सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

अमेरिका में लोकतंत्र और भारत में सामंतवाद है


अमेरिका में लोकतंत्र और भारत में सामंतवाद है

लोकतंत्र का अर्थ है लोगों की व्यवस्था अर्थात व्यवस्था में लोगों की सह्भागिता कितनी है , व्यवस्था पर उस देश या संस्था के लोगों का कितना नियंत्रण है . सामंत का अर्थ है ऐसे लोगों जिनके अधिकार सभी है परन्तु कर्तव्य शून्य हैं ,जिनके पास चमचों की फ़ौज होती है जो उन्हें महान सिद्ध करती रहती है तथा लोग जितना परेशान और दुखी होते हैं सामंतों को उतना ही आनंद आता है .यहाँ पर धन, राजनीति और न्यायव्यवस्था के सन्दर्भ में दोनों देशों की चर्चा की जारही है .
अमेरिका में सारा धन 'कर दाताओं का धन होता है '. समाचार पत्रों में कहीं पर भी केंद्र या राज्य के पैसे या राष्ट्रपति अथवा गवर्नर के धन की बात नहीं कही जाती है . इसलिए कहीं पर भी धन का दुरूपयोग या क्षति हुई तो उसकी जिम्मेदारी तय की जाती है और क्षति पूर्ति का आदेश तथा दण्ड दिए जाते हैं . भारत में जनता से वसूला गया धन जनता का नहीं कहा जाता है . वह धन केंद्र , राज्य , प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री या किसी विभाग का हो जाता है . फिर ये लोग उसका उपयोग जैसे चाहे करें और चाहे अपने देश-विदेश के खातों में जमा करें . अमेरिका में कोई ठेके मनमाने ढंग से नहीं दिए जा सकते , प्रत्येक विभाग में अर्थशास्त्री होते हैं जो तत्काल हानि - लाभ का विश्लेषण करते हैं और सही ढंग से काम करने का दबाव बनाए रखते हैं .जबकि भारत की सामंतवादी व्यव्यस्था में जनता धन को बर्बाद करना , नेता - अफसर अपना अधिकार समझते हैं . इसलिए वे जब तक धन लूटते रहते हैं , सब चुप रहते हैं . बाद में कभी हल्ला हुआ भी तो या तो लुटेरों का पता ही नहीं चल पाता , पता चल भी गया तो सिद्ध नहीं हो पाता , सिद्ध हो भी गया तो भी धन कभी नहीं मिलता. अमेरिका में नेता जनता केधन से अपने बड़े - बड़े पोस्टर , विज्ञापन नहीं लगा सकते , सरकारी खर्च पर देश भर में घूम - घूम कर फालतू के भाषण नहीं दे सकते , अपने को महान नहीं सिद्ध कर सकते जैसा भारत में रोज होता है .
अमेरिका में सामंत नहीं हैं अतः राजनीतिक हाई कमांड भी नहीं होती है . भारत में चुनाव में टिकट पार्टी के हाई कमांड अर्थात बड़े सामंत को ढेर सा धन देकर , उसकी चरण वंदना करके और उसे अपना भाग्य विधाता मानने का विश्वास दिलाने पर मिलता है , जबकि अमेरिका अपनी योग्यता सिद्ध करने पर टिकट मिलता है . अमेरिका में २०१२ में राष्ट्रपति का चुनाव होना है . एक वर्ष पूर्व से ही संभावित उम्मीदवार इसके प्रयास में लग जाते हैं . एक ही दल के कई लोग सामने आते हैं . उनके टी वी डिबेट होते हैं , समाचारपत्रों में उनके विचार छपते हैं जिसमें उन्हें देश की समस्याओं पर बहस करनी होती है , जैसे उन्हें यह बताना होता है कि वे मंहगाई , बेरोजगारी , शिक्षा , युद्ध , आतंकवाद आदि समस्याओं को कैसे दूर करेंगे . एक पार्टी का होने के बावजूद वे परस्पर एक दूसरे पर आरोप -प्रत्यारोप भ लगते हैं , जनता के प्रश्नों के उत्तर भी देते हैं , उसके बाद सभ ५० राज्यों में वोटिंग होती है , जो जीतता है , पार्टी का उम्मीदवार बनाया जाता है . इस चुनाव में हारे हुए नेता भी फिर उसे अपना नेता मान लेते हैं और विपक्ष से चुनाव के समय एक होकर उसके पीछे खड़े रहते हैं , पूरी ताकत से उसके पक्ष में प्रचार करते हैं , भारत जैसे उसके वोट नहीं काटते हैं . भारत में नेताओं के पास इतना ही ज्ञान होता है कि वे विपक्षियों कि अधिकतम निंदा कर सकें , धर्म, जाति , गरीबी आदि के नाम पर लोगों को ब्रमित कर सकें , धन, सामान बाँट कर या भविष्य में देने का वायदा करके या डरा धमकाकर वोट लूट सकें .देश कि समस्याओं से तो उन्हें कभी लेना- देना ही नहीं रहा . इसलिए वहां के नेताओं को देश- विदेश कि सब जानकारी रहती है , वे किसी कि कठपुतली न होकर स्वयं निर्णय लेने में सक्षम होते हैं . राजनीतिक निर्णय भी वहां नेता नहीं , जनता लेती है . महत्व पूर्ण क़ानून बनाने से पहले चुनाव के समय मतपत्र के साथ वोटरों को सभी क़ानून भी दिए जाते हैं जिन्हें स्वीकार करने या न करने का उन्हें अधिकार होता है . यदि जनता का बहुमत उस क़ानून के पक्ष में होता है तो क़ानून बनाया जाता है अन्यथा नहीं . भारत जैसे उलटे- पुल्टे क़ानून जनता पर थोपने कि परम्परा वहां नहीं है .
अमेरिका में कानून व्यवस्था बहुत अच्छी है . इसका यह अर्थ नहीं न है कि वहां अपराध नहीं होते , अपराधी तो वहां भी हैं परन्तु वहां सजा भी है . व्यक्ति पकड़े जाने पर यदि अपना अपराध स्वीकार कर लेता है तो सजा काम हो जाती है अन्यथा लम्बी सजा होती है . भारत कि भांति वहां सभी सजाएं साथ -साथ नहीं चलती , एक के बाद एक चलती हैं .अतः सजाएं ८०-१०० साल कि भी हो सकती हैं .अमेरिका में क़ानून और दया का घाल मेल नहीं है . अपराध स्वीकार करने पर सजा इसलिए कम हो जाती है कि व्यक्ति को अपराध बोध हो रहा है ,वह पश्चाताप कर रहा है . इस स्थिति में आगे अपील भी नहीं की जाती है , अतः मुकदमों कि अनावश्यक संख्या भी नहीं बढ़ती है . वहां पर राजनीतिक दल पुलिस पर दबाव नहीं बनाते हैं जबकि भारत में छोटे अपराधियों तक को बचाने का काम नेता करते हैं .उ.प्र. के चुनावों का एक बढ़िया उदाहरण देखिए . भारत के संविधान में धर्म के नाम पर राज्य द्वारा कोई भी काम नहीं किए जाने कि व्यवस्था है परन्तु राजनीतिक लाभ के लिए केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस स्वयं धर्म के नाम पर आरक्षण देने पर आमादा है अर्थात संविधान तोड़ना अपना अधिकार मानती है . चुनाव के समय कोई अतिरिक्त घोषनाएँ नहीं की जा सकती हैं , परन्तु देश के क़ानून मंत्री स्वयं चुनाव आयुक्त कि चेतावनी की उपेक्षा करते हुए धर्म के नाम पर अपनी पत्नी और पार्टी के लिए वोट मांग रहेहैं . चुनाव आयोग को उनका चुनाव चिन्ह जब्त करने , उन्हें चुनाव के लिए अयोग्य घोषित करने , तथा गिरफ्तार तक करने का अधिकार है परन्तु चुनाव आयुक्त ने ऐसा न करके इसकी शिकायत राष्ट्रपति को की , राष्ट्र पति ने पत्र प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह को भेज दिया . अब वह भारत के क़ानून मंत्री से पूछेंगे कि क़ानून मंत्री क़ानून का उल्लंघन कर रहा है , क्या करना चाहिए और इस मध्य कांग्रेस के अनेक नेता क़ानून मंत्री के पक्ष में खड़े हो गए . अमेरिका किस्सा देखिए . राष्ट्रपति ओबामा इलिनॉय राज्य से हैं , डेमोक्रेटिक हैं . २००८ में इलिनॉय के लोक प्रिय डेमोक्रेट गवर्नर भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए . दिसंबर २००८ में डिस्ट्रिक्ट अटोर्नी ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया ,राज्य प्रतिनिधि सभा (विधान सभा )ने उन पर महा अभियोग चलाया जिसमें डेमोक्रेट बहुमत में हैं .दो महीने के अन्दर डेमोक्रेट और रिपब्लिकन के ११४ सदस्यों ने सर्वसम्मति से उन्हें बर्खास्त कर दिया और दिसंबर २०११ में कोर्ट ने उन्हें १४ वर्ष की कारावास कि सजा इसलिए दे दी कि उन्होंने कोर्ट में अपना अपराध स्वीकार कर लिया , जनता से माफ़ी मांग ली और अपनी करनी पर पश्चाताप किया .यदि वहां डेमोक्रेट , भारत कि भांति अपराधी और भ्रष्ट गवर्नर का साथ देते तो वहां पूरे देश में पार्टी ही समाप्त हो जाती . अमेरिका में पूँजी वाद के कारण आर्थिक समस्याएँ हैं , परन्तु लोकतंत्र भी है .जबकि भारत में निकम्मे नेताओं और अफसरों द्वारा कृत्रिम रूप से उत्पन्न कि गई समस्याएँ ही समस्याएँ हैं .
डा. ए.डी. खत्री , भोपाल

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

उच्च शिक्षा के लिए प्रदेश एवं देश की नीति

उच्च शिक्षा के लिए प्रदेश एवं देश की नीति

उच्च शिक्षा के लिए राज्य सरकारों की स्थिति बहुत स्पष्ट है . ऐसा पढाओ कि लोग लिख पढ़ भी न सकें ताकि उनके द्वारा किये जा रहे घपलों की व्यापकता वे समझ ही न पाएं . म. प्र. इसमें अग्रणी है . अप्रेल २००८ में प्राचार्यों की बैठक में जबरन सेमेस्टर सिस्टम लागू करने की नीति का विरोध करते हुए मैंने प्रमुख सचिव एवं आयुक्त उच्च शिक्षा से कहा था कि जिस तरह से वे सेमेस्टर सिस्टम लागू करना चाहते हैं उससे तो छात्रों का भविष्य ही चौपट हो जायगा . मेरी पहली आपत्ति थी कि एक परीक्षा करवाने में ३ माह से अधिक समय लगता है ऐसी ही दो सेमेस्टर और एक पुरानी परीक्षा करवाने में ही १० माह लग जायेंगे , पढाई कब होगी ? दूसरी आपत्ति यह रखी कि जब विश्विद्यालय १००० से भी कम छात्रों वाली पी.जी.डी.सी. ए. परीक्षा एक के स्थान पर दो साल में करवा पाता है तो हजारों छात्रों का परिणाम कितने समय में आयगा ? मेरी आपत्तियों को दर किनार करके सेमेस्टर लागू हो गए और सब देख रहे है कि लाखों छात्रों का साल बर्बाद हो गया . परीक्षा व्यवस्था और परीक्षक ऐसे बनाए कि बिना कक्षाएं लगे ही अधिकाँश छात्र अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो गए . ये छात्र किस प्रतियोगिता में टिक पाएंगे ? कालेजो में निर्माण कार्य अधिकांशतः पी. डब्ल्यू. डी. या किसी अन्य सरकारी विभाग द्वारा किये जाते है जिनका काम प्राचार्य से पैसे झटक लेना होता है उसके बाद किसी की जिम्मेदारी नहीं होती है . कम्प्युटर जैसी मशीनरी क्रय करवाने के लिए भी सरकारी लोग या उनके एजेंट सक्रिय रहते हैं . मशीनरी के रखरखाव के लिए स्टाफ दिया नहीं जाता . अतः वह पड़ी-पड़ी खराब हो जाती है . बिचौलियों कि तो आय हो ही गई .पूर्व सरकार ने भी इसी लिए कर्ज लिया था , यह भी कुछ वैसा ही करेगी . क्योंकि जब पढाई ही नहीं होती , कक्षाएं ही नहीं लगती , मशीनें बेचारी क्या कर लेंगी ? सरकार अपनी ओर से तो बचे खुचे प्राध्यापकों को वेतन दे दे वही बहुत है .
अमेरिका के स्टैन फोर्ड निजी विश्विद्यालय के पास ८१८० हेक्टेअर भूमि है , वहां पर उसने वर्ष २००८ में ६८.८ करोड़ डालर केवल शोध कार्यों पर ही व्यय किये थे .वहां महज १५ हजार बच्चे पढ़ते हैं और १९१० का स्टाफ है .वे अमेरिका में ही लाखों रुपये देने वाले हजारों छात्रों को प्रवेश नहीं दे पाते हैं . कलिफ़ोर्निया विश्विद्यालय के १० शहरों में कैम्पस हैं . उसके पास बर्कले में ६६५१ तथा सैन डिएगो में २२०० हेक्टे अर भूमि है. २००८ में उसने शोध पर केवल सैन डिएगो में ही ८४.२ करोड़ डालर व्यय किये थे जब मंदी चल रही थी . क्या सरकार इतनी भूमि म.प्र. में भी उन्हें देगी और वहां के नोबेल पुरस्कार प्राप्त प्राध्यापकों से यहाँ पढ़ वाएगी या उन विश्विद्यालयों से पढ़ वाएगी जो वहां अवैध ढंग से काम कर रहें हैं और उनमे अनेक भारतीय बच्चे भी फंस चुके हैं .देश में शिक्षा के व्यापारिओं ने अपने विश्विद्यालयों तथा महाविद्यालयों को इसी लिए बर्बाद कर दिया है कि लोग इनसे घृणा करें और विदेशी यों की ओर दौड़ें .अपने विश्विद्यालय जहां सरकारों पर बोझ बन चुके हैं , विदेशी संस्थान पैसे देंगे .वे पैसे तभी देंगे जब वे यहाँ से कमाएंगे . सारी जनता देख रही है कि निजी संस्थान एक के बाद अनेक संस्थान खोल रहे हैं , उन्हें कमाई हो रही फिर शासन स्वयं अपने संस्थान क्यों नहीं खोलकर अपनी आय बढाते हैं ? एक ही बात है कि सारी व्यवस्था ही निकम्मी हो गई है और इस निकम्मी व्यवस्था से बर्बादी के अतिरिक्त कोई आशा करना व्यर्थ है .
यही स्थिति सारे प्रदेशों की है क्योंकि उन्हें केंद्र का समर्थन प्राप्त है .विदेशों में जो काला धन जमा किया जाता है वह प्रायः विदेशी सौदों से ही मिलता है . विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति देना ऐसा सौदा है जिसमें कैग के आडिट में फंसने की भी कोई सम्भावना नहीं है .अतः कोई अडंगा न लगा सके , कोई विदेशी संस्थानों के विरुद्ध प्रदर्शन , आन्दोलन न कर सके , केंद्र सरकार ऐसे क़ानून बनाने के लिए प्रतिबद्ध है .इन निकम्मे नेताओं से कोई पूछे कि विदेशों से कुछ लाना ही था तो 'शिक्षा का स्तर 'लाते , अपने विश्विद्यालयों को विश्व स्तर का बनाने का प्रयास करते,नियमित प्राध्यापकों की नियुक्ति करते, उन्हें शोध की सुविधा और प्रेरणा देते .वर्तमान सरकार उदारीकरण (उधारीकरण) के नाम पर भ्रष्टाचार करने के लिए उदारता पूर्वक सब से कर्जे लेकर देश की भावी पीढ़ी को यूरोप के संकट ग्रस्त देशों के समान मुसीबत में डालने का जो कुत्सित प्रयास कर रही है वह घोर अपराध ही नहीं पाप भी है .देश के ठगों को तो ये सरकार पकड़ नहीं पाती ,कोई विदेशी लूट कर ले जाएगा तो रपट भी दर्ज नहीं होगी जैसे भोपाल गैस कांड में हजारों निर्दोष लोगों के हत्यारे एंडरसन के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज करने के स्थान पर देश के तथाकथित रहनुमाओं ने उन्हें बाइज्जत , सुरक्षित उनके घर अमेरिका तक पहुंचवाया था .विदेशी विश्विद्यालय हिन्दुस्तान में फ्रेंचाइसी देकर शिक्षा -सेवा के नाम पर बिना कोई कर दिए खुला व्यापार करेंगे ताकि अपने और अपने देश के लिए धन कमा सके . अपनों को बर्बाद और परायों को आबाद करने का सरकारी सूत्र है ' परहित सरिस धरम नहीं भाई '. पराया जितना पराया होगा , जितनी दूर का होगा उतना ही पुण्य लाभ मिलेगा जो सीधा विदेशी खातों में जमा हो जाएगा .इसलिए ये लोग किसी की बात सुनने के लिए तैयार नहीं हैं .
डा. ए. डी खत्री , एडवोकेट एवं पत्रकार , भोपाल ( पूर्व प्राचार्य , च. शे. आ.शा. अग्रणी स्नातकोत्तर महाविद्यालय , सीहोर , म. प्र.)

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

लोहड़ी - गीत


प्रायः सभी लोग जानते हैं कि प्रत्येक वर्ष १३ जनवरी को पंजाबी लोग लोहड़ी मनाते हैं . रात्रि में आग जलाने के साथ मक्के- मूंगफली ,रेवड़ी बांटने कि परम्परा रही है . इस अवसर पर 'सुन्दर-मुंदरीए हो ....' गीत कभी- कभी गया जाता है जो अकबर द्वारा एक लड़की से विवाह कि जिद करने पर दुल्ला-भट्टीवाला ने उसका सजातीय विवाह करवा दिया था ,की याद का प्रतीक है . लोहड़ी का अवसर विशेष होता है यदि घर में लड़के कि शादी हुई हो या लड़का हुआ हो . सभी धर्म और जातियों में इन्हें सर्वाधिक खुशी का अवसर माना जाता है . अतः यह खुशियों और शुभकामनाओं तथा बधाइयों का त्यौहार है .जहां तक मुझे ज्ञात है कि लोहड़ी के लिए ऐसा कोई गीत नहीं है . अतः यह पहला लोहड़ी-गीत होगा जिसमें खुशिया और बधाइयां व्यक्त की गई हैं .
पहले घर में अनेक बच्चे होते थे , बेटा घर का चिराग माना जाता था .इसलिए उसके जन्म या शादी की ही खुशियाँ मनाई जाती थीं . वर्तमान में एक या दो बच्चे ही होते हैं.
आज तो बेटी को माता - पिता का अधिक शुभ चिन्तक माना जाता है . अतः इस गीत में बेटी के होने या उसकी शादी की खुशियाँ भी व्यक्त की गई हैं तथा सभी रिश्तों को बधाई दी गई है जो निकट और दूर के रिश्तों के रूप में विद्यमान होते हैं .
लोहड़ी गीत

आया लोहड़ी दा त्यौहार , हो आया ......

खुशियाँ खूब मनाओ यार ,

नच्चो -गावो वंडो प्यार ,

मुड़ -मुड़ आवे ऐसा वार ,

कि आया लोहड़ी दा त्यौहार . हो आया ....


मुंडा वोटी लैके आया ,

सोणी वोटी लैके आया ,

खुशियाँ खूब मनाओ यार ,

नच्चो - गावो वंडो प्यार ,

कि आया लोहड़ी दा त्यौहार , हो आया ......


कुड़ी नूँ मस्त दूल्हा मिलया ,

सोणा -सोणा दूल्हा मिलया ,

खुशियाँ खूब मनाओ यार ,

नच्चो गावो वंडो प्यार ,

कि आया लोहड़ी दा त्यौहार ,हो आया ...


मुंडा - कुड़ी सदा सुख पावन ,

तरक्की करन ते वधते जावन ,

जल्दी सोणा पुत्तर आवे ,

(जल्दी सोणी सी धी आवे ,

खुशियाँ घर विच होन अपार) ,

कि आया लोहड़ी दा त्यौहार , हो आया ....


घर विच प्यारा मुंडा आया ,

किलकारियां मारदा सोणा आया ,

(घर विच प्यारी बच्ची आई ,

किलारियां मारदी सोणी आई )

रौशन कीता अन्दर - बार ,

कि आया .......


माता - पिता नूँ ढेर वधाईयां ,

दादी - दादा नूँ अनत वधाईयां ,

नानी - नाना नूँ लख वधाईयां ,

खुशियाँ वद्धन लख -हजार

कि आया ........


भाई - भैंणा नूँ वधाईयां ,

भैया - भाभी नूँ वधाईयां ,

भुआ - फुफ्फड़ नूँ वधाईयां ,

चाची -चाचा नूँ वधाईयां ,

मामी -मामा नूँ वधाईयां ,

मासी - मासड़ नूँ वधाईयां ,

सारे रिश्तां नूँ वधाईयां ,

डाक्टर खत्री दी वधाईयां ,

बचिआं नूँ देवो आशीर्वाद ,

सारी जिन्दगी रहन आबाद ,

खुशियाँ होवन अपरम्पार ,

कि आया .....


सारे मिलके भंगड़ा पावो ,

हस्सो - गावो धूम मचाओ ,

मक्के - रेवड़ी खांदे जाओ ,

मूंगफली , गजक वी मुंह विच पाओ ,

मुड़ - मुड़ आवे ऐसा वार ,

खुशियाँ खूब मनाओ यार ,

कि आया लोहड़ी दा त्यौहार

हो आया ......

डा. . डी. खत्री , भोपाल , .प्र . इंडिया

(वंडो = बांटो , मुड़-मुड़ = बार-बार , वोटी = दुल्हन , सोणी = सुन्दर , वधते = बढ़ते , वद्धन = बढ़ें , धी = बेटी , विच = में , भैंणा = बहन , नूं = को , बार = बाहर , बचिआं = बच्चों , खांदे = खाते , मूँ = मुंह , वी = भी )

सोमवार, 19 सितंबर 2011

अन्ना हजारे , लोकतंत्र और मीडिया

अन्ना हजारे , लोकतंत्र और मीडिया

पद्मभूषण अन्ना हजारे वर्तमान में सर्वधिक चर्चित व्यक्ति हैं . उनका व्यक्तित्व व्यापक तो है ही ,परन्तु उन्हें यह लोकप्रियता मीडिया के सहयोग से ही प्राप्त हुई है . अन्ना हजारे ने लोकतंत्र के जिस प्रमुख विन्दु को उठाने का प्रयास किया , मीडिया ने उस पर ध्यान नहीं दिया . अन्ना हजारे ने कहा कि लोकतंत्र में जनता राजा है . संविधान की प्रस्तावना , ''हम भारत के लोग .....''से प्रारंभ होती है . संविधान , किसी नेता ने नहीं ,भारत के लोगों ने स्वीकृत किया है , अतः जनता सर्वोपरि है और उसकी आवाज सरकार को माननी ही होगी . इस विचार की प्रारंभ से ही उपेक्षा की गई है इसलिए नेता मनमानी करने लगते हैं .. इस सम्बन्ध में प्रधान मंत्री डा. मनमोहन सिंह का बयान भी बहुत विचित्र था . अन्ना के अनशन की समाप्ति पर उनका वक्तव्य ,' पार्लियामेंट की इच्छा ही लोगों की इच्छा है ',पूर्णतयः लोकतंत्र विरोधी है . इसका अर्थ हुआ कि यदि संसद में मंहगाई पर चर्चा के समय अधिकांश सदस्य संसद से गायब थे क्योंकि उनकी दृष्टि में मंहगाई कोई मुद्दा ही नहीं है , का अर्थ हुआ जनता के लिए भी मंहगाई कोई मुद्दा नहीं है . कुछ पत्रों ने उनके वक्तव्य की प्रशंसा भी की . एक अन्य वक्तव्य जिसे मीडिया ने बहुत तूल दिया ,राहुल गाँधी का था कि लोकपाल को संविधान में सम्मिलित किया जाना चाहिए . यह एक सामान्य वक्तव्य है , परन्तु इस पर न्याय मूर्ती संतोष हेगड़े का वक्तव्य भी विचित्र था कि वे राहुल गाँधी से सहमत हैं . आश्चर्य इस बात का है कि न्यायमूर्ति हेगड़े क्या यह बात पहले नहीं जानते थे कि संविधान में न्यायालयों को जो अधिकार दिए गए हैं , यदि किसी संस्था को उसके कार्य क्षेत्र में हस्तक्षेप करने या उससे भी अधिक अधिकार दिए जाते हैं तो यह अधिकार संविधान संशोधन करके ही दिए जा सकते हैं अन्यथा सुप्रीम कोर्ट उस क़ानून को , उस संस्था को अमान्य कर देगा .यदि वे यह सब पहले जानते थे तो उन्होंने अन्ना हजारे को इसके लिए मानसिक रूप से पहले ही क्यों नहीं तैयार किया ? इससे यह स्पष्ट होता है कि मीडिया ने कभी भी लोकतंत्र - संविधान के मुद्दों को गंभीरता से नहीं लिया . इससे ऐसा भी प्रतीत होता है कि मीडिया का कार्य उन सनसनी खेज समाचारों को छापना या दूरदर्शन के चैनलों से प्रसारित करना है जिनसे उन्हें अधिक से अधिक लोकप्रियता मिले .

रविवार, 18 सितंबर 2011

मीडिया और लोकतंत्र

लोकतंत्र और मीडिया
मीडिया स्वयं को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहता है . इसलिए उसे अपना स्वरूप दिखाई ही नहीं पड़ता है .जबकि मीडिया कोई खम्भा नहीं है , वह तो समाज का स्वरूप है और अपने रूप को संवारने का दायित्व भी उसी का है . वास्तविकता यह है कि समाज के सामने लोकतंत्र कि भावना ही स्पष्ट नहीं है . यदि यह हमारी व्यवस्था है तो हम हड़तालें किसके विरुद्ध करते हैं ? यदि यह वास्तव में लोकतंत्र है तो मीडिया किसी नेता पुत्र जैसे राहुल,प्रियंका को देश के एक योग्य नेता के स्थान पर , एक राजकुमार या राजकुमारी और भावी शासक के रूप में किस आधार पर प्रस्तुत करता है ? हमारे पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री और अटल बिहारी बाजपेई सामान्य परिवार से थे और आज के अनेक मुख्यमंत्री जैसे शिवराज सिंह चौहान , नरेन्द्र मोदी , मायावती , ममता बनर्जी आदि भी सामान्य परिवारों से हैं . अतः सर्वप्रथम लोकतंत्र की अवधारणा और प्रजातंत्र से उसके अंतर को भी को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है जो अभी तक केवल 'रजतपथ' पत्रिका में ही दिया गया है .
प्राचीन काल में राजा तलवार की नोक पर बनते थे ,मध्य काल में तोपों और बंदूकों से बनने लगे और प्रजातंत्र में , अब लोगों के वोटों से बन रहे हैं . इसलिए जैसे उन कालों में राजा जनता से प्राप्त टैक्स को अपना समझते थे ,आज भी समझते हैं और उसे बिना किसी शर्म के अपने देशी-विदेशी खातों में जमा कर रहे हैं . फिर इसे भ्रष्टाचार क्यों कहना चाहिए ?
लोकतंत्र के परीक्षण का प्रमुख विन्दु है कि राज्य के कितने लोग देश हित में कार्य कर रहे हैं . एक शिक्षक यदि भावी नागरिक का निर्माण कर रहा है तो वह देश को समर्पित है , यदि वह उदरपूर्ति के लिए अध्यापन कर रहा है तो वह देश को अपना नहीं मानता है .जबकि दोनों स्थितियों में उसे वेतन उतना ही मिल रहा है . यदि भारत में १% लोकतंत्र माने तो क्या देश में १२ करोड़ लोग देश के लिए समर्पित हैं ?क्या ०.१% अर्थात १२ लाख लोग भी देश के लिए समर्पण भाव से कार्य कर रहे हैं ?
लोकतंत्र में मंत्री ,अधिकारी-कर्मचारी तथा जनता एक पंखे के तीन पंखों के सामान होते हैं ,जो कानून रुपी मोटर से जुड़े हों और व्यवस्थापिका रुपी विद्युत् से चल रहे हों .जिस प्रकार पंखे के तीव्र गति से चलने पर तीनों पंख ,मोटर तथा उसमें प्रवाहित होने वाली विद्युत् एकाकार हो जाते हैं , उसी प्रकार जब व्यवस्थापिका,कार्य पालिका और न्याय व्यवस्था का जनता के साथ पूर्ण रूपेण सामंजस्य हो जाये , जब शासन जनता कि इच्छा के अनुसार चले और उन्हें लगे कि सरकार उनकी और उनकी अपनी ही सरकार है , तब उसे लोकतंत्र कहा जायगा .

बुधवार, 14 सितंबर 2011

लिव-इन सम्बन्ध

लिव इन सम्बन्ध : दोषी कौन ?
भोपाल के अमित गुप्ता - अंजली गुप्ता प्रकरण को अत्यंत गंभीरता से लेना चाहिए . भविष्य में इस प्रकार के अन्य प्रकरण न हों ,इसके लिए न्यायालय को बहुत सोच समझ कर निर्णय देना होगा . अमित गुप्ता वायु सेना में ग्रुप कैप्टन है और विवाहित है . अंजली गुप्ता पहले फ्लाईट लेफ्टिनेंट थी और दोनों एक साथ पदस्थ थे . दोनों में लिव इन सम्बन्ध थे . अंजली गुप्ता ने अपने सेवा काल में अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर सेक्स शोषण के आरोप लगाए थे . उसका कोर्ट मार्शल हुआ और उसकी सेवा समाप्त कर दी गयी . परन्तु उसके अमित गुप्ता से सम्बन्ध बने रहे . अमित गुप्ता भोपाल निवासी है , उसके लड़के की सगाई थी . इसी समय अंजली भोपाल उसके पास आई . अमित ने उसे पृथक मकान में रुकवा दिया और स्वयं बेटे की सगाई में बाहर चला गया . पीछे अंजली ने फांसी लगाकर आत्म हत्या कर ली . अमित को अंजली को आत्म हत्या के लिए उकसाने के आरोप में जेल में बंद कर दिया गया है . अंजली के घर वालों का आरोप है कि अमित ने अपनी पत्नी से तलाक लेकर उससे शादी का वायदा किया था और धोखा दिया जिससे दुखी होकर अंजली ने आत्म हत्या कर ली .
अंजली के घर वालों ने यह रहस्योद्घाटन भी किया है कि अमित के कहने से अंजली ने वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध आरोप लगाये थे . यदि आरोप झूठे थे तो सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का यह कृत्य अत्यंत आपत्तिजनक एवं निंदनीय है . यदि आरोप सही थे और अमित के कहने पर लगाये गाये थे ,अपनी इच्छा से नहीं तो इसका अर्थ हुआ अंजली को संबंधों में कोई आपत्ति नहीं थी और उसने अमित को खुश करने के लिए ऐसा किया . कुछ भी हो अंजली ने एक बड़ा अपराध किया था जिससे उसकी नौकरी चली गई . जहाँ तक अमित - अंजली के विवाह का प्रश्न है तो अमित विवाहित है , हिन्दू है . हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार न तो वह दूसरी शादी कर सकता है और न आसानी से उसे तलाक मिल सकता है . क्या अंजली के घर के लोग यह नहीं जानते ? स्त्री हो या पुरुष , किसी के परिवार को तोड़ना , पति को पत्नी के विरुद्ध भड़काना एक गंभीर अपराध है क्योंकि इससे व्यक्ति पत्नी से छुटकारा पाने के लिए उसे मारने -पीटने से लेकर उसकी हत्या तक कर सकता है अथवा धर्म बदल कर पारिवारिक कलह उत्पन्न कर सकता है जैसा हरयाणा के पूर्व उप मुख्यमंत्री चन्द्र मोहन ने किया था . क्या हमारा कानून इसकी इजाजत देता है ?अंजली- अमित वयस्क होने के कारण लिव इन संबंधों के लिए स्वेच्छा से तैयार थे . अतः विवाह का वायदा होना या न होना क्या अर्थ रखता है ?
संसद और न्यायालय लिव इन संबंधों के लिए स्पष्ट कानून बनायें . यदि यह स्वच्छंदता और मस्ती है तो इसमें दोनों समान भागीदार हैं . कोई लेनदार - देनदार नहीं है . यदि यह विवाह के तुल्य मान्य है तो हिन्दू क़ानून में विवाहित स्त्री- पुरुष के सम्बन्ध में इसे किस रूप में लागू किया जायगा -- स्त्री या पुरुष को एक से अधिक विवाह करने की सुविधा होगी या प्रेमी- प्रेमिका से विवाह केलिए उसे तत्काल तलाक मिल जायगा या दोनों को अवैध सम्बन्ध बनाने का दोषी मानकर दण्डित किया जायगा ? यदि लम्बे समय तक कोई बिना विवाह के रहता है तो संतान का भार किस पर होगा ,
एक का निधन होने पर उसकी संपत्ति का हक़दार उसका लिव इन साथी होगा या स्त्री- पुरुष के परिवार के लोग होंगे ? यदि लिव इन वाले स्त्री-पुरुष अन्यत्र सम्बन्ध बनाते हैं तो उन्हें पूरी छूट होगी अथवा उन्हें कोई सजा मिलेगी ?
दूसरा यह प्रश्न भी महत्त्व पूर्ण है कि यदि सेना में स्त्री अपने देश के सैनिकों के मध्य असुरक्षित है तो विदेशियों के हाथ पड़ने कि स्थिति में उसकी क्या दशा होगी ? इसलिए स्त्रियाँ किस सीमा तक और किन कार्यों के लिए सेना में भरती हों ,इसपर भी समुचित विचार- विमर्श होना चाहिए . प्रत्येक मामले में स्त्री -अधिकारों कि बात करना ही पर्याप्त नहीं है .


बुधवार, 7 सितंबर 2011

इ -पत्रिका 'हस्तक्षेप' के संपादक का अन्ना को सांप्रदायिक मानना

प्रिय अमलेंदु जी,
अन्ना हजारे पर आपके विचार समझे . आपके अनुसार कांग्रेस को भ्रष्टाचार का पूरा अधिकार है क्योंकि उसे आप जैसे लोगों का भरपूर समर्थन प्राप्त है . आर.एस.एस. सांप्रदायिक है , उसे तो मुंह खोलने का अधिकार भी नहीं है , कांग्रेस का भ्रष्टाचार रोकने वाले वे कौन होते हैं ? जो भी कांग्रेस के भ्रष्टाचार को रोकने का प्रयास करेगा उसे साम्प्रदायिक कहा जायेगा . काश ! आपने अन्ना हजारे को यह बात पहले समझा दी होती तो वे सांप्रदायिक होने से बच जाते . अब तो आपने उन्हें सांप्रदायिक होने का प्रमाण पत्र दे ही दिया है , वे पीछे हटेंगे तो भी आप और आप जैसे भ्रष्टाचार समर्थ कांग्रेसी उनके पीछे पड़े ही रहेंगे . आपने तो अन्ना जी के सामने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा .अच्छा होगा आप दिल्ली में एक तम्बू लगाकर भ्रष्टाचार के समर्थन में खा-पीकर आन्दोलन करें . आपकी महफ़िल में में इतने सारे भ्रष्टाचारी ,अपने दल-बल और धन दौलत के साथ आ जायेंगे की लोग अन्ना का नाम ही भूल जायेंगे .