सोमवार, 31 मार्च 2014

किसकी सरकार ?


                                               किसकी सरकार ?    
    लोक सभा चुनाव २०१४ के परिणामों के लिए राजनेता चिंतित है और जनता उत्सुक है कि किसकी  सरकार बनेगी . मीडिया वाले उसमें अपना तड़का लगते रहते हैं कि इसकी सरकार बन रही है उसकी सरकार बन रही है जैसे कोई मोदी की सरकार बना रहा है तो कोई राहुल की सरकार न बन पाने की भाविष्य वाणी कर रहा है तो कोई अरविन्द केजरीवाल की बात कर रहा है और कोई कोई तो तीसरे मोर्चे का नाम भी ले लेता है . मीडिया और लोगों की चर्चाओं से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि सरकार किसी की भी  बने ‘जनता की सरकार’ तो नहीं बन रही है क्योंकि यह आज तक कभी नहीं बनी . 
   कुछ मीडिया वाले स्वयं को जनता का बड़ा हितैषी दिखाते हुए सरकारी व्यवस्थाओं की दुर्दशा का वर्णन करते है और लोकतंत्र का नाम लेते हैं . जब कि इनमें से कोई यह भी नहीं जानता कि लोकतंत्र का अर्थ क्या है और सरकार किसे कहते हैं . इन्हें धन कमाने, जनता को सम्मोहित करने, मूर्ख बनाने और राजनीति करने की कला तो खूब आती है परन्तु राजनीतिशास्त्र का अल्प ज्ञान भी नहीं है अन्यथा ये किसी व्यक्ति या किसी पार्टी की सरकार बनने की बात कभी न करते .
    इसी प्रकार कुछ लोग वृद्ध राजनीतिज्ञों और दलबदलुओं के कुर्सी मोह की चर्चाएँ भी चटकारे लेकर करते हैं ताकि जनता को मूर्ख बनाते रहें परन्तु ये कभी इस पर चर्चाएँ नहीं करते , न करवाते हैं कि ये नेता और उनके दल देश की समस्याओं के हल किस प्रकार निकालेंगे . चुनाव के समय उनके चर्चा के प्रिय विषय होते हैं – अयोध्या  की बाबरी मस्जिद , गोदरा नहीं, उसके बाद के दंगे , हिन्दू  साम्प्रदायिकता, नेताओं के अपने दल विरोधी बयान और ऐसे अन्य विषय जिससे जनता दिग्भ्रमित होती रहे और वे अपने-अपने चहेतों को चुनाव जितवा ले जाएं .
    दो मार्च को रजतपथ विचारमंच ने ‘ लोकतंत्र का स्वरूप ‘ विषय पर बुद्धिजीवियों की संगोष्ठी की थी जिसमें सामंतवाद और वर्तमान प्रजातंत्र की विस्तार से तुलना करके वर्तमान घटनाओं की व्याख्या की गई थी जो लोकतंत्र के नाम पर लोगों के मन में उठते रहते हैं . यह भी बताया गया था कि लोकतत्र में  समाज, शिक्षा, अर्थव्यवस्था , प्रशासन एवं न्याय प्रणाली आदि कैसे होंगे और उन्हें कैसे क्रियान्वित करेंगे . परन्तु एक चैनेल को छोड़कर वहां कोई नहीं पहुंचा क्योंकि वे जानना ही नहीं चाहते, लोगों के सामने लाना ही नहीं चाहते कि वास्तविक लोकतंत्र क्या है . इस अंक में संगोष्ठी का सार-संक्षेप दिया गया है .
    भारत की वर्तमान राजनीतिक  व्यवस्था नव सामंतवाद है जिसे कांग्रेसी  प्रधान मंत्री नरसिम्हा राव ने पूर्णता प्रदान की  थी . अपनी अल्पमत सत्ता बचाने के लिए उन्होंने अपनी कांग्रेस पार्टी की कीमत पर अनेक प्रदेशों में स्थानीय सामंतों, क्षत्रपों को स्वतन्त्र और मजबूत बनाया . 
    सामंत वे होते हैं जिनके अधिकार तो सारे होते हैं परन्तु कर्तव्य शून्य होते हैं, वे जितना काम कर दें जनता पर एहसान होता है . ये क़ानून से ऊपर होते है, जनता धन का आदि काल से अपनी सुख- सुविधाओं के लिए पूरी लगन से उपयोग करते रहे हैं . इनके पास चमचों की शक्तिशाली टीम भी होती है जो उन्हें महान सिद्ध करती रहती है . इन्हें नव सामंत इसलिए कहा है कि ५ वर्षों के बाद इन्हें जनता के सामने जाना पड़ता है, हाथ भी जोड़ने पड़ते हैं, वोट के लिए चिरौरी भी करनी पड़ती है . दूसरे दर्जे के सामंत या अप्रत्यक्ष सामंत वे हैं जिनके पास धन बल, भय बल, प्रशासनिक बल, कानूनी या न्यायिक बल, मीडिया बल, साम्प्रदायिकता(धर्म) का बल, जाति, क्षेत्र या भाषा का बल या अन्य किसी प्रकार का बल होता है जो चुनाव को प्रभावित कर सकता है या उन्हें क़ानून से ऊपर रखता है, मनमानी करने के अधिकार देता है . यदि कोई इन्हें सामन्ती शक्ति के दुरूपयोग से रोकता है तो कानून इन्हें पूरी मदद करता है, पुलिस और न्यायलय उनका साथ देते हैं . जैसे किसी बड़े अधिकारी ने घपले किये, प्रथम उसके विरुद्ध जांच की अनुमति नहीं मिलेगी, मिल गई तो उसके साथी केस कमजोर कर देंगे, न्यायलय अनेक वर्षों तक उनके मुकदमों को टालता जायगा, उनके प्रमोशन होते जांयगे और अधिकार बढ़ते जांयगे, घपले बढ़ते जांयगे . कोई भी सामंत मरने से पहले अपने पद, मान – सम्मान और सुख सुविधाएँ क्यों छोड़ना चाहेगा ? वह आख़िरी दम तक लड़ेगा, आप उन्हें चाहे सिद्धान्तहीन या पद लोलुप कहें, दल बदलू कहें या और कोई उपाधि दें . सामंतों का एक ही सिद्धांत होता है – किसी भी प्रकार सत्ता-सुख भोगना .  
                
    नरसिम्हा राव की सरकार में सामंत बाहर से समर्थन कर रहे थे . उसके बाद वे मिलकर शासन करने लगे और अब वे इतने शक्ति शाली हो गए हैं कि मिलकर देश (के मंत्री पदों) को परस्पर बाँट लेते हैं और एक संयोजक नियुक्त कर देते हैं जिसे प्रधान मंत्री कहा जाता है . वह किसी मंत्री की शिकायत उसके सामंत से तो कर सकता है परन्तु स्वयं उसके विभाग में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता . इसलिए चुनावों में सभी सामंत कहीं पर किसी से मिलकर चुनाव लड़ते है और कहीं पर उस दल के विरुद्ध लड़ते हैं . चुनावों में सभी सामंत अपनी शक्ति बढ़ाने में लगे रहते हैं क्योंकि सदन में उनके सदस्यों की संख्या के आधार पर उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी मिलेगी . जो व्यक्ति उन्हें सबसे अधिक संतुष्ट करेगा अर्थात लाभ देगा वही प्रधान मंत्री बनेगा, उसके सदस्यों की संख्या भले ही कम हो . इसी लिए निर्दलीय इकलौता सदस्य मधु कोंडा झारखण्ड का मुख्य मंत्री बन गया था . ‘गठबंधन की राजनीति’ राजनीति शास्त्र का कोई सिद्धांत नहीं है , सामंतवाद है . उसी से वर्तमान राजनीति की घटनाओं को समझा जा सकता है .
    सामन्तवाद के आधार पर यदि विश्लेषण करें तो क्या नरेंद्र मोदी अन्य सहयोग देने वाले दलों को मनमानी की छूट दे पायेंगे ? इसलिए पहले तो वे संयोजक प्रधानमंत्री बन ही नहीं पायेंगे और यदि भाग्य ने बहुत जोर मारा और बन भी गए तो चल नहीं पाएंगे क्योंकि अन्य दलों पर भाजपा की कूटनीति या संघ का अनुशासन कैसे चलेगा ? उनकी पार्टी भाजपा के सदस्य क्या अपनी सामन्ती शाक्ति छोड़ना चाहेंगे ? इसलिए वे स्वयं को दल का सिपाही न सही, सेनापति तक ही मानें तो अधिक सुखी रहेंगे .
   कांग्रेस की हालत खस्ता तो है परन्तु सोनिया गाँधी की कूटनीति शून्य नहीं हुई है . हाँ, राहुल अपनी अक्ल जहाँ-जहाँ लगाएँगे कांग्रेस को क्षति पहुंचेगी . यदि भाजपा के अतिरिक्त अन्य दलों की सदस्य संख्या कांग्रेस के साथ मिलकर अधिक हो रही होगी तो वह दिल्ली में केजरीवाल सरकार बनाने की भांति केंद्र में भी बिना शर्त किसी को भी समर्थन दे देगी और अवसर की तलाश में चुपचाप पीछे बैठ जाएगी . लोकतंत्र का मुखौटा लगाए हुए घाघ सामंतों की भीड़ से बाहर निकल कर लोकतंत्र की स्थापना करना जिसमें सरकार की स्थापना, संचालन एवं नियंत्रण जनता का हो वर्तमान परिस्थितियों में तो संभव नहीं दिखता है .            

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