मंगलवार, 13 अगस्त 2013

हिंदी-हिंदी जपने से कोई लाभ नहीं होगा

अगस्त २०१३ में पाकिस्तानियों ने ५ भारतीय सैनिकों को मार दिया था . एक समाचार चैनेल पर बहस हो रही थी . उसमें एक पाकिस्तानी प्रवक्ता को भी सम्मिलित किया गया था . जब हमारे एक व्यक्ति ने उनके लिए शहीद शब्द का प्रयोग किया तो पाकिस्तानी ने तुरंत आपत्ति की कि शहीद शब्द तो उनका है , हम उसका उपयोग कैसे कर सकते हैं . भार्गव हिंदी –अंग्रेजी शब्दकोष में शहीद का अर्थ दिया है ‘ धर्म के लिए मरने वाला मुस्लिम’ . यह शब्दकोष पुराना है, देश पर मर-मिटने वालों के लिए इस शहीद शब्द का प्रयोग वर्षों से होता आ रहा है परन्तु हिंदी शब्दकोष में भी शहीद का अर्थ ‘देश पर आत्मोत्सर्ग करने वाला’ नहीं लिखा हुआ है . उसके लिए हिंदी शब्द है हुतात्मा . उस बहस में भारतीयों के पास इसका कोई उत्तर नहीं था . इसलिए जब कोई व्यक्ति विदेशी से बात करे और उसे यह ज्ञात हो जाये कि इसकी अपनी कोई भाषा नहीं है तो उसके मन में उसके प्रति सच्चा सम्मान कभी नहीं हो सकता . विदेशी समझ जाता है कि इसमें राष्ट्र गौरव की कोई भावना नहीं है क्योंकि इनका देश अत्यंत पिछड़ा हुआ है .

अनेक ऐसे भक्त देखे जा सकते हैं जो भगवान का नाम जपते रहते हैं परन्तु उनका व्यवहार मानवता के सर्वथा विपरीत होता है . कुछ लोग तो दूसरों का सर्वदा अहित ही करते रहते हैं . उनके लिए ‘मुंह में राम बगल में छुरी’ की कहावत बनाई गई है . कुछ ऐसा ही हाल म. प्र. सरकार का है . जो हिंदी प्रेम तो ऐसे प्रदर्शित करती है जैसे परम देश भक्त हों . लेकिन जब बी आर टी एस भोपाल के नाम करण की बात आई तो फट से नाम रख दिया “माई बस “. बस शब्द तो हिंदी ने गृहण कर लिया है परन्तु “माई” शब्द की हिंदी नहीं कर पाए . हिंदी विश्वविद्यालय खोलने का ढोंग करने से हिंदी का विकास नहीं होगा न ही हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान का नारा देने से होगा जब तक अन्दर पवित्र भावना नहीं होगी . हिंदी नाम रखने में शर्म आ रही थी तो उर्दू में ही रख देते, कोई अन्य भारतीय भाषा में रख देते . हिंदी –संस्कृत का इतना अपमान कम से कम भारतीय संस्कृति की दुहाई देने वाली भाजपा को तो शोभा नहीं देता और वह भी म.प्र. में . ‘माई बस’ नाम के लिए भोपाल की महापौर कृष्णा गौर ही उत्तर दाई नहीं हैं पूरी भाजपा है . संघ ने इस पर आपत्ति क्यों नहीं की , यह भी आश्चर्यजनक है .

हिन्दू अपनी प्राचीन संस्कृति और गौरव की प्रशंसा करते हुए नहीं थकते हैं . रसायन शास्त्र में कणाद ऋषि का नाम आदर से लिया जाता है कि उन्होंने सर्व प्रथम कहा था कि पदार्थ सूक्ष्म कणों से मिलकर बना होता है जिसे परमाणु कहते हैं . इसी प्रकार हम चिकित्सा, गणित, ज्योतिष आदि अनेक विषयों में अपने प्राचीन विद्वानों के नाम लेते हैं . उन्होंने काम किये थे तो उनका नाम लेना अच्छी बात है , उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया जाना चाहिए

आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने १९४० के दशक में मनोविज्ञान के अनेक व्यावहारिक विषयों , उत्साह, श्रद्धा-भक्ति, करुणा, लज्जा-ग्लानि, लोभ, घृणा, ईर्ष्या, भय, क्रोध और बैर पर उत्कृष्ट मौलिक निबंध लिखे हैं . परन्तु इन विषयों को मनोविज्ञान विषय में सम्मिलित नहीं किया गया . यदि उनके विचारों को गंभीरता पूर्वक समझ लिया जाय और व्यवहार में लाया जाय तो अनेक सामाजिक, आर्थिक, आप्राधिक तथा विधिक समस्याओं को घटने से पहले ही रोका जा सकता है जिनसे आज लोग त्रस्त हैं . परन्तु उन विचारों को हिंदी विषय के निबंधों तक ही सीमित रखा गया . रजत पथ में अप्रेल-मई २०११ के अंक में उन सभी निबंधों का सार-संक्षेप दिया गया था . उस पत्रिका के साथ मैंने मैंने अनेक प्राध्यापकों से अनुरोध किया कि उन्हें मनोविज्ञान विषय में सम्मिलित किया जाय . सबने एक ही समस्या बताई कि अब कोई प्राध्यापक यह नहीं कर सकता है . पाठ्यक्रम में सुधार तभी संभव है जब म.प्र. शासन का उच्च शिक्षा विभाग इसमें रूचि ले . उसकी पहल पर माननीय राज्यपाल, जो विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं, उस विषय के प्राध्यापकों की संयोजन समिति की बैठक बुलायंगे तो उसमें ही कोई विषय जोड़े या घटाए जा सकते हैं . अतः प्राध्यापकों ने निजी स्तर पर कोई परिवर्तन करने में असमर्थता व्यक्त कर दी .

मैंने उस पत्रिका की प्रतियों के साथ, जो उन निबंधों के महत्त्व को दर्शाती हैं, म.प्र. के उच्च शिक्षा मंत्री से लिखित में अनुरोध किया, माननीय राज्यपाल जी से भी निवेदन किया तथा मुख्यमंत्री जी को पत्र लिखा . इस पर न तो कोई व्यय होना था न यह कार्य किसी के विपरीत था . परन्तु इस पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई . राजनीतिज्ञ कोई काम तभी करते हैं जब उन्हें कोई लाभ दिखे . इस काम से क्या लाभ होना था ? आचार्य रामचंद्र शुक्ल न तो कोई प्राचीन काल के हैं जिन्हें भारतीय संस्कृति के गौरव शाली व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया जा सके और न ही उनका नाम सरकार की लोकप्रियता में वृद्धि कर सकता है . संभवतः इसीलिए मेरे अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया गया .

जहां तक विश्विद्यालय के पप्राध्यापकों का प्रश्न है, अधिकांश लोग अंग्रेजी के विद्वान् हैं . उन्हें हिंदी कम समझ आती है . दूसरे किसी तथ्य को तभी स्वीकार करने की पारम्परा है जब कोई विदेशी विद्वान् उसे अच्छा कह दे . इसलिए स्वतन्त्र भारत के ६६ वर्षों में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, विधिक, धार्मिक आदि किसी भी क्षेत्र में कोई मौलिक कार्य सामने नहीं आया है . आज इसीलिए हम देश की अर्थ व्यवस्था सुधारने के लिए विदेशी पूंजीपतियों की चिरौरी कर रहे हैं . देश में मेधावी युवकों को विदेश जाने के लिए बाध्य किया जाता है और वे जब वहां अपना काम और नाम स्थापित कर लेते हैं तो हम उन भारतीयों पर झूठा गर्व करते हैं . इनसे देश का कोई हित होने वाला नहीं है .यदि ये निबंध किसी विदेशी के होते तो हमारे प्राध्यापक उन्हें सर-आँखों पर लेते .

चीन और चीनी भाषा की प्रगति का यही मुख्य कारण है कि १९४९ में माओत्सेतुंग ने जब चीन पर आधिपत्य स्थापित किया , उसने सर्वप्रथम अंग्रेजी दां प्राध्यापकों और विद्वानों को निकाल बाहर किया और श्रम केन्द्रों में भेज दिया कि देश में कोई काम हो या न हो पर काम होगा तो अपनी भाषा में होगा , अपने देश की परिस्थितियों के अनुसार होगा .

मैंने अनेक हिंदी विद्वानों तथा साहित्यकारों से भी इस पर चर्चा की परन्तु किसी ने इस पर कोई पहल नहीं की क्योंकि आचार्य शुक्ल जी का आपना कोई गुट नहीं है . शुक्ल जी से मेरी भी कोई रिश्तेदारी नहीं है परन्तु हिंदी पत्रकारिता से जुड़े होने के कारण यह मेरा दायित्व है कि मैं उन तथ्यों पर प्रकाश डालूँ जिनसे इस देश और देश के लोगों का कल्याण हो सकता है . जहां तक म.प्र. सरकार के सहयोग का प्रश्न है तो जो राजधानी भोपाल की बस सेवा का नाम तक हिंदी में नहीं रखना चाहती है, उससे किसी हिंदी विद्वान के सम्मान की आशा करना ही व्यर्थ है .

पटना साहिब एवं बैजनाथ धाम

हमने यह यात्रा मार्च के अंत में की थी . हम भोपाल से इटारसी और वहां से पटना पहुंचे . पटना जंक्शन पर सामने ही पटना साहिब जाने वाली ट्रेन खड़ी थी .  हम दूसरी तरफ से उस ट्रेन में चढ़ गए और २० मिनट में पटना साहिब स्टेशन पहुँच गए . वहां रिक्शे से हम  पटना साहिब गुरुद्वारे गए . हम वहां पहली बार गए थे . कोई जानकारी नहीं थी . रिक्शे वाले ने हमें उनके काउंटर तक पहुंचा दिया जहाँ हमने गुरुद्वारे में ही एक वी आई पी कमरा ले लिया . किराया है २०० रुपये . अच्छे , खुले, बड़े  कमरे  हैं .  
      पटना साहिब सिखों के ५ बड़े तीर्थ स्थानों में से एक है . वहां सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म हुआ था . प्राचीन गुरुद्वारा है परन्तु शहर उससे भी बहुत प्राचीन है . अतः उसमें अपेक्षा कृत कम स्थान है और घनी आबादी में है , सड़कें संकरी हैं . नहा- धोकर हमने दरबार साहिब में दर्शन किये , प्रसाद ग्रहण किया . उसके बाद हमने लंगर छका . गुरुद्वारे में हमने म्यूजियम देखा . उसमें सिख इतिहास को चित्रों एवं उनके नीचे लिखी टिप्पणी द्वारा बहुत सहज तरीके से जीवंत किया गया है . उसे देखकर सिख धर्म की कुर्बानियों ,सेवा भाव तथा जन कल्याणकारी कार्यों को अच्छी प्रकार समझा जा सकता है . दरबार साहिब में हमने गुरु गोबिंद सिंह जी के अस्त्र- शस्त्रों के भी दर्शन किये .
       दूसरे दिन हम गुरुद्वारे की बसों से निकटवर्ती चार प्रमुख अन्य गुरुद्वारों में भी गए . प्रत्येक गुरुद्वारे का अलग इतिहास है . उसे जानकर सिख गुरुओं के महान कार्यों को समझा जा सकता है . बस यात्रा लगभग ४ घंटे की थी . बस में बैठे हुए हमने पटना शहर भी देख लिया जो अन्यथा संभव नहीं था . हम प्रातः गुरुद्वारे से नाश्ता करके निकले थे , लौट के आये तो लंगर का प्रसाद लिया और वहां से स्टेशन के लिए प्रस्थान किया .

                          बैजनाथ धाम

   पटना साहिब स्टेशन से हम ट्रेन द्वारा जसीडीह के लिए चल पड़े . बैजनाथ धाम स्टेशन से कितना दूर है , रात्रि में वहां जाने के लिए कोई  वाहन वहां मिलेगा या नहीं , रात्रि में रास्ते में लूट- पाट  तो नहीं होती है, जैसे अनेक प्रश्न दिमाग में दौड़ रहे थे . ट्रेन में हमारे सहयात्री रवि भूषण तथा उनका परिवार था . उन्होंने हमें आश्वस्त किया कि वहां बहुत साधन मिलेंगे और कोई चिंता की बात नहीं है .रात्रि ९ बजे जब हम जसीडीह स्टेशन पर उतर कर बाहर आये तो वहां बहुत चहल-पहल थी .बाहर अनेक ऑटो रिक्शा और शेयर ऑटो रिक्शा खड़े थे . वे देवघर के लिए आवाजें लगा रहे थे . बैजनाथ धाम जिला देवघर का मुख्यालय है . वहां  देवघर रेलवे स्टेशन भी है जहाँ से प्रातः ६ बजे से रात्रि १०  बजे तक लोकल ट्रेन कई चक्कर लगाती है .वहां का केन्द्रीय स्थान लाईट टावर है जो स्टेशन से ३-४ सौ मीटर दूर होगा . वहीँ पास में बस स्टैंड भी है .  रवि भूषण उसी क्षेत्र में एक कंपनी में अधिकारी हैं . उन्हें लेने गाड़ी आई तो उन्होंने हमें भी बैठा लिया और रास्ते में बैजनाथ धाम में होटलों के मध्य लाईट टावर चौक में उतार दिया .
  वहां  आस – पास के होटल या तो भरे हुए थे या  मंहगे थे . हमने एक रिक्शे वाले से कहा तो वह हमें थोड़ी दूरी पर एक होटल में ले गया . हमारे कमरे में प्रवेश करते ही एक बुजुर्ग पंडा आ गया . वह हमें दूसरे दिन मंदिर दर्शन कराने ले जाना चाहता था . पंडों के नाम से ही पसीने छूटने लगते हैं कि पता नहीं क्या गुल खिलाएंगे . हमने उससे कहा कि हम स्वयं दर्शन कर लेंगे , उसकी आवश्यकता  नहीं है . वह चला गया . प्रातः हम तैयार हुए कि वह सामने आ गया और बोला कि वह हमें दर्शन करवाएगा . हमारे मना करने पर भी वह हमारे साथ मंदिर तक चलता गया . मंदिर एक-डेढ़  किलोमीटर दूर होगा. लाईट टावर से एक किमी होगा . चौक के आगे सकरी सड़क है . रिक्शा एवं ऑटो वहां तक आते-जाते रहते हैं . वहां के मावे एवं पेड़ों का स्वाद अच्छा है . हमें दूरी का अंदाज नहीं था .हमें लगा कि मंदिर पास में ही होगा अतः हम पैदल चलते गए . पंडा साथ चल ही रहा था .रास्ते में और पण्डे भी मिले परन्तु एक पण्डे को साथ देखकर वे कुछ नहीं बोले . यदि वह साथ न होता तो दूसरा पंडा पकड़ लेता अर्थात बिना पण्डे के मंदिर में प्रवेश असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है . 
    मंदिर परिसर में  प्रवेश करते ही वह सक्रिय हो गया .यहाँ जूते- चप्पल उतारो , यहाँ से फूल लो , यहाँ से गंगा जल लो . जब हमने गंगा जल के दाम पूछे तो विक्रेता ने बताया २५ रूपये में करीब १०० मिली और वह भी साफ़ नहीं था . मैंने पण्डे से कहा कि हम इसे नहीं लेंगे , जल से अभिषेक करेंगे . पण्डे ने कहा कि जल से अभिषेक नहीं कर सकते तो हमने कहा कि हम बिना अभिषेक के ही दर्शन कर लेंगे . पंडा हमें किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था . खत्री जी ने उससे कहा कि हम उसे २१ रुपये दक्षिणा देंगे , वह तैयार हो गया . उसने हमें तत्काल एक युवा पण्डे के हवाले कर दिया .
   प्रातः ९-१० बजे  के मध्य का समय था . उस दिन कोई ज्यादा भीड़ नहीं थी . १०० लोग भी नहीं थे . वहां पंक्ति बनाने के लिए रेलिंग नहीं है . धक्का- मुक्की ही एक सहारा है . उस युवा पण्डे ने खत्री जी से कहा कि अपनी दोनों बाहें सामने करे , मुझे कहा कि मैं उसकी ओर मुंह करके दोनों बाँहों के बीच में खड़ी हो जाऊं . फिर उसने भी अपने हाथ लम्बे करके खत्रीजी कि बाँहों को पकड़ लिया और खत्री जी ने उसकी बाहों को . कुल मिलाकर ऐसा दृश्य बना जैसे खत्रीजी गाड़ी हों , मैं सवार और पंडा उसे खींचने वाला . हम देश में सभी ज्योतिलिंगों के दर्शन कर चुके हैं . यह नया तरीका हमने बैजनाथ धाम में देखा . वह हमें घसीट कर भीड़ में ले जानी लगा . पहली किश्त में अन्दर बरामदे तक ले गया और दूसरी में मंदिर के अन्दर . मंदिर में जाने – आने का एक छोटा सा द्वार है . वहाँ रोक थी . गर्भ गृह खाली होने के बाद अन्दर जाने देते हैं . हम अन्दर गए तो पैर बड़ी कठिनाई से रखे हुए थे . जितने लोग ठूंस सकते थे अन्दर ढूंस दिए . पण्डे ने हमें दीवार से सटा  के खड़ा कर दिया कि चलने की जगह बने तो ज्योतिर्लिंग तक ले चलें . ५ मिनट में हिलने- डुलने लायक जगह हो गई . गेट पर खड़ा एक व्यक्ति हाथ में मोटी प्लास्टिक तीलियों से बना एक पतला झाडू नुमा बंच लेकर सबको आगे हांक रहा था . हम दो थे , किसी समूह में ४, ६ या ज्यादा लोग भी हो सकते हैं . जब सबको एक साथ खींचा जायेगा तो धक्का – मुक्की होनी ही है . यदि वहां पंक्ति व्यवस्था होती तो समय भले ही कुछ ज्यादा लगता परन्तु सबको अच्छे से दर्शन हो जाते . धक्कों के कारण लोग प्रसाद के डब्बों को , जल के लोटों को ऊपर करके छलकते हुए ले जा रहे थे . धक्कों में बच्चे. बड़े ,बूढ़े, स्त्रियाँ सभी आनंद ले रहे थे . प्रवेश करने से पूर्व पण्डे ने समझा दिया था कि पाकेटमारों से सावधान रहना . बहरहाल हमने ज्योतिलिंग के दर्शन किये , पण्डे ने फूल अर्पित करवा दिए , पूजा करवा दी , दो मिनट लगे होंगे . रेले से बाहर आ गए .
      बाहर आकर बुजुर्ग पण्डे को तय २१ रूपये दिए , वह चुप था , हमने १०० रूपये और दिए और युवक को भी २१ रूपये दिए . उसने विवाद नहीं किया . बाद में उसने बताया कि दोपहर बाद भीड़ नहीं होती है . खत्रीजी की भांजी और दामाद दो वर्ष पूर्व गए थे , उन्हें बिना किसी परेशानी के अच्छे से दर्शन हो गए थे. फिर पण्डे ने कहा कि उनके संघ को भी दान देना होता है . हम उसके साथ गए , वहां हमने ५१ रूपये दिए . किसी ने इस पर कहीं  विवाद नहीं किया . परन्तु ओंकारेश्वर में एक पण्डे ने कुछ न लेने की  बात पर शार्टकट ४-५ मिनट में पूजा करवा दी और १०१ रूपये लेकर ब्राह्मण भोजन के नाम पर १००० से ५०० रुपयों की मांग करने लगा और झंझट करने लगा .अतः मन में भय बना रहता है कि पता नहीं बाद में ये क्या करेंगे.
    हमने उसी परिसर में स्थित अन्य  मंदिरों में भी दर्शन किये . हर मंदिर और मोड़ पर पण्डे हाथ फैलाए दक्षिणा मांग रहे थे भले ही कोई एक रुपया दे  .कुछ  हिन्दू लोग बहुत बड़े भक्त होते हैं . वे चाहे – अनचाहे सभी मूर्तियों को नहलाते जाते हैं जिससे परिसर में चारों ओर किच-किच मची रहती है. साफ-सफाई की फुर्सत किसे है ? बस सबको पैसा चाहिए .दर्शन करके हम बाहर आये और रिक्शे से चौक तक आ गए . वहां ऑटो या रिक्शे के रेट  ढीक हैं , कभी थोड़ा मोलतोल करना पड़ता है .चौक पर एक ही ठीक स्थान दिखा जहां हमने भोजन किया . उसके बाद हमने एक ऑटो किया आसपास के स्थानों को दिखने के लिए . वह ६०० रूपये मांग रहा था हमने ५५० कहा .हमें तो वहां के किसी स्थान या दूरी का पता था नहीं , उसके विश्वास पर घूमने चल पड़े .
   देवघर से ४५ किमी दूर वासुकी नाग मंदिर है . परिसर में अन्य मंदिर भी हैं . वहां भी वैसी ही अव्यवस्थाएं तथा गंदगी है . बाहर चढ़ाने के लिए अनेक चीजें मिलती रहती हैं जबकि अन्दर उन्हें चढाने नहीं दिया जाता है . अतः फूल - प्रसाद के आलावा हमने कुछ नहीं लिया और बिना पण्डे के ही दर्शन किये . वहां कोई जबरन पीछे लगा भी नहीं . लौटते  में हम अनेक स्थानों को देखते हुए आये . रास्ते में त्रिकुटा पहाड़ी पर स्थित तपोवन में गए . यह रामायण काल के प्रसिद्ध  जटायु कि पहाड़ी कही जाती है .  त्रिकुटा पहाड़ी पर वृक्षावलियों के मध्य एक सन्यासी का आश्रम था जो  आज भी है . वहां वानरों की  संख्या बहुत अधिक है परन्तु किसी को परेशान  करते नहीं देखा . पहाड़ी पर चढ़ने के लिए ट्राली व्यवस्था है परन्तु समयाभाव के कारण हम ऊपर नहीं जा सके जहां जटायु का स्मारक है . वहां भ्रमण करना अच्छा लगा .इसके पश्चात मार्ग में हमने नौलखा मंदिर देखा .यह आधुनिक शैली का है .साथमें आश्रम परिसर भी है . हम उसके बाद श्री जगत बंधु आश्रम , श्री बालानंदन आश्रम , मोहन  मंदिर ( बंद था ) तथा नंदन पार्क गए .ये सभी स्थान वहां के प्रसिद्द गुरुओं के आश्रम हैं . वहाँ पर मंदिर, उनकी मूर्ती या समाधि स्थित हैं . सभी स्थान रमणीक हैं और देखने योग्य हैं .
   लगभग साढ़े पांच घंटे कि यात्रा के बाद हम देवघर लौटे . सभी स्थानों के बारे में ऑटो चालक ने संक्षिप्त जानकारी दे दी थी . उसने किसी स्थान पर यह भी नहीं कहा कि इतनी देर में वापस आ जाओ . उसका व्यवहार बहुत अच्छा था और ४५ किमी जाकर वापस घुमाते हुए लाने का किराया भी बहुत ठीक था .
  देवघर में हमने समाचार पढ़ा कि झारखण्ड राज्य के  १६.५ हजार करोड़ रूपये के २०१२-१३ के लिए स्वीकृत   सालाना योजना व्यय  में से राज्य के निकम्मे अफसर – नेता ५००० करोड़ रूपये  व्यय ही नहीं कर पाए . ३१ मार्च रविवार के दिन उन्होंने ताबड़तोड़ १५०० करोड़ रूपये निकाल लिए . शेष राशि लेप्स हो गई . ऐसे अयोग्य शासकों- प्रशासकों  वाला प्रदेश कहाँ से तरक्की करेगा ? यह देखकर डा खत्री के  राजतपथ के पूर्व अंक में प्रकाशित लेख की सत्यता दृष्टि गोचर हुई कि ‘नौकर देश का निर्माण नहीं कर सकते ‘.
        हम बैजनाथ धाम से राजगीर  जाना चाहते थे परन्तु हमें कोई मार्ग बताने वाला ही न था , न होटल वाला और न बस स्टैंड पर . अतः अगले दिन प्रातः हम देवघर से ट्रेन द्वारा जसीडीह पहुंचे और वहां से पैसेंजर नुमा एक्सप्रेस ट्रेन से अपरान्ह वापस  पटना पहुंचे .     
   
    

        

बुधवार, 26 जून 2013

प्रलय और फ़रिश्ते

प्रलय और फ़रिश्ते
चार धाम यात्रा को आए
देश के कई भागों से भक्त ,
स्त्री,पुरुष,शिशु,युवा वृद्ध
कई दुर्बल थे ,कई सशक्त.१.
मौसम था अत्यंत सुहाना
भक्तों में थी भरी उमंग,
जय हर-हर,जय बद्रीश्वर
जय यमनोत्री-गंगोत्री की तरंग.२.
ध्यान-अर्चना भक्त कर रहे
सघन मेघों ने चाल चली, 
चुपके-चुपके सबको घेरा
व्यूह रचना कुछ ऐसी की.३.
प्रलय मचे कोई भाग न पाए
छोटे–बड़े का न कोई भेद,
पल भर भी कोई सोच न पाए
वह गोरा हो या हो श्वेत.४.
नभ में तीव्र गर्जना करके
क्षण भर में यूं मेघ फटे,
परमाणु बम हाथों में लेकर
जैसे हों यमराज डेट.५.
नभ में भारी विस्फोट हुआ
फटे मेघ सब एक ही साथ,
तिनके से सब बहने लग गए
किसी के कुछ आया न हाथ.६.
हिमालय के श्रृंग टूट-टूट कर
लुढ़के जलधारा के संग,
रास्ते में जो कुछ भी आया
बहा ले गए अपने संग.७.
प्रलय ने रूप धरा विकराल
उफनती धारा में था आक्रोश,
नदी-नाले सब रौद्र हुए
विनाश का उरमें ले कर जोश.८.    
पर्वत मालाएं टूट रही थीं
भवन गिरे मिट्टी की भांति,
क्षण भर में वीरान हुआ सब
विलुप्त हुई मंदिर की कांति.९.
स्त्री-पुरुष,बड़े और छोटे
जल-विप्लव में लीन हुए,
हाहाकार मचाते थे स्वर
केदार घाटी में विलीन हुए.१०.
कारें बहीं, मोटरें बह गईं
बड़े-बड़े घर -हाट बहे
उनमें जो जन-माल निहित था       
तांडव में सब अदृश्य हुए.११.
जीवित जो जन शेष रहे
विकराल काल के मुंह में थे,
पत्थर थे किसी को कुचल रहे
कोई उफनती नदीमें बहते थे.१२.
जिनमें साहस था भरा हुआ,  बुद्धि भी जिनकी सक्रिय थी,
वे ऊंचाई पर जा पहुंचे
जीव की आस असीमित थी.१३.
वे जल-विप्लव को देख रहे
असहाय थे बंधु  बचाने को,     
उनके प्रिय सामने बिछुड़ रहे
जीवन था मृत्यु में जाने को.१४.
मेघों का तांडव शांत हुआ
लोगों की साँसे चलती थीं,
सड़कें टूटीं, खाई बन गईं
उस दृश्यसे आत्मा डरती थी.१५.
सामान बह गया नदियों में
भोजन पानी भी पास न था,
पत्थरों की राह अजनबी थी,
जीवित बचनेका मार्ग न था.१६.   
कुछ यहाँ, कुछ वहां पड़े हुए
जीवन की घड़ियाँ गिनते थे,
हे ईश्वर! अब तो दया करो
कर वद्ध प्रार्थना करते थे.१७.
लोगों की जान बचाने को      
भारतीय जवान बढ़े आगे,
कोई धरती पर कोई आसमाँ में 
जन-जन को बचाने को भागे.१८.
कोई नदी पर पुल थे बाँध रहे,
कोई रस्सी से मार्ग बनाते थे,
असहाय और रोगी लोगों को
कोई  कन्धों पर ले जाते थे.१९.
उनके पास जो भोजन था
उसको भी थे वे बाँट रहे,
बस एक ही जज़्बा दिल में था 
सही सलामत सब निकलें.२०.
हेलीकाप्टर आपरेशन कर
दूर फंसे हुए  लोग निकाले,
जितना भी संभव हो सकता
जी-जान से जुटे थे मतवाले.२१.
हज़ारों को जीवन दान दिया
निज घर पहुंचे आबाद हुए,
सब एक ही बात रहे कहते
फ़रिश्ते वहां  साकार हुए.२२.
श्रम और साहस से कार्य किया
सेना ने हार नहीं मानी,
जनता की सेवा करने में
दे दी अपनी भी क़ुरबानी.२३.      



     

प्रलय और फ़रिश्ते

प्रलय और फ़रिश्ते
चार धाम यात्रा को आए
देश के कई भागों से भक्त ,
स्त्री,पुरुष,शिशु,युवा वृद्ध
कई दुर्बल थे ,कई सशक्त.१.
मौसम था अत्यंत सुहाना
भक्तों में थी भरी उमंग,
जय हर-हर,जय बद्रीश्वर
जय यमनोत्री-गंगोत्री की तरंग.२.
ध्यान-अर्चना भक्त कर रहे
सघन मेघों ने चाल चली, 
चुपके-चुपके सबको घेरा
व्यूह रचना कुछ ऐसी की.३.
प्रलय मचे कोई भाग न पाए
छोटे–बड़े का न कोई भेद,
पल भर भी कोई सोच न पाए
वह गोरा हो या हो श्वेत.४.
नभ में तीव्र गर्जना करके
क्षण भर में यूं मेघ फटे,
परमाणु बम हाथों में लेकर
जैसे हों यमराज डेट.५.
नभ में भारी विस्फोट हुआ
फटे मेघ सब एक ही साथ,
तिनके से सब बहने लग गए
किसी के कुछ आया न हाथ.६.
हिमालय के श्रृंग टूट-टूट कर
लुढ़के जलधारा के संग,
रास्ते में जो कुछ भी आया
बहा ले गए अपने संग.७.
प्रलय ने रूप धरा विकराल
उफनती धारा में था आक्रोश,
नदी-नाले सब रौद्र हुए
विनाश का उरमें ले कर जोश.८.    
पर्वत मालाएं टूट रही थीं
भवन गिरे मिट्टी की भांति,
क्षण भर में वीरान हुआ सब
विलुप्त हुई मंदिर की कांति.९.
स्त्री-पुरुष,बड़े और छोटे
जल-विप्लव में लीन हुए,
हाहाकार मचाते थे स्वर
केदार घाटी में विलीन हुए.१०.
कारें बहीं, मोटरें बह गईं
बड़े-बड़े घर -हाट बहे
उनमें जो जन-माल निहित था       
तांडव में सब अदृश्य हुए.११.
जीवित जो जन शेष रहे
विकराल काल के मुंह में थे,
पत्थर थे किसी को कुचल रहे
कोई उफनती नदीमें बहते थे.१२.
जिनमें साहस था भरा हुआ,  बुद्धि भी जिनकी सक्रिय थी,
वे ऊंचाई पर जा पहुंचे
जीव की आस असीमित थी.१३.
वे जल-विप्लव को देख रहे
असहाय थे बंधु  बचाने को,     
उनके प्रिय सामने बिछुड़ रहे
जीवन था मृत्यु में जाने को.१४.
मेघों का तांडव शांत हुआ
लोगों की साँसे चलती थीं,
सड़कें टूटीं, खाई बन गईं
उस दृश्यसे आत्मा डरती थी.१५.
सामान बह गया नदियों में
भोजन पानी भी पास न था,
पत्थरों की राह अजनबी थी,
जीवित बचनेका मार्ग न था.१६.   
कुछ यहाँ, कुछ वहां पड़े हुए
जीवन की घड़ियाँ गिनते थे,
हे ईश्वर! अब तो दया करो
कर वद्ध प्रार्थना करते थे.१७.
लोगों की जान बचाने को      
भारतीय जवान बढ़े आगे,
कोई धरती पर कोई आसमाँ में 
जन-जन को बचाने को भागे.१८.
कोई नदी पर पुल थे बाँध रहे,
कोई रस्सी से मार्ग बनाते थे,
असहाय और रोगी लोगों को
कोई  कन्धों पर ले जाते थे.१९.
उनके पास जो भोजन था
उसको भी थे वे बाँट रहे,
बस एक ही जज़्बा दिल में था 
सही सलामत सब निकलें.२०.
हेलीकाप्टर आपरेशन कर
दूर फंसे हुए  लोग निकाले,
जितना भी संभव हो सकता
जी-जान से जुटे थे मतवाले.२१.
हज़ारों को जीवन दान दिया
निज घर पहुंचे आबाद हुए,
सब एक ही बात रहे कहते
फ़रिश्ते वहां  साकार हुए.२२.
श्रम और साहस से कार्य किया
सेना ने हार नहीं मानी,
जनता की सेवा करने में
दे दी अपनी भी क़ुरबानी.२३.      



     

शनिवार, 22 जून 2013

राष्ट्र ,राष्ट्र-संपत्ति ,राष्ट्र की शक्ति


राष्ट्र
एक धर्म और एक हो संस्कृति ,      
प्रेम का उनमें हो विस्तार .
धर्म और संस्कृति भिन्न-भिन्न हों
पर उनके हों एक विचार .
प्राकृतिक सम्पदा राष्ट्र की समझें
राष्ट्र भाषा सशक्त  विकसित हो
लोगों में हो सहयोग परस्पर
किसी को द्वेष की नहीं अनुमति हो .
हीनता-श्रेष्ठता भाव का जिसमें
कोई बीज नहीं बोता  है
शोषण मुक्त समाज जहां हो
राष्ट्र वही स्थिर होता है

राष्ट्र –संपत्ति
लोग,चरित्र,श्रम और मेधा,
संस्कृति,भाषा ,शिक्षा,विज्ञान .
भूमि,कृषि, उद्योग-व्यवसाय ,
जल,पर्वत, वन,धन और खान.
राष्ट्र सपत्ति के ये हैं अवयव  
इनमें हो सही सामंजस्य,
कुशल प्रशासन ,न्याय त्वरित हो
अच्छे राष्ट्र का यही रहस्य .

राष्ट्र की शक्ति
धन नहीं करता  राष्ट्र समृद्ध
लोग होते हैं उसकी शक्ति
लोग वाही जो हों निःस्वार्थ
राष्ट्र के प्रति रखते हो भक्ति.
जो राष्ट्र के लिए समर्पित हों
मेधा, विवेक से हों भरपूर  
ज्ञान-विज्ञान ,श्रम,स्वाभिमान हो
लालच,ईर्ष्या से रहते दूर .
शौर्य,साहस, उत्साह प्रबल हो
जीवन बलिदान को तत्पर हों
कैसी भी परिस्थितियां हो
वे राष्ट्र कार्य में स्थिर हों .
मानव शक्ति रहे कमजोर
धन - संपदा के हों भण्डार
सर्वस्व विदेशी हर लेते हैं
राष्ट्र का होता बंटाढार .
आज जो उन्नत राष्ट्र हैं दीखते
उनके लोग समर्पित थे
निजी स्वार्थ था उनमें गौण
वे राष्ट्र - समृद्धि को अर्पित थे
शौर्य, विवेक, विज्ञान –तकनीकें
दूरदृष्टि उनकी अविचल थी
विद्वानों के प्रति अगाध श्रद्धा
उनकी राष्ट्र-भक्ति अचल थी.
कभी भारत था धन की खान
समृद्धि राष्ट्र की थी पहचान  
लूट लिया लुटेरों ने धन
अनेकों लोग हुए कुर्बान .
अफगानिस्तान ने लूट के भारत
अपने थे भण्डार भरे
आज भी वे निर्धन तो हैं ही
अविवेक के कारण  स्वयं मारें .
अमरीका में लोग थे रहते
प्राकृतिक सम्पदा विपुल भरी थी
मेधा,विवेक विज्ञान नहीं थी
 राष्ट्र भावना नहीं बढ़ी थी .
लोग थे निर्धन और असहाय
प्राकृतिक जीवन जीते थे
यूरोपियों की ताकत के आगे
वे कुछ भी नहीं कर सकते थे .
वही अमरीका, वही सम्पदा
श्रम-ज्ञान से सिंचित हो गए
बना समृद्ध और उन्नत देश
वे विकास का अर्थ बन गए



प्रलय क्यों ?


प्रलय क्यों ?
इंद्र देव क्यों कुपित हो गए ,
आसमान क्यों फटते जाते ?
ईश्वर , हमसे भूल हुई क्या
मेघ क्यों तांडव करते जाते ?

प्रलयंकारी जल की धारा
आसमान से क्यों बहती है ?
जान-माल की क्षति  है होती
सभ्यता क्यों नष्ट होती है ?

मचल- मचल कर पानी बहता
नदियाँ उफन-उफन कर चलतीं.
रास्ते में जो भी मिल जाए
कहीं दया का भाव न रखतीं.

पर्वत मालाएं टूट रही हैं
बड़ी-बड़ी चट्टानें गिरतीं
मार्ग सभी अवरुद्ध हो गए
संकट में कई जानें अटकीं.

भवन हैं गिरते, वृक्ष हैं गिरते
व्यक्ति-पशु सब बहते जाते
जीवन कितना क्षण भंगुर है
इसी तथ्य की याद दिलाते.

प्रलयकाल में सभी बराबर
न कोइ बूढ़ा, न कोई बच्चा
प्रकृति कोप से बचे न कोई
वह हो झूठा या हो सच्चा.

मानव कितना समृद्ध हो गया
प्रकृति पर है अधिकार जताता
अनेकों कार्य स्वयं हो जाते
मनुष्य दूर से बटन दबाता.

 प्रकृति के अनेक रहस्य हैं खोले
अन्तरिक्ष में भी है कदम बढ़ाता 
जीवन रहस्य का भेद खोलने
मनुज है आगे बढ़ता जाता .

ये प्राकृतिक आपाद घटनाएं
कितनी प्रबल क्रूर होती हैं
क्षण भर में विनाश कर देतीं
मानवता रोती रहती है .

हे  ईश्वर !हम शरण में तेरी
आत्मा में एक ज्योति जलाओ
जीवन क्या और मृत्यु है क्या
इसका कुछ रहस्य समझाओ .

क्या है मेरा, क्या है तेरा
इसको कोई समझ न पाता
जब कह दे वह ‘तेरा- तेरा’
वह ईश्वर का है हो जाता .




  



   

दक्ष तो कृष्णा कन्हैया है


                दक्ष तो कृष्णा कन्हैया है
दक्ष मेरा फूलों सा कोमल
तितली सी चंचलता पाई
फुदक-फुदक कर इत -उत डोले
जैसे सोन  चिरैया है
दक्ष तो कृष्णा कन्हैया है
सबका कृष्णा कन्हैया है.

बातें प्यारी-प्यारी करता
जो सुन ले उसका दिल हरता
मुस्काकर बरबस मन मोहे
यह तो भूल भुलैया है
दक्ष तो कृष्णा कन्हैया है, सबका कृष्ण ......

मन में दुःख भरा हो कोई
तन कष्टों ने घेरा हो
प्यारी नजर पड़े नटवर की
सबसे मुक्त करैया है
दक्ष तो कृष्णा कन्हैया है , सबका कृष्ण ....

छोटे-छोटे पैर दक्ष के
गोप- गोपियों के संग खेले
इसके आगे, उसके पीछे
कहता दीदी-भैया है
दक्ष तो कृष्णा कन्हैया है , सबका कृष्ण ....

दादा-दादी का मन मोहे
पिता को आनंद देता जाए
अपने नटखट कामों से
सबका नाच नचैया है
दक्ष तो कृष्णा कन्हैया है , सबका कृष्ण ....

दक्ष जहां हो धूम मचाए
उछले-कूदे , हँसे - हँसाए
सदा हँसे यह इसी तरह से
माँ ले रही बलिया है
दक्ष तो कृष्णा कन्हैया है , सबका कृष्ण ....

       आशीर्वचन  
चाँद-सितारों से है प्यारा
नन्हा-मुन्ना दक्ष हमारा
मात-पिता की आँख का तारा
सुन्दर,नटखट सबसे न्यारा . 

ईश्वर कि हो कृपा दक्ष पर
बुद्धि,विवेक,मेधा विकसित हो
शरीर हो पुष्ट,सबल,सुन्दर
सद्गुण की न कोई कमी हो .

दो वर्षों का दक्ष हुआ है
बहुत बधाई जन्म दिवस कि
नित सबको आनंद यह देवे
जैसे हो फुहार पावस की .