मंगलवार, 21 मार्च 2017

करनी का फल

करनी का फल

करनी का फल पाएँगे, यह ईश्वर का न्याय.
बोया बीज बबूल का, आम कहां ते खाय..
उदहारण : १. अमेरिका के निर्माता मानवीय सोच के थे. उन्होंने लोकतान्त्रिक व्यवस्थाएं स्थापित कीं. इसलिए वहां लोकतंत्र है. २. नव भारत का जन्म गांधीजी के आन्दोलन से हुआ. इसलिए भारत आंदोलनों से चल रहा है. सेना, प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति, राज्यपाल तथा जजों को छोड़ दें जो गाँधीवादी नहीं हैं तो शेष सारे लोग आन्दोलन करते मिलेंगे. इससे देश में अराजकता की स्थिति निर्मित हुई है. ३. पाकिस्तान का निर्माण आतंकवादी जिन्ना ने किया था, वहां निरंतर आतंकवाद का विकास हो रहा है.४. नेपाल के हिन्दू लोग भाग्यवादी रहे. शुद्ध भाग्यवादी पशु तुल्य बेचारा होता है. वह स्वयं कुछ नहीं कर पाता. जितना ईश्वर ने दे दिया, उसी में जीवन व्यतीत करना पड़ता है. इसलिए नेपाल आज भी गरीब है.५. भारत में ब्राह्मणों-क्षत्रियों ने जातिवाद के बीज बोए, आज उनकी संतानें उसी का फल भोग रही हैं.
यदि देश में स्थाई शांति और सुख चाहिए तो सबको परस्पर प्रेम से रहना होगा, परस्पर सहयोग और विकास की भावना विकसित करनी होगी, सुरक्षा, शिक्षा और न्याय व्यवस्था सुदृढ़ और सक्रिय करनी होगी तथा अपने देश को अपना देश कहने में गौरव का अनुभव करना होगा. 

सोमवार, 13 मार्च 2017

होली की शुभकामनाएँ
होली है रंगों का पर्व, खुशियों का त्यौहार.
सबके रंग में जो रंग जाए, खुशियाँ अपरम्पार..
रंगे होते हैं सबके चेहरे, पीले-लाल-गुलाबी,
भंग की मस्ती तन में डोले, मन हो जैसे शराबी.   
होली के रंगों में रंग कर, मन में भाव जो आते,  
मन के मैल हैं धुल जाते, जब प्यार से गले लगाते.
मीठे-नमकीन का स्वाद मधुर, होली में लगता न्यारा,
तन-कपड़ों का रंग जटिल, दे मस्ती ज्यों हुरियारा.
रंग पुतें जब अहं पे अपने, दिल विस्तार है पाता,

दिल से दिल का मेल है होता, आनंद रंग बिखराता.

गुरुवार, 9 मार्च 2017

चुनाव २०१७ 

चुनाव २०१७ के परिणाम मैंने चुनाव प्राम्भ होने के साथ ही लिख दिए थे. मैंने चुनाव को प्रभावित करने वाले सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक कारकों का विस्तृत विश्लेषण  करने के बाद अपने अनुमान लिखे हैं. यदि इनमें अधिक विचलन होता है तो उसका कारण नोटा होगा. ये परिणाम मेरी फेसबुक पर दिनांक १० फरवरी२०१७ को पोस्ट किए गए थे तथा मेरी पत्रिका 'रजतपथ' के वर्ष ८ अंक १-२ (अगस्त-नवम्बर २०१६ संयुक्तांक )में फरवरी में प्रकाशित हुए हैं. 


उ.प्र.(४०३)     (एनडीए)१८०-१९०,    (कांग्रेस)३५-५०,      (सपा) १२०-१३०,      (बसपा) ४०-५०,     (अन्य ) ५-१०, 

पंजाब(११७)        (एनडीए)५०-५५ ,     (कांग्रेस)४०-४५ ,    (आप) २५-३०,                                (अन्य) २-३ 

उत्तराखंड(७०)    (एनडीए)३५-४०,      (कांग्रेस)२५-३०,                                                        (अन्य) ३-५ .

मैं कभी गोवा और मणिपुर नहीं गया. अतः वहां का अनुमान नहीं लगा सकता. 


मेरी उक्त पत्रिका भी यहाँ पर उपलब्ध है . उसमें कम्पोजिंग की त्रुटि  के कारण टेबल बाईं ओर खिसक गई है जिससे परिणाम समझने में भ्रम उत्पन्न हो रहा है. उसे उक्तानुसार पढ़ा जावे.  

सोमवार, 30 जनवरी 2017

ढोल, गंवार शूद्र, पशु, नारी. सकल ताड़ना के अधिकारी..

ढोल, गंवार शूद्र, पशु, नारी. सकल ताड़ना के अधिकारी..
   यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के सुंदर कांड में ५८ वें दोहे की छठी चौपाई है. अनेक लोगों ने, जो साहित्य की भाषा नहीं समझते, हिन्दू संस्कृति और धर्म से घृणा करते हैं, पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं, घोर आत्मनिष्ठ हैं, अपनी बात के आगे किसी की बात सुनना नहीं चाहते, इस चौपाई का मनमाना अर्थ निकाल कर तुलसीदास जी की कटु निंदा की, उनके लिए अपशब्दों का प्रयोग किया, समाज में भ्रम फ़ैलाने का प्रयास किया और करते आ रहे हैं कि उन्होंने शूद्रों और स्त्रियों को मारने-पीटने की बात की है. जबकि ऐसी कोई बात नहीं है.
    सामान्य जन भी चौपाई का यही अर्थ निकालते हैं कि इसमें वर्णित लोगों को दण्डित करते रहना चाहिए जबकि इसका यह अर्थ नहीं है. और तो और गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित रामचरित मानस में इस चौपाई का अर्थ लिखा है,
      ढोल, गंवार शूद्र, पशु और नारी, ये सभी दंड के अधिकारी हैं.’
    हम वस्तुनिष्ठ रूप से विभिन्न दृष्टिकोणों से तर्क, साक्ष्य और इसके व्यवहारिक स्वरूप के आधार पर इसकी विवेचना करेंगे ताकि इसका अर्थ किसी भी संदेह से परे और सही ढंग से समझा जा सके.
प्रथम दृष्टिकोण : शब्दकोश के आधार पर : इस चौपाई के सही अर्थ को समझने के लिए मैंने हिंदी एवं अंग्रेजी शब्दकोश के आधार पर पहले चौपाई के हिंदी शब्दों के तुल्य अंग्रेजी शब्द और पुनः उनके लिए हिंदी शब्द लिखे हैं जो प्रारम्भ में ही दिए गए हैं. वहां भी सभी शब्दों का अर्थ वही लिखा है जो सामान्य रूप से प्रचलित है और जैसा कि अधिकांश लोग समझते आ रहे हैं.
  हिंदी-अंग्रेजी ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश में चौपाई में आए शब्दों के अर्थ इस प्रकार हैं,   
ढोल : drum, गंवार  : vulgar,   ill  bred,  primitive,  snobbish,   barbarian, fatous,  uncivilised, stupid, foolish,  A hodge,  a villager,  a boor, a snob, a clown, a bumpkin,
शूद्र : fourth caste of Hindus,  पशु  :  cattle, beast, नारी : woman,  a female, pipe (नली)
ताड़न : Whipping      (कोड़े या बेंत की मार), Chastisement  (दंड, सुधार), Hit (मारना, पीटना), Reproof  (निंदा, भर्त्सना), Admonition  (उपदेश, चेतावनी, निर्देश), Whack(जोर से पीटना), Vapulation (कोड़े की मार), Penalty (दंड, जुर्माना), Rebuke (डांटना), Censure(निंदा).
‘ताड़ना’ ताड़न संज्ञा का क्रिया रूप है.
अधिकारी : Proprietor (स्वामी), Rular (शासक), Heir (उत्तराधिकारी), An officer (एक अधिकारी), Master  (स्वामी), An athaurity (पदाधिकारी), Occupier(आधिपत्य कर्ता),
One who is possessed of a right or title or privilege जिसके पास कोई विशेषाधिकार हो.
शूद्र : किसी के लिए शूद्र शब्द प्रयोग करने को अब तो प्रतिबंधित कर दिया गया है. जैसा कि शब्दकोश (गूगल पर)  में लिखा है इसका अर्थ हिन्दू सामाजिक व्यवस्था का चौथा वर्ण ही है. कार्य के अनुसार हिन्दु समाज चार वर्णों में विभाजित था. प्रथम ब्राह्मण (धर्म-कर्म और शिक्षा देने का काम), दूसरा क्षत्रिय( सेना, सुरक्षा एवं राज्य-व्यवस्था संचालन का काम), तीसरा वैश्य (उद्योग, व्यवसाय का काम) और चौथा शूद्र, जिसके अंतर्गत सभी प्रकार की सेवाएं आती थीं. कालान्तर में ये वर्ण कर्म के स्थान पर जन्म-परिवार आधारित हो गए तथा अनेक जातियों का निर्माण होता चला गया. शूद्र वर्ण से भी अनेक जातियां बाहर निकल गईं, मुक्त हो गईं जो वर्तमान में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) कहलाते हैं. इस प्रकार वर्ण के स्थान पर जातियां प्रमुख हो गईं. शूद्र के अंतर्गत आने वाली जातियों में सफाई कामगार, चर्मकार जैसे काम करने वाले लोग ही समझे जाने लगे. श्मशान घाट पर मुर्दों की व्यवस्था में लगे लोगों को तो उससे भी नीचे ‘चांडाल’ नाम दिया गया. ये सब लोग समय के साथ-साथ अछूत माने जाने लगे अर्थात शूद्र और अछूत समानार्थी शब्द हो गए. शूद्रों को समाज से अलग-थलग कर दिया गया. उनकी पीढ़ियाँ सामान्य मानवीय अधिकारों से वंचित होती गईं. वे शिक्षा रहित हो गए और पिछड़ते चले गए, गरीब होते गए.   
  वर्तमान अर्थतांत्रिक युग में समाज का विभाजन मुख्यतः शासक-प्रशासक वर्ग, उद्यमी-व्यवसायी वर्ग और सेवा वर्ग में किया जाता है. आज सेवक या सेवा-वर्ग में वकील, डाक्टर, प्रबन्धक, सलाहकार, शिक्षक आदि से लेकर श्रमिक, सफाई कामगार आदि तक सभी लोग आ जाते हैं जो वेतन लेकर कार्य करते है अथवा अनुबंध पर कोई कार्य करते हैं. उदहारण स्वरूप अमेरिका में ड्राइवर का अर्थ मात्र ड्राइवर की नौकरी करने वाला ही नहीं है, उसके अंतर्गत वे सभी लोग आ जाते हैं जो अपना या किसी का वाहन, कार आदि चला रहे हैं वे भले ही कितने बड़े अधिकारी या प्रबन्धक क्यों न हों.             
     यदि हम इनका अक्षरशः अर्थ लेते हैं, तो यह अनर्थ हो जाता है. ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश के अनुसार अधिकारी शब्द का सीधा अर्थ है, वह व्यक्ति जिसके पास कोई विशेष अधिकार है, किसी उच्च पद पार नियुक्त हो. उसके अनुसार ‘दंड के अधिकारी’ का क्या अभिप्राय होगा ? यदि हम कहते हैं आयकर के अधिकारी तो उसका स्पष्ट अर्थ होता है वह अधिकारी जो आयकर वसूलने का अधिकार रखता है. वित्त का अधिकारी, शिक्षा का अधिकारी, स्वास्थ्य का अधिकारी आदि. क्या इनसे यह परिलक्षित नहीं होता कि ये पदाधिकारी उन-उन विभागों के विशिष्ट अधिकार रखते हैं ? क्या इससे विपरीत अर्थ निकाल कर आयकर के अधिकारी से कोई अन्य व्यक्ति आयकर वसूल सकता है? क्या शिक्षा के अधिकारी को ही कक्षा में बैठाकर पढ़ाने लगेंगे अथवा स्वास्थ्य के अधिकारी को स्वस्थ रखने के लिए दूसरे लोग उसे दवाएं खिलाएंगे, सुइयां लगाएंगे ?
   इस परिप्रेक्ष्य में यदि शब्दकोश में दिए गए अर्थ के आधार पर उक्त चौपाई का अर्थ किया जाय तो वह निकलेगा ‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी ये सब (दूसरों को ) दंड (देने) के अधिकारी हैं. यदि कोई व्यक्ति एक ओर किसी को अपराधी की भांति दंडित किए जाने वाला कहता है और उसके साथ ही उसे ‘अधिकारी’ भी कहता है अर्थात अधिकारी को ही दंडित करने की बात करता है तो यह कैसे सुसंगत होगा ? क्या ऐसा व्यवहार में सम्भव है ? दंड देने के अधिकारी तो होते हैं परन्तु दंड पाने या पिटने के ‘अधिकारी’ नहीं, वे तो अपराधी कहलाते हैं, जबकि चौपाई में उन्हें अधिकारी कहा गया है.
द्वितीय दृष्टिकोण : ताड़ना का प्रचलित अर्थ :अब विवादास्पद शब्द ‘ताड़ना’ का व्यावहारिक अर्थ देखें. एक व्यक्ति किसी पर आक्षेप करता है, ‘वह मुझे ताड़ रहा था’. वह ‘बहुत दिनों से हमारे घर को ताड़ रहा था’, ‘बातचीत के समय ही मैंने ताड़ लिया था कि वह क्या चाहता है’. इनके अनुसार ‘ताड़ना’ का अर्थ ध्यान से देखना है, किसी गूढ़ रहस्य के हेतु देखना है, किसी व्यक्ति की गतिविधयों को परखना है. इन वाक्यों के आधार पर ताड़ना का व्यवहारिक अर्थ तो दंड देना कहीं से भी सिद्ध नहीं होता है. शब्दकोशों में और स्वयं चौपाई में उसका अर्थ दंड कैसे निकाल लिया, किन वाक्यों के आधार पर निकाल लिया गया, यह समझ से परे है. इस चौपाई का विपरीत अर्थ निकालने वालों को कुछ वाक्यों के उदाहरण देने चाहिए जिनके आधार पर ‘ताड़ना’ का अर्थ ‘दंड देना’ या ‘मारना’,सिद्ध होता हो. ताड़ना और प्रताड़ना में अंतर ध्यान में रखना चाहिए. ताड़ना का नहीं, प्रताड़ना का अर्थ होता है दंडित करना.
तृतीय दृष्टिकोण : अर्थ की व्यवहारिकता  यदि हम मान लें कि इस चौपाई में ताड़ना का अर्थ इन सब को दंड देना ही सही है तो उसका व्यावहारिक रूप भी देख लीजिए. ढोल को जोर-जोर से पीटते जाइए. उससे कर्कश ध्वनि निकलेगी जो उसे पीटने वाले को ही कष्ट देगी और बेरहमी से पीटने पर ढोलक फट जाएगी और टूट भी जायगी. उसे पीटकर किसी को हानि के अतिरिक्त और क्या मिलेगा?
    गंवार किसे कहेंगे ? ग्रामीण को, अपढ़ को, अज्ञानी को या असभ्य व्यक्ति को ? कितने लोग कितने लोगों को गंवार कहकर पीटते रह सकते हैं. और यदि तथा कथित गंवार-ग्रामीण व्यक्ति आपसे पहलवान निकला तो क्या होगा ? यदि पीट-पीट कर उसे घायल भी कर दिया या मार भी डाला तो पीटने वाले को क्या मिला ? कोई व्यक्ति कितने गंवारों को रोज मारता फिरेगा ? वह अपना काम कब करेगा ? वह कमाएगा क्या ? खायेगा क्या ? हां, उसकी अनेक लोगों से शत्रुता अवश्य हो जायगी जिससे उसकी जान को ही खतरा उत्पन्न हो जायगा. वर्तमान युग में तो वह जेल में ही पड़ा रह जाएगा.
    शूद्र अर्थात सेवक को कोई रोज मारेगा तो वह उससे क्या काम ले पायेगा ? रोज-रोज पिटने वाला भी काम छोड़ कर भाग जायगा या क्रांति कर बैठेगा, मालिक को ही मार देगा. वर्तमान परिस्थितियों में ऐसे मालिक को कठोर कारावास निश्चित मिलेगा. भला कोई क्यों ऐसा काम करेगा जिससे शुद्ध हानि मिलती हो ?
   पशु को पाल कर रोज मारेंगे तो वह आपके किस काम आएगा ? किसी दिन मरा पड़ा होगा. दूसरे पशुओं को भी कितना और कब तक मार सकते हैं ?
     नारी को मारेंगे तो क्या होगा ? यदि पत्नी को मारेंगे तो आपका पारिवारिक जीवन नर्क हो जायगा. दूसरे की नारी को मारेंगे तो वह आपकी जान ले लेगा. अतः ताड़ना का अर्थ उनको पीटना, मारना तो कहीं से भी सही नहीं लगता है.
चतुर्थ दृष्टिकोण : अधिकारी : अब शब्दकोश से परे हटकर ‘अधिकारी’ शब्द की विवेचना करते हैं. प्रजातांत्रिक एवं लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में सामान्य नागरिकों को भी अनेक अधिकार प्राप्त हैं. दूसरे शब्दों में हम कहते हैं कि सभी नागरिक शिक्षा, न्याय, व्यवसाय, अभिव्यक्ति, आवागमन आदि की  स्वतन्त्रता और समानता के अधिकारी हैं. यहाँ भी अधिकारी का अभिप्राय उसमें निहित उन अधिकारों से है जो व्यक्ति के व्यक्तित्व और विकास के लिए आवश्यक हैं, उसके हित में हैं, उसके लिए लाभकारी हैं. वर्तमान में लोग इन अधिकारों का पूरा सदुपयोग कर रहे हैं, जिन देशों में या जिन लोगों को ये अधिकार प्राप्त नहीं हैं, वे इन्हें प्राप्त करने के लिए संघर्ष रत हैं. क्या कुटने-पिटने का अधिकार भी इसी प्रकार का कोई अधिकार हो सकता है ? यदि हम इसका यही अर्थ निकालें तो इसका अभिप्राय हुआ कि ढोल. गंवार, शूद्र, पशु और नारी स्वयं ही कह रहे हैं कि हम पिटने के अधिकारी हैं, हमें मारो-कूटो ताकि हम अपने कुटने-पिटने के अधिकार का सदुपयोग कर सकें. क्या कोई ऐसे अधिकार रखने की इच्छा की कल्पना भी कर सकता है ?       
पांचवां दृष्टिकोण : ताड़ना का सामान्य अर्थ है समझना और गहराई से समझना, मनोवैज्ञानिक ढंग से समझना.
    ढोलक को समझने वाला ही उसे अच्छी प्रकार बजा सकता है, उसके साथ भजन-गीत गा सकता है जो कर्णप्रिय हों, आनंद देने वाले हों. गंवार अर्थात असभ्य या अज्ञानी व्यक्ति की अज्ञानता को समझकर, उसके ज्ञान के स्तर को समझ कर, उससे बात और व्यवहार करना चाहिए. यदि व्यवहार में उसमें कोई कमी दिखती है तो उसे ज्ञान देना चाहिए, समझाना चाहिए. शूद्र अर्थात सेवा प्रदाता या सेवक के स्तर को समझ कर उसी के अनुरूप उसे काम सौंपना चाहिए. आवश्यकता होने पर उसे अच्छा शिक्षण–प्रशिक्षण भी देना चाहिए ताकि वह स्वामी की आवश्यकतानुसार काम कर सके. वकील को सेवा में रख कर उससे कोई फैक्ट्री में उत्पादन करवाना चाहेगा तो कैसे करवा पायेगा ? इसलिए पहले सेवा देने वाले सेवक के गुण को समझो(ताड़ो), उसकी क्षमता को समझो और उसी के अनुसार उनसे व्यवहार करो, उनकी सेवाओं का लाभ उठाओ.
छठा दृष्टिकोण : चौपाई का सन्दर्भ : रामचरित मानस के सुंदरकांड के ५८ वें दोहे के बाद यह छठी चौपाई समुद्र द्वारा श्री राम से कही गई है. जब लंका पर चढ़ाई करने के लिए श्री राम समुद्र तट पर पहुंचे तो उन्होंने समुद्र से उस पार जाने के लिए मार्ग माँगा. तीन दिन तक उससे अनुनय-विनय करते रहे कि वह जाने के लिए मार्ग दे दे. परन्तु उन्हें मार्ग नहीं मिला. तब क्रोधित होकर उन्होंने धनुष पर बाण चढ़ाकर कहा कि वे समुद्र को तीर से सुखा देंगे ताकि उनकी सेना समुद्र के उस पार, लंका तट पर उतर जाय. उनके क्रोध से भयभीत हुआ समुद्र ब्राह्मण रूप धरकर उनके सम्मुख उपस्थित हुआ और हाथ जोड़ कर विनम्रता पूर्वक कहने लगा,
 दोहा (५८) :(काकभुशुण्ड जी कहते हैं – हे गरुड़ जी सुनिए ), चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है. नीच विनय से नहीं मानता, वह डांटने पर ही झुकता है (अर्थात सही रास्ते पर आता है).   
 चौपाइयां : हे नाथ ! मेरे सब अवगुण (दोष) क्षमा कीजिए. हे नाथ ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी – स्वभाव से ही इनके कार्य जड़(निर्जीव) प्रकृति के हैं.१-२.
  आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि(चर-अचर जगत) के लिए उत्पन्न किया है, सब ग्रन्थों में यही कहा गया है. जिसके लिए स्वामी की जैसी आज्ञा (निर्धारित कार्य) है, वह उसी प्रकार के कार्य में सुख का अनुभव करता है अर्थात वैसा ही कार्य करता रहता है.३-४.
  प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे सीख दी है. परन्तु यह (हमारे काम की) मर्यादा भी तो आपकी ही दी हुई है. ढोल, गंवार, शूद्र, पशु और नारी – ये सब ताड़ना ( समझने-समझाने-ज्ञान प्राप्त करने) के अधिकारी हैं.५-६.
(यदि आप मेरे ऊपर बाण चलाते हैं तो) प्रभु के प्रताप से मैं सूख जाऊंगा. सेना उस पार उतर जायेगी, इसमें मेरी बड़ाई नहीं है ( परन्तु इससे अनेक जीवों को संरक्षण देने की मेरी मर्यादा जो आपके द्वारा निर्धारित की गई है, टूट जायेगी). प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता, ऐसा वेद गाते हैं. अब आपको जो अच्छा लगे मैं तुरंत उसे करूं.७-८.
दोहा (५९) : समुद्र के अति विनीत वचन सुनकर कृपालु श्री राम ने मुस्काते हुए उससे कहा, हे तात ! जिस प्रकार वानरों की सेना उस पार उतर जाए, वह उपाय बताओ ( मुझे तो मात्र इतना ही चाहिए).   
   इस वार्तालाप से स्पष्ट है कि,
१.     कथा सुनाने वाले कागभुशुंड जी भी नीच के विनय न मानने पर डांटने के लिए कहते हैं, मारने-कूटने के लिए नहीं, दंडित करने के लिए नहीं. आज अपराधियों की सजा के सन्दर्भ में जिन मानवाधिकारों और सभ्य सुधारों की बात की जाती है, वह इस दोहे में निहित है. यह भारतीय संस्कृति का आदिकाल से अंग रही है क्योंकि तुलसीदास ने भी प्रचलित नीतिशास्त्र के अनुसार ही यह कहा है. 
२.     उक्त चर्चित पंक्तियाँ राम या तुलसीदास नहीं कह रहे हैं, स्वयं समुद्र राम से कह रहा है. क्या वह स्वयं राम से कहेगा कि मुझे दंडित करो, मुझे मारो ?
३.     चौपाई (७-८) में वह राम से कहता है कि आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं हो सकता. यदि आप तीर चलाकर मुझे सुखाएंगे तो मैं सूख जाऊंगा.( आप चाहें तो ऐसा कर सकते हैं परन्तु मर्यादा टूटने से सृष्टिक्रम बाधित होगा). आप तो यह बतलाइए कि आप क्या चाहते हैं.
४.     उसकी बात पर राम क्रोधित न होकर मुस्कुराते हैं और अपनी समस्या बताते हैं, उस पार जाने का उपाय पूछते हैं.
   आगे की कथा में समुद्र राम को उस पार जाने का उपाय बताता है जिसके आधार पर वे सेना सहित लंका तट पर पहुँच जाते हैं. राम कथा के इस प्रसंग से यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति को जिससे सेवाएं लेनी हैं, वह पहले उसे अच्छी प्रकार समझे(ताड़े), तभी वह उसकी सेवाओं का लाभ उठा सकता है.
  अतः ताड़ना का अर्थ दंडित करना, सज़ा देना कहीं से भी सिद्ध नहीं होता, न ही उस अर्थ से व्यवहारों की संगतता प्रगट होती है. इसका अर्थ है उन्हें समझना और वे इसके अधिकारी हैं कि उन्हें उचित ढंग से समझाया जाय.
सप्तम दृष्टिकोण : साहित्य में अर्थ और व्याख्या : साहित्य में अनेक उपमाओं और अलंकारों का प्रयोग होता है. उनके सन्दर्भ और कथा या विचारों के परिप्रेक्ष्य में ही उनके अर्थ किए जाते हैं, अक्षरशः नहीं किए जाते क्योंकि उनसे अनर्थ भी निकल सकता है. उदाहरण देखिए,
 स्त्रियों की सुन्दरता के लिए अनेक प्रकार की उपमाओं का प्रयोग होता है. कभी कहा जाता है कि ‘ वह तो नाजुक कली है’. क्या इसका अर्थ यह निकाला जाय कि वह एक वनस्पति है, आज कली है, कल फूल बनेगी और परसों उसका जीवन समाप्त हो जायगा ? कहीं कहा जाता है कि वह चन्द्रमुखी है. क्या इसका अर्थ यह लेंगे कि उसका चेहरा चाँद से लाई गई मिट्टी या पत्थरों से बनाया गया है ?
   किसी शूरवीर के लिए कहा जाता है कि वह तो शेर है. क्या इसका रथ हुआ कि वह वास्तव में शेर है और दूसरों को मारकर खा जाता है, उससे बच कर रहो ? सुर सम्राज्ञी लता मंगेश्कर के लिए कहा जाता है कि उनके गले में सरस्वती का वास है. क्या इसका अर्थ हुआ कि उनके गले में सरस्वती जी कमल बिछाकर उस पर वीणा लेकर गा रही हैं जैसा कि चित्रों में दिखाया जाता है ?
साहित्यिक दृष्टिकोण : यह सही है कि किसी पुस्तक में आया वाक्य उसके लेखक के नाम ही होता है. परन्तु जब किसी कथा या कथानक को कहानी, उपन्यास अथवा काव्य का रूप दिया जाता है तो उसमें एक या अनेक पात्रों के सृजन के साथ उनकी  परिस्थितियों एवं प्रकृति आदि का चित्रण भी किया जाता है. पात्र अच्छे और महान भी हो सकते हैं और चोर-डाकू, विदेशी शत्रु आदि भी हो सकते हैं. रचनाकार की सफलता इस बात पार निर्भर करती है कि वह पात्रों एवं परिस्थितयों का कितना भेदन कर पाता है, उनके मनोभावों और कार्यों को कितना जीवंत कर पाता है. फिल्म शोले में गब्बर को अत्यंत क्रूर दिखाया गया है. क्या इसके लिए उससे उसके कहानीकार, संवाद लेखक अथवा निर्माता-निर्देशक की आलोचना की गई ?, क्रूरता पूर्ण संवादों और दृश्यों के लिए उनकी निंदा की गई ? उन संवादों और दृश्यों से तो फिल्म अत्यंत लोकप्रिय एवं विशिष्ट हो गई और फिल्म के पात्रों समेत उनके रचनाकारों, फिल्मकारों की भी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई. इसलिए रामचरित मानस के संभाषणों के लिए तुलसीदास जी की भी आलोचना कैसे की जाती है. रचनाकार की समीक्षा तो रचना के विभिन्न पक्षों के सन्दर्भ में होती है कि उसने पात्रों और परिस्थितियों को कितना प्रभावशाली बनाया है. अतः इस सन्दर्भ में जो लोग तुलसीदास जी की निंदा करते हैं, वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं अथवा अज्ञान के कारण साहित्य के मर्म को नहीं समझते.  

    जितनी बड़ी साहित्यिक कृति होती है, उसे समझने के लिए भी उतना अधिक ज्ञान एवं लगन आवश्यक होती है. उसे शब्दों के नहीं, भाव के द्वारा, कहानी और विचारों की तारतम्यता के आधार पर समझना होता है. रामचरितमानस तो उत्कृष्ट स्तर की मात्र एक साहित्यिक कृति ही नहीं है, वह तो दर्शन, धर्म, संस्कृति, नीति, समाज, मनोविज्ञान, व्यवहारिकता, ज्योतिष आदि अनेक विषयों के ज्ञान का अगाध महासागर है. उसका आनन्द लेना है तो साहित्यिक भाषा को समझने का ज्ञान प्राप्त कीजिए, उसमें शुद्ध हृदय से डुबकी लगाइए और फिर मनोविकारों को दूर करने वाले प्रत्येक दोहे और चौपाई के अलौकिक आनंद का रसास्वादन कीजिए.                 

रविवार, 11 जनवरी 2015

लोहड़ी गीत

     लोहड़ी गीत
आया लोहड़ी का त्यौहार,
हो आया लोहड़ी का त्यौहार
खुशियाँ खूब मनाओ यार,
नाचो-गाओ, बांटो प्यार,
मंगलमय हो यह त्यौहार,
कि आया लोहड़ी का त्यौहार,
हो आया लोहड़ी का त्यौहार.

बेटा दुल्हन ब्याह के लाया,
अच्छी बहू को लेकर आया,
घर में सब के मन को भाया,
सुखी रहे उनका संसार,
खुशियाँ खूब मनाओ यार,
नाचो-गाओ,  बांटो प्यार,
मंगलमय हो यह त्यौहार,
कि आया लोहड़ी का त्यौहार, हो आया लोहड़ी का त्यौहार.

बेटी ने सुन्दर दूल्हा पाया,
सीधा-सच्चा साथी पाया,
प्यार का मिलकर कदम बढ़ाया,
उमंगें छाएँ उनके द्वार,
मंगलमय हो यह त्यौहार,
कि आया लोहड़ी का त्यौहार, हो आया लोहड़ी का त्यौहार.

दोनों जीवन सुखी बिताएं,
उन्नति करें और बढ़ते जाएँ,
जल्दी सुन्दर बेटा आए,
जल्दी प्यारी बेटी आए,
छाए खुशियों की बहार,
मंगलमय हो यह त्यौहार,
कि आया लोहड़ी का त्यौहार, हो आया लोहड़ी का त्यौहार.

घर में सुन्दर बालक आया,
उसने सबका मन भरमाया,
आनंद-मंगल घर में छाया,
( घर में प्यारी बेटी आई,
कन्या सबके मन को भाई,
आनंद-खुशियाँ घर में छाईं,)
जगमग रौशन है घर-द्वार,
मंगलमय हो यह त्यौहार,
कि आया लोहड़ी का त्यौहार, हो आया लोहड़ी का त्यौहार.

माता-पिता को बहुत बधाई,
दादी-दादा को अनंत बधाई,
नानी-नाना को कोटि बधाई,
बढ़ें खुशियाँ लाख-हजार,
मंगलमय हो यह त्यौहार,
कि आया लोहड़ी का त्यौहार, हो आया लोहड़ी का त्यौहार.

भाई-बहनों को बधाई,
भैया-भाभी को बधाई,
बुआ-फूफा को बधाई,
चाचा-चाची को बधाई,
मामा-मामी को बधाई,
मौसी-मौसा को बधाई,
सारे रिश्तों को बधाई,
डाक्टर खत्री की बधाई,
बच्चों को देओ आशीर्वाद,
सारी जिन्दगी रहें आबाद,
खुशियों होवें अपरम्पार,
मंगलमय हो यह त्यौहार,
कि आया लोहड़ी का त्यौहार, हो आया लोहड़ी का त्यौहार.

सारे मिलकर भंगड़ा पाओ,
हंसो-गाओ धूम मचाओ,
गज़क-रेवड़ी खाते जाओ,
मूंगफली-मक्के साथ चबाओ,
खुशियों भरा है यह त्यौहार,
मंगलमय हो यह त्यौहार,
कि आया लोहड़ी का त्यौहार, हो आया लोहड़ी का त्यौहार.
डा. ए.डी.खत्री, भोपाल, म.प्र. (भारत)
विशेष: लोहड़ी खुशियों और बधाई का त्यौहार है. यह गीत पूरे समाज के लिए लिखा गया है. इसलिए इसमें बेटे की शादी, बेटी की शादी, पुत्र का होना और कन्या का होना, सभी को सम्मिलित किया गया है. घरेलू स्तर पर गाते समय उन खण्डों को छोड़ सकते हैं जो अप्रासंगिक हों.



मंगलवार, 4 नवंबर 2014

सामंती संघर्ष


                       सामंती संघर्ष
   भारत में लोकतंत्र नहीं है, प्रजातंत्र है जिसमें प्रजा ५ वर्षों बाद अपने राजा का चुनाव करके पुनः प्रजा बन जाती है और अगले चुनाव तक शासन पर काबिज सामंतों का अच्छा या बुरा शासन सहने के लिए बाध्य होती है. जबकि लोकतंत्र वह व्यवस्था है जिसकी स्थापना, संचालन एवं नियंत्रण जनता द्वारा होता है . वर्तमान व्यवस्था में सत्तासीन सामंत जनता को तरह-तरह के कष्ट देकर अपना मनोरंजन करते हैं, आनंद उठाते हैं. जैसे नगर निगम आपसे जबरन कर तो लेगी परन्तु सेवा दे या न दे, उसकी इच्छा. सड़क बनवाए न बनवाए उसकी मर्जी. सड़क घटिया बनवाये या बनवाते ही तोड़ दे, आपके घर के रास्ते बंद कर दे, कीचड़ मचा दे, उसकी इच्छा. आप चिल्लाते रहिए , वे आनंदित होते रहेंगे. आप ने आन्दोलन किया तो पकड़ कर मुकदमा कर देंगे. पुराने राजाओं-सामंतों की भांति आज भी क़ानून उनका है, न्याय उनका है.
    आदिकाल से सामंत परस्पर मित्रता और संघर्ष करके अपनी शक्ति बढ़ाते रहे हैं. आज भी वही कर रहे हैं. वर्तमान में मीडिया जिसे गठबंधन कहता है, वह गठबंधन नहीं, सामन्ती व्यवस्था है. पहले जब महाराजा या सम्राट कमजोर हो जाते थे तो उनके दूर राज्यों में बैठे राज्यपाल, गवर्नर स्वयं को स्वतन्त्र राजा घोषित कर देते थे. स्वतन्त्र हो गए तो राजा अन्यथा वे सामंत रहते थे भले ही उन्हें राजा की उपाधि दे दी गई हो. प्राचीन काल में राजा अपने सामंतों के परस्पर मिलने को बड़ी संदेह की दृष्टि से देखते थे . आज भी कोई दो-तीन नेता एक साथ बैठ जाएं तो मीडिया में उन्हीं की चर्चा होने लगती है, उनके मिलने के निहितार्थ ढूढ़े जाते हैं कि वे क्या गुल खिलाने वाले हैं. यदि वर्तमान राजनीतिक घटनाओं को सामंतवाद के सन्दर्भ में देखा जायगा तो अनेक अर्थ स्वयं ही स्पष्ट हो जायेंगे.
    वर्तमान में सर्वाधिक चर्चा भाजपा-शिवसेना के सन्दर्भ में हो रही है. शिवसेना के सर्वेसर्वा उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के स्थापित सामंत हैं. चुनाव के पूर्व वे अपनी शक्ति बढ़ाने के प्रयास में भाजपा को अधिक सीटें नहीं देना चाहते थे. उधर भाजपा (इसके सामंत स्वतन्त्र नहीं हैं.संघ के बिना वे अस्तित्वहीन हैं) अपनी शक्ति बढ़ाना चाहती थी. मित्रता को लांघते हुए दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़े ताकि वे अपनी वास्तविक शक्ति दिखा सकें. भाजपा भारी पड़ गई. अब वह शिव सेना की हेकड़ी समाप्त करना चाह  रही है ताकि वे जैसा कहें वैसा शासन चले. यदि शिव सेना को शामिल किया और वह भाजपा से इतर अपनी योजनाएं लागू करके अपनी प्रतिष्ठा और शक्ति बढ़ाने लगी, तो भाजपा का प्रभाव कम हो जायगा. शतरंज के खेल की भांति उनमें शह और मात का खेल मित्रता पूर्वक चल रहा है. परन्तु खेल में हारा व्यक्ति भी स्वयं को हारा हुआ तो मानता ही है. इस खेल के संघर्ष में भाजपा की क्षति भी हो सकती है . भविष्य में विपक्षी सामंत एक होकर उसे पीछे धकेल सकते हैं जैसे लोक सभा के बाद वाले उपचुनावों में हुआ था.
    महाराष्ट्र के चुनाव से  पूर्व कांग्रेस ( सोनिया गाँधी-राहुल ) और राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार ) के सामंत एक साथ देश के शासन का सुख भोग रहे थे. लोकसभा की करारी हार के बाद पवार ने सोचा कि अलग होने से वे अधिक सीटें पा लेंगे जिससे मुख्यमंत्री उनके दल का बनेगा. परन्तु कांग्रेस और पवार दोनों के दल पिछड़ गए. सत्ता हाथ से चली गई. कहावत है भागते भूत की लंगोटी ही सही. कांग्रेस ने दिल्ली में हारने के बाद बिना शर्त नए सामंत केजरीवाल का समर्थन कर दिया था और स्वयं शून्य प्राय होते हुए भी केजरीवाल का मुंह कांग्रेस के भ्रष्टाचार से दूर भाजपा की ओर मोड़ दिया. उसी तर्ज पर पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस ने भी महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए भाजपा को बिना शर्त समर्थन दे दिया. इससे भाजपा को शक्ति मिल गई और वह शिवसेना से अधिक शक्ति के साथ मोल-तोल करने की स्थिति में आ गई. इससे इतना लाभ तो पवार कांग्रेस को मिलेगा ही कि भाजपा उनके नेताओं के विरुद्ध कार्यवाही से बचेगी. उनकी सामन्ती कड़क कम भले ही हो गई हो, कुछ तो बनी रहेगी.
   सामंतों का कुल सिद्धांत और उद्देश्य सत्ता में भागीदारी प्राप्त करना और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ लूटना होता है, वह कहीं से भी मिले, कैसे भी मिले. लोकसभा चुनाव के पूर्व भाजपा द्वारा प्रधान मंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के नाम की घोषणा के बाद बिहार के जनता दल (यू) के सामंत नितीश कुमार परेशान हो गए कि इससे भाजपा का स्तर बहुत बढ़ जायेगा. अतः वे उस भाजपा से अलग हो गए जिसके साथ मिलकर वे बिहार का चुनाव जीते थे और मिलकर सरकार चला रहे थे. बाद में उन्हें लगा कि उनकी शक्ति बहुत कम है. उन्होंने उस लालू और कांग्रेस को अपना साथी बना लिया जिन्हें कोस-कोस कर वे बिहार के मुख्यमंत्री बने थे. ये आज भाजपा के साथ  होते तो नितीश और शरद यादव की प्रतिष्ठा बहुत अधिक होती परन्तु बिना समझ के संघर्ष करने से दोनों की सामन्ती शक्ति घट गई. जबकि भाजपा के साथ जाकर राम बिलास पासवान ने अपनी खोई हुई सामन्ती पहचान को पुनः प्राप्त कर लिया.
  सामंतों का यह संघर्ष दो दलों के मध्य ही नहीं चलता है, एक दल के अन्दर भी चलता रहता है जहाँ एक नेता अपनी सामन्ती शक्ति बढ़ाने अपने दल के सर्वशक्तिमान सामंत को खुश करता रहता है , दूसरे सामंत की बुराई करता रहता है. भाजपा में नरेंद्र मोदी के उभरने की कहानी सबके सामने है . वे अपने दल के बड़े सामंतों लालकृष्ण अडवाणी, सुषमा स्वराज आदि को पीछे छोड़ते हुए किस प्रकार आगे बढ़े हैं और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध किया है, यह सबने देखा है.

     

सोमवार, 3 नवंबर 2014

धारा ३७६ की नई व्याख्या


                        धारा ३७६ की नई व्याख्या
  समाचार पत्र से ज्ञात हुआ कि दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस प्रदीप नंद्रा जोग और जस्टिस मुक्ता गुप्ता ने ६५-७० वर्ष की एक महिला से हुए बलात्कार मामले में भारतीय दंड संहिता की नई व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहा है कि महिला की आयु ६५-७० वर्ष है. वह रजो निवृत्त हो चुकी है. रजोनिवृत्त महिला से सम्बन्ध बनाना जबरन बनाए गए सम्बन्ध ( फोर्सिबुल) की श्रेणी में नहीं आता है ,यह सम्बन्ध उग्र प्रकार का ( फोर्सफुल ) हो सकता है. अतः उस पर धारा ३७६ अर्थात बलात्कार का आरोप नहीं बनता है. बलात्कार के आरोप में निचली अदालत ने आरोपी को १० वर्ष के कठोर कारावास की सज़ा दी थी जिसे उन्होंने बरी कर दिया . इस पर कुछ महिला वकील एवं महिला संगठनों ने आपत्ति की है .
     भारत में तो वही न्याय है जिसे जन साधारण नहीं केवल जज ही समझते हैं. यदि जज अपराधी को दोष मुक्त कर रहे हैं तो उन्हें सज़ा कौन और कैसे दे सकता है . फ़िल्मी स्टाइल में कोई पेड हीरो तो यहाँ होता नहीं है जो पुलिस- न्यायालय को लांघता हुआ अपराधी को स्वयं दंड दे दे  या मार डाले. यदि किसी को लगता है कि निर्णय गलत है तो सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है . इन्हीं टेढ़े - मेढ़े निर्णयों के कारण अंग्रेजी काल से यह क़ानून बना हुआ है कि  न्यायालय के निर्णय की आलोचना नहीं की जा सकती है भले ही वह कितना भी गलत हो . यदि कोई आलोचना करता है तो वह न्यायाधीश की नहीं, माननीय न्यायालय की अवमानना का दोषी होगा और उसे वही जज इच्छानुसार दंड दे सकते हैं . इसलिए हम तो नहीं कह सकते कि निर्णय गलत है. निर्णय देने वाले दो जजों में एक आदमी है, दूसरी औरत है. वही कह रही है कि बलात्कार नहीं हुआ तो दूसरा, तीसरा या स्वयं भुक्त भोगी कैसे कह सकती है कि बलात्कार हुआ.
    आपराधिक निर्णय सामान्य रूप से राज्य का विषय होते हैं . राज्य ही आरोपी को सज़ा दिलवाने के लिए अपना सरकारी वकील करते हैं जब कि आरोपी धन-बल के दम पर बड़ा से बड़ा वकील रखता है ताकि वह बच जाए. क्या इस प्रकरण में दिल्ली राज्य की सरकार सर्वोच्च न्यायालय जायेगी ? यदि वह नहीं जाती है तो कम से कम दिल्ली राज्य के लिए तो यह लागू हो ही जायगा कि रजो निवृत्त महिला से, जिसकी आयु ५० वर्ष या अधिक हो सकती है कोई भी पड़ोसी, रिश्तेदार या अपिरिचित व्यक्ति स्वेच्छानुसार फोर्सफुल सम्बन्ध बना सकेगा और पुलिस में उसकी रिपोर्ट भी दर्ज नहीं होगी क्योंकि इसे बलात्कार न मानकर हलके-फुल्के धक्का देने या चांटा मारने जैसा प्रकरण माना जायगा . कार्यालय या सेवा स्थान में अधीनस्थों क्या, महिला अधिकारीयों से कोई मुंह जबानी छेड़छाड़ करेगा तो उस पर प्रकरण दर्ज होगा परन्तु यदि वह फोर्सफुल सम्बन्ध बनाता है तो उसका कोई कुछ नहीं कर पायेगा. घर के अन्दर काम करने वाली महिलाओं का तो हाल और भी बद्तर हो जायेगा . वे बेचारी किससे शिकायत करेंगी और इस निर्णय के आगे उनकी बात कौन सुनेगा ? उतना ही भय तथा कथित बड़े घर की महिलाओं को भी रहेगा जो घर में नौकरों से काम करवाती है. कड़े क़ानून की परवाह न करते हुए जब लोग २-३ वर्ष की कन्याओं को नहीं छोड़ते हैं तो महिलाओं की बात कौन करे जहाँ क़ानून अपराधी के साथ होगा.
     कुछ माह पूर्व मीडिया के एक चैनेल में दिखाया गया था कि विदेशी लोग विशेषकर अफ्रीकी खुले आम सौदा कर रहे हैं कि किस प्रकार की कितनी लड़कियां कहाँ चाहिए. पुलिस को तो ये सब धंधे शुरू होने के पहले ही पता चल जाते हैं. यदि पुलिस का सहयोग न हो तो ऐसे धंधों में संलिप्त शरीफों की शराफ़त कब तक टिक सकती है ? आम पार्टी के समय क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती को कुछ लड़कियों के पत्र प्राप्त हुए कि वे विदेशी चकलेबाज़ों के चंगुल में फंस गई हैं , उन्हें मुक्त कराया जाय. नए-नए बने क़ानून मंत्री भारती ने अति उत्साह दिखाते हुए ऐसे ही एक स्थान पर छापा मार दिया . परिणाम यह निकला कि धंधेबाज़ तो धंधे में मस्त हैं , भारती के विरुद्ध विदेशी महिला के घर में जबरन घुसने और परेशान  करने का प्रकरण दिल्ली पुलिस ने दायर कर दिया है.
   कुल मिलाकर स्थिति यह है कि पहले पुलिस अकेले दम पर जिन अनैतिक कार्यों को प्रोत्साहन दे रही थी, अब कानून भी उनके साथ आ गया है. अब देखना है कि भारतीय संस्कृति और गौरव की दुहाई देने वाले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी इस प्रकरण को कितनी गंभीरता से लेते हैं . वे स्वयं पहल करते हुए धारा ३७६ की पुनर्व्याख्या संसद में करवाएंगे या इसको देश के और भी बड़े जजों की दया पर छोड़ देंगे. इस निर्णय ने तो समलैंगिकता से भी बहुत बड़ी छलांग लगा दी है जिसके नीचे महिलाएं ही नहीं पूरा देश और समाज आ गए है. स्वयं स्त्री और पुरुष जज भी आ गए हैं क्योंकि अपवाद छोड़कर पुरुष जजों के घर में भी प्रौढ़ एवं वृद्ध स्त्रियाँ होती है, नहीं हैं तो भविष्य में होंगी.  

सिमेस्टर प्रणाली का अंत

   म. प्र. के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में स्नातक स्तर पर अंततः सिमेस्टर प्रणाली समाप्त करने की घोषणा कर दी गई है. सिमेस्टर प्रणाली २००८ में प्रारंभ करने के साथ ही विवादों में थी. अब जब उसने सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्र्था को आत्मसात कर लिया था, अचानक उसे समाप्त कर दिया गया. दो माह पूर्व कहा गया था कि छात्रों के मध्य मतदान करवाया जायगा कि इसे समाप्त करें या जारी रखें. फिर शासन ने स्वयं  ही निर्णय ले लिया. यदि मतदान करवाया जाता तो छात्र सिमेस्टर प्रणाली के पक्ष में ही मत देते . इसलिए नहीं कि यह अच्छी प्रणाली है अपितु इसलिए कि कुछ सुस्थापित महाविद्यालयों को छोड़कर अधिकांश महाविद्यालयों में छात्रों को मुफ्त के अंक मिल रहे थे. निजी महाविद्यालयों में तो अंक देना महाविद्यालयों और वहां कार्यरत शिक्षकों की मजबूरी थी अन्यथा वहां पढ़ेगा कौन ?
      सिमेस्टर प्रणाली को समाप्त क्यों करना पड़ा ? परीक्षा लेने और समय पर परिणाम देने में विश्वविद्यालयों के कुलसचिवों ने असमर्थता व्यक्त कर दी है . सरकार को चाहिए था कि इसे जारी रखती परन्तु उसने आगामी सत्र से इसे बंद करने की घोषणा कर दी. दरअसल जब से व्यापमं की परीक्षाओं के घोटाले सामने आये हैं जिसमें पूर्व उच्च शिक्षा मंत्री से लेकर अनेक अधिकारी जेल में पड़े हैं, परीक्षा घोटालों से कुलपति और कुलसचिव भयभीत होने लगे हैं. दूसरे, सिमेस्टर प्रणाली से उच्च शिक्षा की जो दुर्गति हुई है वह सर्व विदित है. केंद्र में कांग्रेस सरकार थी तो यह दुर्गति राज्य के लिए वरदान थी क्योंकि कांग्रेस पहले से ही शिक्षा व्यवस्था चौपट करने और उसका व्यवसायीकरण करने में रूचि ले रही थी. परन्तु मोदी सरकार आने से संदेह की स्थिति बनने लगी. वे सदैव योग्य और कुशल छात्रों के निर्माण की बात कर रहे हैं. संभव है कि राज्य सरकार को लगा हो कि पहले ही स्थिति सुधार ली जाए.
   २००८ में मैं शासकीय स्नातकोत्तर महविद्यालय सीहोर में प्राचार्य था. अप्रेल माह में बरकतुल्लाह विश्विद्यालय में प्राचार्यों और कुलसचिवों की सभा का आयोजन उच्च शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव एवं आयुक्त के द्वारा किया गया था. मैंने असुविधाओं के मध्य इसे प्रारम्भ करने का विरोध किया था जबकि अधिकांश महाविद्यालयों के प्राचार्यों ने आयुक्त के भय के कारण इसकी प्रशंसा की. वे प्राचार्य जानते ही नहीं थे कि इसमें क्या समस्याएँ आयेंगी . मैंने कहा कि वार्षिक परीक्षा करवाने में प्रायोगिक कार्यों के साथ तीन माह से अधिक समय लगता है . यदि उतनी ही बड़ी दो परीक्षाएं करवाई जाएँगी तो सात माह तो परीक्षा में ही लग जाएंगे. तीज-त्यौहार के और ग्रीष्मावकाश में भी एक माह तो लगेगा ही . दोनों सिमेस्टर में  छात्रों को प्रवेश देने में भी  में भी एक-एक माह का समय लगेगा. शिक्षक कुछ निजी अवकाश भी लेंगे. तो वर्ष में पढ़ने के दिन ही कितने मिलेंगे जब कि सरकार चाहती है कि न्यूनतम १८० दिनों की पढ़ाई कक्षाओं में होनी चाहिए. यह कैसे संभव होगा ? बाद में विश्विद्यालयों में सिमेस्टर के साथ वार्षिक परीक्षाएं भी करवाईं गईं अर्थात वर्ष भर परीक्षाएं ही होती रहीं. शासन ने आदेश दिए कि सतत परीक्षाओं के बावजूद सभी कक्षाएं भी नियमित रूप से लगनी चाहिए तो सरकारी फर्जीवाड़े की भांति सारी नियमित कक्षाएं भी होती रहीं. चार माह में प्रत्येक विषय के टेस्ट और मूल्यांकन भी हुए. सरकार अनेक छात्रवृत्तियां बांटती है . अतः अनेक छात्र छात्रवृत्तियों के लिए प्रवेश ले लेते हैं . सबका टेस्ट में सम्मिलित होना ही संभव नहीं होता था और यदि कोई फेल हो गया तो उसका दुबारा तब तक टेस्ट लेना होता था जब तक वह अच्छे अंकों में पास न हो जाए . जो एक टेस्ट में आ नहीं रहा है उसे अनेक टेस्टों में बुलाना , कई बार बुलाना कैसे संभव था. तत्कालीन उच्च शिक्षा आयुक्त ने वर्षों से पढ़ा रहे प्राध्यापकों को छात्रों की उपस्थिति लेना, टेस्ट लेना, नम्बर देना आदि सब कुछ सिखा दिया कि फर्जी रिकार्ड कैसे बनाने हैं . सिमेस्टर दौड़ने लगे , बिना परेशानी के छात्र घर बैठे पास होने लगे . विज्ञान विषयों के छात्रों के उन महाविद्यालयों में भी  भी नियमित टेस्ट होते रहे जहाँ उन विषयों के एक भी नियमित शिक्षक नहीं थे. प्रोजेक्ट वर्क के लिए प्रदेश भर में दुकानें खुल गईं . ले दे कर छात्रों ने तीन महीने का प्रशिक्षण भी प्राप्त कर लिया. उसके अंक भी बटोर लिए. छात्र खुश ही खुश . सरकार की योजना सफल .
  उक्त बैठक में मैंने दूसरी समस्या रखी कि इतनी सारी परीक्षाओं का परीक्षाफल समय पर कैसे निकलेगा. उस समय बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय में एक वर्षीय पीजीडीसीए पाठ्यक्रम  में सिमेस्टर प्रणाली लागू थी जिसमें एक-डेढ़ हजार छात्र पढ़ते थे . उसका परीक्षाफल दो वर्ष के पूर्व नहीं आ पाता था. मैंने आयुक्त से कहा कि जब इतने कम छात्रों के परीक्षाफल में एक के स्थान पर दो वर्ष लगते हैं तो  सिमेस्टर प्रणाली में हज़ारों छात्रों का परीक्षाफल समय पर कैसे निकलेगा ? आयुक्त ने बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय के कुलसचिव संजय तिवारी से पूछा कि परीक्षा की क्या स्थिति होगी . आयुक्त का भयंकर भय था . कुलसचिव ने बिना कुछ सोचे समझे कह  दिया कि वे सब सिमेस्टर परीक्षाएं एक माह में करा लेंगे . मेरी आपत्तियां दरकिनार करते हुए जुलाई २००८ में  सिमेस्टर प्रणाली लागू कर दी गई.  उस समय मेरे महाविद्यालय में बॉटनी विभाग में मात्र एक प्राध्यापिका थी . बी.एस-सी. प्रथम वर्ष से लेकर एम.एस-सी. तक ४०० छात्र थे. एक पद  और था जिस पर नियुक्ति निश्चित नहीं रहती थी. मैं उस प्राध्यापिका से सभी कक्षाएं लेने, उनमे नियमित टेस्ट करवाने, अंक देने , पढ़ाने, प्रायोगिक कार्य करवाने के लिए कैसे कह सकता था जो पूर्णतः असंभव है ? मेरे न रहने पर सब कार्य वहां ही नहीं पूरे प्रदेश में सुचारू रूप से चुपचाप होते रहे.  
   प्रदेश में अगले तीन वर्षों तक बिना पढ़ाई के परीक्षाएं होती रहीं . परीक्षाफल एक वर्ष विलम्ब से आते रहे. उसके बाद सिमेस्टर प्रणाली में एक विषय का एक प्रश्न पत्र किया गया जैसा मैंने प्रारम्भ में कहा था. परन्तु तब भी परीक्षाफल बहुत विलम्ब से निकलते रहे. कभी-कभी तो ऐसा भी हुआ कि एक सिमेस्टर के  परीक्षा फल निकलने के एक माह की अंदर ही अगले  सिमेस्टर की परीक्षाएं प्रारम्भ हो गईं. बिना पढ़े छात्र पास भी होते गए. सिमेस्टर प्रणाली से यह तो सिद्ध हो गया है विद्यार्थी के भविष्य निर्माण में शिक्षक की आवश्यकता नहीं है. सबको एकलव्य बना दिया.
  सिमेस्टर प्रणाली भोपाल के उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान , शासकीय सरोजिनी नायडू स्नातकोत्तर महाविद्यालय और शासकीय महारानी लक्ष्मी बाई स्नातकोत्तर महविद्यालयों में अनेक वर्षों से सफलता पूर्वक चल रही है क्योंकि वहां प्राध्यापकों की संख्या पर्याप्त है . प्रदेश के अन्य  महाविद्यालयों में भी शिक्षक : छात्र का अनुपात १:३० किया जाता तथा महविद्यालय स्वायत्त बनाए जाते जिससे वे अपने महविद्यालयों की परीक्षाओं के लिए विश्वविद्यालय पर निर्भर न रहते तो छात्रों का भला होता तथा सिमेस्टर प्रणाली से राज्य का शिक्षा स्तर उठता . यदि वर्तमान में म.प्र. शासन का उद्देश्य पुनः शिक्षा व्यवस्था को सुधारना है तो सिमेस्टर प्रणाली की समाप्ति के निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए.