कर भीड़ में ले जानी लगा . पहली किश्त में अन्दर बरामदे तक ले गया और दूसरी में मंदिर के अन्दर . मंदिर में जाने – आने का एक छोटा सा द्वार है . वहाँ रोक थी . गर्भ गृह खाली होने के बाद अन्दर जाने देते हैं . हम अन्दर गए तो पैर बड़ी कठिनाई से रखे हुए थे . जितने लोग ठूंस सकते थे अन्दर ढूंस दिए . पण्डे ने हमें दीवार से सटा  के खड़ा कर दिया कि चलने की जगह बने तो ज्योतिर्लिंग तक ले चलें . ५ मिनट में हिलने- डुलने लायक जगह हो गई . गेट पर खड़ा एक व्यक्ति हाथ में मोटी प्लास्टिक तीलियों से बना एक पतला झाडू नुमा बंच लेकर सबको आगे हांक रहा था . हम दो थे , किसी समूह में ४, ६ या ज्यादा लोग भी हो सकते हैं . जब सबको एक साथ खींचा जायेगा तो धक्का – मुक्की होनी ही है . यदि वहां पंक्ति व्यवस्था होती तो समय भले ही कुछ ज्यादा लगता परन्तु सबको अच्छे से दर्शन हो जाते . धक्कों के कारण लोग प्रसाद के डब्बों को , जल के लोटों को ऊपर करके छलकते हुए ले जा रहे थे . धक्कों में बच्चे. बड़े ,बूढ़े, स्त्रियाँ सभी आनंद ले रहे थे . प्रवेश करने से पूर्व पण्डे ने समझा दिया था कि पाकेटमारों से सावधान रहना . बहरहाल हमने ज्योतिलिंग के दर्शन किये , पण्डे ने फूल अर्पित करवा दिए , पूजा करवा दी , दो मिनट लगे होंगे . रेले से बाहर आ गए .
      बाहर आकर बुजुर्ग पण्डे को तय २१ रूपये दिए , वह चुप था , हमने १०० रूपये और दिए और युवक को भी २१ रूपये दिए . उसने विवाद नहीं किया . बाद में उसने बताया कि दोपहर बाद भीड़ नहीं होती है . खत्रीजी की भांजी और दामाद दो वर्ष पूर्व गए थे , उन्हें बिना किसी परेशानी के अच्छे से दर्शन हो गए थे. फिर पण्डे ने कहा कि उनके संघ को भी दान देना होता है . हम उसके साथ गए , वहां हमने ५१ रूपये दिए . किसी ने इस पर कहीं  विवाद नहीं किया . परन्तु ओंकारेश्वर में एक पण्डे ने कुछ न लेने की  बात पर शार्टकट ४-५ मिनट में पूजा करवा दी और १०१ रूपये लेकर ब्राह्मण भोजन के नाम पर १००० से ५०० रुपयों की मांग करने लगा और झंझट करने लगा .अतः मन में भय बना रहता है कि पता नहीं बाद में ये क्या करेंगे.
    हमने उसी परिसर में स्थित अन्य  मंदिरों में भी दर्शन किये . हर मंदिर और मोड़ पर पण्डे हाथ फैलाए दक्षिणा मांग रहे थे भले ही कोई एक रुपया दे  .कुछ  हिन्दू लोग बहुत बड़े भक्त होते हैं . वे चाहे – अनचाहे सभी मूर्तियों को नहलाते जाते हैं जिससे परिसर में चारों ओर किच-किच मची रहती है. साफ-सफाई की फुर्सत किसे है ? बस सबको पैसा चाहिए .दर्शन करके हम बाहर आये और रिक्शे से चौक तक आ गए . वहां ऑटो या रिक्शे के रेट  ढीक हैं , कभी थोड़ा मोलतोल करना पड़ता है .चौक पर एक ही ठीक स्थान दिखा जहां हमने भोजन किया . उसके बाद हमने एक ऑटो किया आसपास के स्थानों को दिखने के लिए . वह ६०० रूपये मांग रहा था हमने ५५० कहा .हमें तो वहां के किसी स्थान या दूरी का पता था नहीं , उसके विश्वास पर घूमने चल पड़े .
   देवघर से ४५ किमी दूर वासुकी नाग मंदिर है . परिसर में अन्य मंदिर भी हैं . वहां भी वैसी ही अव्यवस्थाएं तथा गंदगी है . बाहर चढ़ाने के लिए अनेक चीजें मिलती रहती हैं जबकि अन्दर उन्हें चढाने नहीं दिया जाता है . अतः फूल - प्रसाद के आलावा हमने कुछ नहीं लिया और बिना पण्डे के ही दर्शन किये . वहां कोई जबरन पीछे लगा भी नहीं . लौटते  में हम अनेक स्थानों को देखते हुए आये . रास्ते में त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित तपोवन में गए . यह रामायण काल के प्रसिद्ध  जटायु कि पहाड़ी कही जाती है .  त्रिकुटा पहाड़ी पर वृक्षावलियों के मध्य एक सन्यासी का आश्रम था जो  आज भी है . वहां वानरों की  संख्या बहुत अधिक है परन्तु किसी को परेशान  करते नहीं देखा . पहाड़ी पर चढ़ने के लिए ट्राली व्यवस्था है परन्तु समयाभाव के कारण हम ऊपर नहीं जा सके जहां जटायु का स्मारक है . वहां भ्रमण करना अच्छा लगा .इसके पश्चात मार्ग में हमने नौलखा मंदिर देखा .यह आधुनिक शैली का है .साथमें आश्रम परिसर भी है . हम उसके बाद श्री जगत बंधु आश्रम , श्री बालानंदन आश्रम , मोहन  मंदिर ( बंद था ) तथा नंदन पार्क गए .ये सभी स्थान वहां के प्रसिद्द गुरुओं के आश्रम हैं . वहाँ पर मंदिर, उनकी मूर्ती या समाधि स्थित हैं . सभी स्थान रमणीक हैं और देखने योग्य हैं .
   लगभग साढ़े पांच घंटे कि यात्रा के बाद हम देवघर लौटे . सभी स्थानों के बारे में ऑटो चालक ने संक्षिप्त जानकारी दे दी थी . उसने किसी स्थान पर यह भी नहीं कहा कि इतनी देर में वापस आ जाओ . उसका व्यवहार बहुत अच्छा था और ४५ किमी जाकर वापस घुमाते हुए लाने का किराया भी बहुत ठीक था .
  देवघर में हमने समाचार पढ़ा कि झारखण्ड राज्य के  १६.५ हजार करोड़ रूपये के २०१२-१३ के लिए स्वीकृत   सालाना योजना व्यय  में से राज्य के निकम्मे अफसर – नेता ५००० करोड़ रूपये  व्यय ही नहीं कर पाए . ३१ मार्च रविवार के दिन उन्होंने ताबड़तोड़ १५०० करोड़ रूपये निकाल लिए . शेष राशि लेप्स हो गई . ऐसे अयोग्य शासकों- प्रशासकों  वाला प्रदेश कहाँ से तरक्की करेगा ? यह देखकर डा खत्री के  राजतपथ के पूर्व अंक में प्रकाशित लेख की सत्यता दृष्टि गोचर हुई कि ‘नौकर देश का निर्माण नहीं कर सकते ‘.
        हम बैजनाथ धाम से राजगीर  जाना चाहते थे परन्तु हमें कोई मार्ग बताने वाला ही न था , न होटल वाला और न बस स्टैंड पर . अतः अगले दिन प्रातः हम देवघर से ट्रेन द्वारा जसीडीह पहुंचे और वहां से पैसेंजर नुमा एक्सप्रेस ट्रेन से अपरान्ह वापस  पटना पहुंचे .     
   
    

        

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